भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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पृष्ठ 159

Digitized by Sarayu Trust Foundation and eGangotri लङ्कारिणीं, वक्रोक्त्यलङ्कारयुक्ताञ्च, न वेद = न वेत्ति । 'विदो लटो वा' इति लादेशः । अशक्यरक्षाः स्त्रिय इति भावः । यत्र प्रस्तुतवाग्देवीकथनादप्रस्तुतवर्णा- मकवाणीवृत्तान्तप्रतीतेः प्रागुक्तरीत्या ध्वनिरेवेत्यनुसन्धेयम् ॥३०॥ सन्ध्या-वन्दन आदि धर्मानुष्ठान में आसक्त हुए ब्रह्मा, मौन रहने के बहाने, अपनी भार्या वाणी (सरस्वती) को जो हृदय के भीतर रोके रहते हैं, वह उनका प्रयास व्यर्थ है क्योंकि उनकी पत्नी नल के कण्ठ का आश्रय लेकर, (शृङ्गारादि) रस से तृप्त (पूर्ण) तथा वक्रोक्ति-बाहुल्य से कर्कशा हो गयी है-इस बात का पता, सदा वेद का पाठ करते-करते, दूसरे सांसारिक विषयों से अनभिज्ञ रहनेवाले बूढ़े विधाता को नहीं है । [जिस प्रकार कोठरी के भीतर ताला में बन्द की हुई, सांसारिक अनुभवों से शून्य किसी वृद्ध की, पर-पुरुष-परायणा युवती पत्नी किसी उपाय से बाहर निकल कर, अपने उपपति के कण्ठ से लिपट कर, उसके द्वारा 'रस-तृप्त' (प्रेम-प्रदर्शक-कर्म सम्भोग से सन्तुष्ट) होती है और वह कितनी 'वक्रा' (कुटिल, खोटी) हो गयी है, इन दोनों बातों का पता उसके मूर्ख पतिदेव को नहीं होता; वह तो कोठरी में ताला बन्द कर, निश्चिन्त हो जाता है। ठीक यही दशा ब्रह्माजी की भी है, जो पूजा पाठ करने के बहाने मौन रह कर, यह सोचते हैं कि अपनी पत्नी को हृदय-मन्दिर में बन्द किये हूँ और उधर वाणी नल के पास पहुँच जाती है ] ॥ ३० ॥ श्रियस्तदालिङ्गनभूर्न भूता व्रतक्षतिः कापि पतिव्रतायाः । समस्तभूतात्मतया न भूतं तद्भर्तुरीर्ष्याकलुषाऽणुनापि ॥३१॥ श्रिय इति । पतिव्रतायाः श्रियः = श्रीदेवीव्याः, तद्भर्तुर्विष्णोः, समस्तभूता- त्मतया = सर्वभूतात्मकत्वेन, नलस्यापि विष्णुरूपत्वेनेत्यर्थः । तदालिङ्गनभू = नलाश्लेषप्रभवा । कापि व्रतक्षतिः = पातिव्रतभङ्गो न भूता = नाभूत् । अत एव तद्भर्तुः = विष्णोश्च [ईर्ष्याकलुषाणुना] ईर्ष्या नललिङ्गनभुवा अक्षमया, यत्कलुषं कालुष्यं मनःक्षोभः, दुःखादित्वेन अस्य धर्मधर्मिवचनत्वात् । अत एव क्षीरस्वामी 'शस्तं चाथ त्रिषु द्रव्ये पापं पुण्यं सुखादि च' इत्यत्र आदिशब्दाच्छ्रेयः कलुषशिवभद्रादय इति उभयवचनेषु संजग्राह । तस्याणुना लेशेन अपि, न भूतं = नाभावि । नपुंसके भावे क्तः । अत्र शच्यादिचित्तचाञ्चल्योक्तेर्नलासौन्दर्ये तात्पर्यान्ना- नौचित्यदोषः ॥ ३१ ॥ CC-0. Prof. Satya Vrat Shastri Collection.