भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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२०२ नैषधचरितम् । [ तृतीयः दमयन्तीं, वयसा तुल्या वयस्याः = सख्यः । 'नौवयः' इति यत्प्रत्ययः । हे प्रिय- सखि ! मुग्धे ! कान्तारे = विषमे, निर्गतासि = सङ्कटं प्रविष्टासि । पद्वी विस्मृता किंनु ? मा रोदीः, एहि, यामः = गच्छामः, इत्युपहृतवचसः = दत्तवचनाः सत्यः, एनां निन्युः ॥१३२॥ इसके बाद (हंस और दमयन्ती—इन दो में से) एक (अर्थात् हंस) तो अपने पक्षों को फड़फड़ाकर, (दमयन्ती प्राप्तिरूप) कार्य की सफलता के सद्भाव को स्पष्टरूप से सूचना देने के लिए, दमयन्ती के साथ हुए समस्त वार्तालाप को कहने के लिए, निषधेश्वर नल के पास गया । और दूसरी (अर्थात् दमयन्ती) को उसकी सखियाँ—'हे प्यारी सखी ! तुम इस गहन उपवन में चली आयी, इससे हे मुग्धे ! क्या तुम पगडण्डी भूल गयीं ? अच्छा, रोओ मत; आओ, हम सब लौट चलें'—ऐसा कहकर, घर ले गयीं ॥ १३२ ॥ सरसि नृपमपश्यद्यत्र तत्तीरभाजः स्मरतरलमशोकानोकहस्योपमूलम् । किसलयदलतल्पम्लापिनं प्राप तं स ज्वलदसमशरेषुस्पर्धिपुष्पर्द्धिमौलेः ॥ १३३ ॥ सरसीति । स = हंसो यत्र सरसि नृपम् अपश्यत् = दृष्टवान्, [ तत्तीर भाजः ] तस्य सरसस्तीरभाजः = तटरुहस्य । [ ज्वलदसमशरेषु-स्पर्धि-पुष्पर्द्धि- मौलेः ] ज्वलन्दिरसमशरस्य पञ्चेषोरिषुभिः स्पर्द्धत इति तत्स्पर्धिनी तत्सदृशी, पुष्पर्द्धिः पुष्पसमृद्धिः मौलिः शिखरं यस्य तस्य, अशोकानोकहस्य = अशोकवृक्षस्य उपमूलं = मूले । विभक्त्यर्थे अव्ययीभावः । [ स्मर-तरलं ] स्मरेण तरलं चञ्चलं, [ किसलय-दल-तल्प-म्लापिनं ] किसलयदलतल्पं पल्लवपत्रशयनं, ग्लापयति स्वाङ्गदाहेन ग्लापयतीति तथोक्तं, तं = नृपं प्राप ॥१३३॥ वह हंस—जिस सरोवर पर, नल को पहले-पहल देखा था, उसी के किनारे कामदेव के चमकते हुए बाण के साथ स्पर्धा करने वाले, पुष्प-समृद्धि युक्त शिखर वाले, अशोक पेड़ की जड़ के पास, काम-व्यथा से विकल हो (तड़पते हुए) और कोमल पल्लवों से निर्मित शय्या को (अपने शरीर-ताप से) मुरझाते हुए—नल के पास पहुँचा ॥१३३॥