नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)
Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० नैषधचरितम् । [ तृतीयः के वा उपभोग करता है। लेकिन आश्चर्य की बात है कि 'पहले' का 'शेष' और 'पिछले' का 'अशेष' उपभोग करता है। (इसमें विरोधाभास अल- ङ्कार है कि जो पहले ग्रहण किया गया उसका शेष कैसा ? और जो पीछे उपभोग किया उसका अशेष कैसा ? तो इसका परिहार यह है कि 'आज्य' का यज्ञ से बाकी बचा हुआ भाग लेता है और 'राज्य' का अशेष (समूचा) उपभोग करता है ॥ दारिद्य-दारि-द्रविणौघ-वर्षैरमोघ-मेघ-व्रतमर्थिसार्थे । सन्तुष्टमिष्टानि तमिष्टदेवं नाथन्ति के नाम न लोकनाथम् ॥२५॥ दारिद्र्येति । [दारिद्र्य-दारि-द्रविणौघ-वर्षैः ] दारिद्र्यं दारयति निवर्तयतीति तस्य दारिद्र्यदारिणो द्रविणौघस्य धनराशेर्वर्षैः, अर्थिसार्थे विषये अमोघमेघव्रतं वर्षुकत्वलक्षणं यस्य तं । सन्तुष्टं = दानहृष्टं इष्टदेवं = यक्षाराधित- सुरं लोकनाथं, त = नलं, के नाम इष्टानि = ईप्सितानि न नाथन्ति=न याचन्ते सर्वेऽपि नाथन्त्येवेत्यर्थः । नाथतेर्याच्ञार्थस्य दुहादित्वात् द्विकर्मकत्वम् ॥ २५ ॥ दरिद्रता को विदारण करनेवाले, धनसमूहों की वर्षा द्वारा, याचक-समुदाय को मेघ-वर्षा के समान सन्तुष्ट कर देने का जिसका अव्यर्थ नियम है--ऐसे सन्तोष युक्त ( याचकों के माँगने पर भी विरक्त भाव न रखने वाले ), इष्ट-देव (लोक- प्रिय, देव-तुल्य ) और लोकनाथ ( भूपति ) नल से--ऐसा कौन व्यक्ति है जो अपने अभीष्ट की याचना न करता हो ? ॥ २५ ॥ अस्मत्किल श्रोत्रसुधां विधाय रम्भा चिरम्भामतुलां नलस्य । तत्रानुरक्ता तमनाप्य भेजे तन्नामगन्धान्नलकूबर सा ॥२६॥ अस्मदिति । सा = प्रसिद्धा रम्भा, नलस्य, अतुलम् = अनुपमां, भां = सौन्दर्यं चिरं अस्मत् = मत्तः श्रोत्रसुधां विधाय = कर्णे अमृतं कृत्वा, रसादा- कर्ण्यत्यर्थः । तत्र = तस्मिन्नले, अनुरक्ता सती तं = नलम् अनाप्य = अप्राप्य । आङ्पूर्वादामोतेः क्त्वो ल्यबादेशः नञ्समासः । अन्यथा त्वसमासे ल्यबादेशो न स्यात् । तन्नामगन्धात् = तस्य नलस्य नामाक्षरसंस्पर्शाद्धेतोः, नलकूबर = कुबेरा- त्मजं भेजे किल । तादृक् तस्य सौन्दर्यमिति भावः ॥२६॥ रम्भा (नाम की त्रैलोक्यसुन्दरी अप्सरा) शुकमुख से नल के अनुपम लावण्य के बारे में बहुत दिनों तक अपने कर्णामृत द्वारा श्रवणकर,--उन पर अनुरक्त