नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)
Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा
२०४ नैषधचरितम् । [ तृतीयः 'संख्यायाः क्रियाभ्यावृत्तिगणने कृत्वसुच्' । तथा = तदुक्तप्रकारेण, अन्वाचचक्षे = अनूदितवान् । मत्तोऽप्युक्तमेव पुनः पुनर्वक्तीति भावः ॥१३५॥ नरपति नल ने 'मेरी प्यारी ने क्या कहा, फिर क्या कहा'—ऐसा पूछने के बाद, हंस के कहने पर भी, अपनी प्रियतमा दमयन्ती के कहे हुए वाक्य को, उसके मुँह से फिर-फिर दुहरवाया। तत्पश्चात् हंस के मुख से सुने हुए, दमयन्ती के वाक्य को,—जैसे-जैसे हंस ने कहा था, वैसे-वैसे-( सैकड़ो ) बार-बार स्वयं भी कहा ॥ १३५ ॥ श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालङ्कारहीरः सुतं श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् । तर्तीयीकतया मितोऽयमगमत् तस्य प्रबन्धे महा- काव्ये चारुणि नैषधीयचरिते सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥१३६॥ इति श्रीहर्षविरचिते नैषधमहाकाव्ये तृतीयः सर्गः । श्रीहर्षमित्यादि । [ तार्तीयीकतया ] तृतीय एव तार्तीयीकः । द्वितीय- तृतीयाभ्यामीकक् स्वार्थे वक्तव्यः । तस्य भावस्तत्ता, तया मितस्तृतीय इत्यर्थः । शेषं सुगमम् ॥१३६॥ इति पदवाक्यप्रमाणपारावारपारीण-श्रीमहोपाध्यायकोलाचलमल्लिनाथसूरि- विरचितायां जीवातुसमाख्यायां नैषधटीकायां तृतीयः सर्गः । कविराज-समूहों के मुकुटों के अलङ्कार रूप हीरा मणि (अर्थात् असाधारण राष्ट्रकवि) श्री हीर नामक पिता तथा (अपने सौन्दर्य से मा=रमा को जीतने वाली) मा-मल्लदेवी माता ने जिस जितेन्द्रिय (विद्या-श्री से हर्षित होने वाले) श्री हर्ष- नामक पुत्र को उत्पन्न किया; उसके प्रबन्ध-महाकाव्य-(रस, भाव, अलङ्कार आदि से) मनोहर नैषधीय चरित में, स्वभावतः सुन्दर गिना जानेवाला तीसरा सर्ग समाप्त हुआ ॥१३६॥ श्रीमन्नालाल अभिमन्यु, एम० ए०, कृत 'मदयन्तिका' टीकासहित नैषधचरित महाकाव्य का तीसरा सर्ग समाप्त हुआ ॥३॥
卐 अथ पञ्चाङ्ग निर्णय 卐 संवत् १९५३ शाके १८१८ सन् १८९६-९७ का सब देश के लिये उपयोगी जिसमें तिथि नक्षत्रादि स्पष्टतया पृथक् पृथक् लिखे हैं तथा सब प्रकारके पर्व और धर्मकृत्य के प्रमाण दिये हैं मूल्य साधारण १) १॥) उत्तम जिल्ददार १॥) १॥॥) डाक महसूल अलग मिलने का ठिकाना बाबू शिवप्रसाद गुप्त सेवा उपवन काशी अथवा बाबू भगवान् दास हरिश्चन्द्र स्कूल के पास सेवा सदन काशी —: पत्रा मिलने का स्थान :— काशी-संस्कृत-यन्त्रालय बनारस सिटी
❉ निज प्रकाशित पुस्तकें ❉ मुहूर्त चिन्तामणि अन्वय भाषा टीका पं० प्यारेलाल २॥) लग्नचन्द्रिका फलित का अपूर्व ग्रन्थ २ वधू प्रवेश द्विरागमननिर्णय ।-) दुर्गा सप्तशती बड़ा अक्षर खुलापत्र १'=) बृहत् ज्योतिषसार भाषा टीका २) बेणी संहार नाटक पं० गौरीनाथ टीका ३) किरात १ से ३ सर्ग ताराचरण भट्टाचार्य २॥) किरात १ से ३ सर्ग सरस्वती टीका ॥=) महामृत्युञ्जय विधि प्रकाश ॥ कौमुदी अन्त्येष्टि व्याकरण १) विज्ञान मञ्जरी दोनों भाग तर्क संग्रह दीपिका किरणावली सहित १ गीता केवल भाषा २॥ रामायण भा० टी० ग्लेज १२ रामायण भा० टी० रफ १० पुस्तक मिलने का पता— पं० छन्नूलाल ज्ञानचन्द पाठक, संस्कृत पुस्तकालय, कचौड़ीगली, बनारस सिटी।
Digitized by Sarayu Trust Foundation and eGangotri CC-0. Prof. Satya Vrat Shastri Collection.
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