नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)
Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७६ नैषधचरितम् । [ तृतीयः Digitized by Sarayu Trust Foundation and eGangotri अलं विलम्ब्य त्वरितुं हि वेला कार्ये किल स्थेयसहे विचारः । गुरूपदेशं प्रतिभेव तीक्ष्णा प्रतीक्षते जातु न कालमार्त्तिः ॥६१॥ अलमिति । हे हंस ! विलम्ब्य अलं=न विलम्बितव्यमित्यर्थः । 'अलं खल्वोः इत्यादिना क्त्वाप्रत्यये ल्यबादेशः । त्वरितुं वेला हि=त्वराकालः खल्वयमित्यर्थः । 'कालसमयवेलासु तुमुन् ।' कुतः ? स्थैर्यसहे=विलम्बसहे कार्ये, विचारः=विमर्शः किल=इति प्रसिद्धौ, अन्यथा विपत्स्यत इति भावः । तथा हि तीक्ष्णा=शीघ्रग्राहिणी प्रतिभा=प्रज्ञा गुरूपदेशमिव आर्त्तिः = आधिः जातु=कदापि काल न प्रतीक्षते = कालक्षेपं न सहत इत्यर्थः । उपमार्थान्तरन्यासयोः संसृष्टिः ॥६१॥ अब विलम्ब मत करो, क्योंकि यह समय शीघ्रता करने का है । जो कार्य विलम्ब सहन कर सके उस में ही (शुभ तिथि-नक्षत्र-वार-योगादि का) विचार किया जाता है । (देखो), जिस प्रकार (शिष्य की) कुशाग्र बुद्धि, आचार्य की शिक्षा की, प्रतीक्षा नहीं करती, वैसे ही दारुण (काम-) पीडा भी (उपयुक्त) समय की प्रतीक्षा नहीं करती ॥६१॥ अभ्यर्थनीयः स गतेन राजा त्वया न शुद्धान्तगतो मदर्थम् । प्रियास्य-दाक्षिण्य-बलात्कृतो हि तदोदयेदन्यवधूनिषेधः ॥६२॥ अथानन्तरकृत्यं सविशेषमुपदिशति-अभ्यर्थनीय इत्यादि श्लोकपञ्चकेन । गतेन=इतो यातेन, त्वया स राजा = नलः शुद्धान्तगतः=अन्तःपुरस्थः, मदर्थं=मत्प्रयोजनं, नाभ्यर्थनीयः=न वाच्यः । दुहादित्वाद्द्विकर्मकत्वम् । अप्रधाने दुहादीनामिति राज्ञोऽभिहितकर्मत्वं । कुतः ? हि=यस्मात् तदा=तस्मिन् काले, [प्रियास्य-दाक्षिण्यबलात्कृतः] प्रियाणाम् आस्यदाक्षिण्यं मुखावलोकनोत्थापितछन्दा- नुवृत्तिबुद्धिरित्यर्थः । तेन बलात्कृतो बलात्प्रतिवर्त्तितः, अन्यवधूनिषेधः उदयेत्= उत्पद्येत ॥ ६२ ॥ तुम यहाँ से जाकर, उन राजा नल से (परिणय-) प्रार्थना जब वे रनिवास की रानियों के साथ बैठे हों, तब मत करना; क्योंकि सम्भव है कि उस समय, उन प्रेयसी रानियों के मुख की उदारता (मुख के अनुरोध) के कारण, उनके चित्त में यह भावना उत्पन्न हो जाय (कि अमुक रानी से या इन सभी रानियों से मेरी कामवासना पूर्ण हो सकती है।) इससे अन्य स्त्री के साथ परिणय करने को मना कर दें ॥६२॥