भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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सर्गः ३ ] जीवातु-मदयन्तिकासहितम् १४५ Digitized by Sarayu Trust Foundation and eGangotri सूर्य में, कभी (सन्ध्या समय) समुद्र के ज्वार-भाटे में, कभी (बरसात के दिनों में) आकाश में चक्कर काटते हुए मेघों में-छिप जाया करता है। (ठीक ही है क्योंकि पराजय के कारण लज्जित मनुष्य अपना मुँह छिपाता रहता है) ॥३३॥ संज्ञाप्य नः स्वध्वजभृत्यवर्गान् दैत्यारिस्त्यब्जनलास्यनुत्यै । तत्संकुचन्नाभिसरोजपीताद्धातुर्बिलज्जं रमते रमायाम् ॥३४॥ संज्ञाप्येति । दैत्यारिः=विष्णुः, [स्व-ध्वज-भृत्य-वर्गान्] स्वध्वजस्य गरु- डस्य पक्षिराजस्य भृत्यवर्गान् नः=अस्मान् [अत्यब्ज-नलास्य-नुत्यै ] अतिक्रान्त- मब्जमत्यब्जम्, अब्जविजयीत्यर्थः । 'अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीया' इति समासः । तस्य नलास्यस्य नुत्यै स्तोत्राय । 'स्तवः स्तोत्रं स्तुतिर्नुतिः इत्यमरः । संज्ञाप्य = संकेत्य [तत्सङ्कुचन्नाभि-सरोज-पीतात् ] तत्सङ्कुचता तया नुत्या सङ्कुचता निमीलत्ता, नाभिसरोजेन पीतात्तिरोहितात् धातुः = ब्रह्मणो विलज्जं यथा तथा रमायां रमते । अत्र विष्णोरुक्तव्यापारासम्बन्धेऽपि सम्बन्धोक्तेरतिशयोक्तिः ॥३४॥ दैत्यारि विष्णु-सुन्दरता में कमल को अतिक्रान्त करने (जीतने) वाले, नल के मुख की स्तुति करने के लिए, अपनी ध्वजा के लाञ्छन गरुड के अनु- चरों-हम लोगों-को सङ्केत (आँखों से इशारा) करके, हम लोगों के द्वारा नल की स्तुति सुनने पर (अपनी पराजय समझ) सकुचते हुए नाभिकमल द्वारा पान किये जाने वाले ब्रह्मा के सन्निकट ही-लज्जारहित हो, लक्ष्मी के साथ विहार करते हैं। (ब्रह्मा भगवान् के नाभिकमल में ही सदा निवास करते हैं । अतः लज्जा के कारण उन्हें लक्ष्मी जी के साथ रमण करने का कभी सु-अवसर ही नहीं मिलता। पर जब हंस लोग नल के मुख की प्रशंसा करते हैं कि उनका मुख कमल से भी कई गुना बढ़ कर है तो लज्जा के मारे कमल संकुचित हो जाता है और ब्रह्मा जी उसके भीतर रह जाते हैं । बस, भगवान् को रमा के साथ रमण करने के लिए उपयुक्त अवसर मिल जाता है और वे बेखटके इस कार्य में प्रवृत्त हो जाते हैं) ॥ ३४ ॥ रेखाभिरास्ये गणनादिवास्य द्वात्रिंशता दन्तमयीभिरन्तः । चतुर्दशाष्टादश चात्र विद्या द्वेधापि सन्तीति शशंस वेधाः ॥३५॥ रेखाभिरिति । अस्य = नलस्य, आस्ये, अन्तः दन्तमयीभिः = दन्तरूपाभि- र्द्वात्रिंशता रेखाभिः गणनात्=संख्यानाच्चतुर्दश चाष्टादश च विद्याः द्वेधा अपि १०