भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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१५० नैषधचरितम् । [ तृतीयः रति-रहस्य के वृत्तान्तों को निःशङ्क होकर मेरे पास रख देती थीं; अर्थात् कामवासना के बारे में सभी बातें स्पष्टतः मुझसे कह देती थीं ) यतः पक्षी ( जानवर ) किसी भी मनुष्य से लज्जा नहीं करता, अतः कोई भी व्यक्ति चिड़ियों से नहीं लजाता ॥४३॥ वार्त्ता च साऽसत्यपि नान्यमेति योगादरन्ध्रे हृदि यां निरुन्धे । विरिञ्चि-नानानन-वाद-धौत-समाधि-शास्त्र-श्रुति-पूर्ण-कर्णः ॥४४॥ अथ स्वस्य एवंविधविश्वासहेतुत्वमाह—वार्तेति । [ विरिञ्चि-नानानन- बाद-धौत-समाधि-शास्त्र-श्रुति-पूर्ण-कर्णः ] विरिञ्चेर्ब्रह्मणः नानाननैर्बहुमुखैः, वादेन व्याख्यानेन, धौतस्य शोधितस्य, समाधिशास्त्रस्य संयमविद्यायाः, श्रुत्या श्रव- णेन पूर्णकर्णः, चतुर्मुखाभ्यस्तवाङ्नियमनविद्य इत्यर्थः । अहमिति शेषः । योगात् अरन्ध्रे = निरवकाशे, पूर्णे हृदि = हृदये यां = वार्त्ता निरुन्धे = नियच्छामि । सा वार्त्ता=लोकवार्त्ता; किमुतारहस्यवार्त्तेति भावः । असत्यपि =विनोदार्थे कथितापि, किमुत सतीति भावः । असत्यपि अन्यं = पुरुषान्तरं नैति = न गच्छति । यथा ह्यसती दुश्चरी निरन्ध्रस्थाने निरुद्धा नान्यम् एति, तद्वदिति भावः । अतोऽहमासां विश्वास्य इति पूर्वेणान्वयः । अत्र वार्त्तानिरोधस्य विरञ्चीत्यादिपदार्थहेतुकत्वात् काव्यलिङ्गमलङ्कारः ॥४४॥ ब्रह्मा के नाना ( चारों ) मुखों के व्याख्यान-वाक्यों से परिष्कृत हुए समाधि- ( योग ) शास्त्र के सुनने से भरे हुए कर्णेन्द्रिय वाला मैं योग ( चित्त-वृत्ति-निरोध के अभ्यास ) द्वारा अरन्ध्र ( निरवकाश ) हृदय ( चित्त ) में जो ( बात ) रोक ( रख ) लेता हूँ, वह असली ( परिहास में कही हुई मिथ्या ) वार्त्ता ( बात ) होने पर भी, अन्य पुरुष को उस प्रकार प्राप्त नहीं होती ( अर्थात् कहीं से न निकलने वाले मेरे हृदय रूपी भवन में निरुद्ध रहने के कारण किसी दूसरे मनुष्य के कान में उस प्रकार न पड़ती ) जिस प्रकार योग ( खिड़की दरवाजा बन्द करने आदि उपाय ) द्वारा अरन्ध्र ( छिद्ररहित ) हृदय ( घर ) में जो असती ( व्यभिचा- रिणी ) रोक ली जाती है, वह मकान में बन्द रहने के कारण, रमण करने के अभिप्राय से अन्य पुरुष के पास नहीं पहुँच सकती । ( तात्पर्य यह है कि मैं दम्पति के परिहास, रति-आलिंगनादिविषयीय सन्देश को, उन दोनों के अतिरिक्त किसी