भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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१८४ नैषधचरितम्। [तृतीयः Digitized by Sarayu Trust Foundation and eGangotri अथवा उनके मुख से बाहर निकलने वाली ( श्वासोच्छ्वास- रूपा) होकर भी आप नल की प्राण-वायु हो, फिर नासिका-रन्ध्र तथा मुख के भीतर प्रवेश करने पर, उनकी हृद्गता (हृदय के भीतर रहने वाली) हो। इसी लिए उनके मन के विषय में—जो एकमात्र आपही में तल्लीन है (अथवा-उनके मन का अद्वितीय जीवनोपाय एकमात्र आप ही हैं उसके सम्बन्ध में) हमारा चित्त रञ्चमात्र भी आश्चर्यान्वित नहीं होता ॥१०५॥ अजस्रमारोहसि दूरदीर्घां सङ्कल्पसोपानततिं तदीयाम् । श्वासान् स वर्षत्यधिकं पुनर्यद्ध्यानात्तव तन्मयतां तदाप्य॥१०६॥ अथ द्वाभ्यां सङ्कल्पावस्थामाह-अजस्रमिति । दूरदीर्घा = अत्यन्तायतां, तदीयां, [ सङ्कल्पसोपानततिं ] सङ्कल्पा मनोरथा एव सोपानानि, तेषाम् ततिं पङ्क्तिम् अजस्रं त्वं आरोहसि, श्वासान् पुनः स=नलो अधिकं वर्षति= मुञ्चतीति यत् तच्छ्वासवर्षं, तव ध्यानात् तन्मयतां = त्वदात्मकत्वम् आप्य = प्राप्य । आप्नोतेराङ् समासे क्त्वो ल्यबादेशः । अन्यथा कथमन्यायासादन्यस्य श्वास- मोक्ष इति भावः । अत्र श्वाससोपानारोहणयोः कार्यकारणयोर्वैयधिकरण्योक्तेरसङ्गत्य- लङ्कारः । 'कार्य-कारणयोर्भिन्नदेशत्वे स्यादसङ्गतिः' इति लक्षणात् । तन्मूला चेयं नलस्य दमयन्ती-तादात्म्योत्प्रेक्षेति सङ्करः ॥१०६॥ [ तीसरी सङ्कल्पावस्था नामक काम-दशा का वर्णन—]अतीव लम्बी-चौड़ी उनकी कल्पना रूपी सीढ़ियों की कतार ( अर्थात् पहले दमयन्ती के साथ विवाह करूंगा, फिर क्रीड़ामन्दिर में उसके केश-कलाप को गुथूंगा, फिर उसके मान करने पर इस प्रकार मनाऊंगा आदि ) पर आप चढ़ती रहती हैं। [ यदि आप पूछें, कि यह बात तुमने कैसे जानी ? तो इसका उत्तर यह है कि ] वे आपके ध्यान में 'तन्मय' होकर, बार-बार खूब निश्वास छोड़ते रहते हैं। [ जो व्यक्ति किसी का निरन्तर ध्यान करता है तो वह उसी के रूप में मिल जाता है। इस- प्रकार आपका बराबर ध्यान करते रहने के कारण नल आपके-दमयन्ती के-रूप में मिल गये हैं। जो व्यक्ति लगातार सीढ़ी चढ़ता रहता है तो चढ़ने के परिश्रम के कारण साँस खींचने लगता है। यतः आप उनकी सङ्कल्परूप सोपान-परम्परा पर बराबर चढ़ती रहती हैं, इसलिए सीढ़ी पर चढ़ने की आपकी-थकावट लम्बी लम्बी आहें खींचने के कारण, तन्मय होने से उनमें परिलक्षित होती है ] ॥१०६॥

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