नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)
Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ३] जीवातू-मदयन्तिकासहितम् १८१ न्द्रियाणां, बहिरिन्द्रियाणां [ स्वं देवभूयं ] स्वकीय, देवभूयं देवत्वमिन्द्रियत्वं सुरत्वञ्च । 'देवः सुरे राज्ञि देवमाख्यातमिन्द्रियम्' इति विश्वः । चरितार्थं = सफलम् अस्तु । अमृतपानैकफलत्वाद्वैवत्वं स्यादिति भावः । अर्थान्तरप्रतीतेर्ध्व- निरेवेत्यनुसन्धेयम् ॥१०१॥ आपमें मन लगानेवाले (अर्थात् आपकी अनवरत चिन्ता करने वाले ) उन नल की, उपवासरूप व्रत (नियम) करनेवाली वाह्य इन्द्रियाँ-तपस्या द्वारा आज आपको पाकर, अमृत के भोजन से तृप्त हो-अपने देवत्व को सार्थक करेंगी। अर्थात् - नल का मन आठो पहर आपमें लगा रहता है, इससे उनकी आँख, कान, नाक, त्वचा, जिह्वा, इन्द्रियाँ, अपने-अपने विषयों को ग्रहण नहीं करतीं अर्थात् वे देखने, सुनने, सूंघने, पाने, स्पर्श करने, चखने से विरत रहती हैं। इस प्रकार मानों वे व्रतोपवास करती हैं। अब आज उपर्युक्त तपस्या के कारण आपको पाकर, वे देव बन जायंगी । अर्थात् आँख आपकी रूपमाधुरी सुधा का, कान आपके वाक्यामृत का, नाक आपकी अङ्ग-सौरभसुधा का, त्वचा आपके अङ्गस्पर्शरूप अमृत का और जिह्वा आपके अधरामृत का पान करके देवत्व में परिणत हो जायंगी । जिस प्रकार परमात्मा के स्वरूप का निरन्तर ध्यान करनेवाले सामान्य मानव-व्रतोपवासादि तपस्या से अपने इन्द्रियों को सुखाकर, अन्त में ब्रह्म का साक्षात्कार करके, अमृतपद को प्राप्त करके, देवता बन जाते हैं, उसी प्रकार सूर्य आदि देवताधिष्ठान मात्र से, देवस्वरूप नल की आँख आदि इन्द्रियाँ-उपर्युक्त रूप से उपवास-तप से, आपको पाकर-देव बन जायंगी ॥१०१॥ तुल्यावयौर्मूत्तिरभून्मदीया दग्धा परं सास्य न ताप्यतेऽपि । इत्यभ्यसूयन्निव देहतापं तस्याऽतनुस्त्वद्विरहाद्विधत्ते ॥१०२॥ यदुक्तं नृपं पञ्चेषुस्तापयतीति तदाह-तुल्येति । आवयोः = नलस्य मम चेत्यर्थः । 'त्यदादीनि सर्वेर्नित्यम्'इति सर्वग्रहणात्त्यदादिना नलेन सह त्यदाद्येक- शेषः । मूत्तिः = तनुः तुल्या = तुल्यरूपाऽभूत् । तत्र मदीया सा = मूत्तिः परं = निःशेषं दग्धा = भस्मीकृता । अस्य = मूत्तिस्तनुर्न ताप्यते = तापम् अपि न प्राप्यते इति = हेतोः अभ्यसूयन् = ईर्ष्यान् । इवेत्युत्प्रेक्षा । अतनुः =