संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished770 पृष्ठ
पृष्ठ 507, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 507
| * पूर्वभाग-तृतीय पाद * | ५०५ |
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| करनेवाले, १२९. बकासुरविनाशनः= बकासुरका विनाश करनेवाले।<br>१३०. अघासुरविनाशी= अघासुर नामक सर्परूपधारी दैत्यका विनाश करनेवाले, १३१. विनिद्रीकृतबालकः= सर्पके विषसे मूर्च्छित गोपबालकोंको अपनी अमृतमयी दृष्टिसे जीवित करके जगानेवाले, १३२. आद्यः= सबके आदिकारण; १३३. आत्मप्रदः= प्रेमी भक्तोंके लिये अपने आत्मातकको दे डालनेवाले, १३४. सङ्गी= गोप-बालकोंके सङ्ग रहनेवाले, १३५. यमुनातीरभोजनः= यमुनाजीके तटपर ग्वालबालोंके साथ भोजन करनेवाले।<br>१३६. गोपालमण्डलीमध्यः= ग्वालबालोंकी मण्डलीके बीचमें बैठनेवाले, १३७. सर्वगोपाल-भूषणः= सम्पूर्ण ग्वालबालोंको विभूषित करनेवाले, १३८. कृतहस्ततलग्रासः= हथेलीमें अन्नका ग्रास लेनेवाले, १३९. व्यञ्जनाश्रितशाखिकः= वृक्षोंपर भोजन-सामग्री एवं व्यञ्जन रखनेवाले।<br>१४०. कृतबाहुशृङ्गयष्टिः= हाथोंमें सींग और छड़ी धारण करनेवाले, १४१. गुञ्जालंकृतकण्ठकः= गुञ्जाकी मालासे अपने कण्ठको विभूषित करनेवाले, १४२. मयूरपिच्छमुकुटः= मोरपंखका मुकुट धारण करनेवाले, १४३. वनमालाविभूषितः= वनमालासे अलंकृत।<br>१४४. गैरिकाचित्रितवपुः= गेरूसे अपने शरीरमें चित्रोंकी रचना करनेवाले, १४५. नवमेघवपुः= नवीन मेघ-घटाके समान श्याम शरीरवाले, १४६. स्मरः= कामदेवस्वरूप, १४७. कोटिकन्दर्पलावण्यः= करोड़ों कामदेवोंके समान सौन्दर्यशाली, १४८. लसन्मकरकुण्डलः= सुन्दर मकराकृति कुण्डल धारण करनेवाले।<br>१४९. आजानुबाहुः= घुटनेतक लंबी भुजावाले, १५०. भगवान्= ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य—इन छहों ऐश्वर्योंसे पूर्णतया युक्त, | १५१. निद्रारहितलोचनः= निद्राशून्य नेत्रोंवाले, १५२. कोटिसागरगाम्भीर्यः= करोड़ों समुद्रोंके समान गम्भीर, १५३. कालकालः= कालके भी महाकाल, १५४. सदाशिवः= नित्य कल्याणस्वरूप।<br>१५५. विरञ्चिमोहनवपुः= अपने अद्भुतरूपसे ब्रह्माजीको भी मोहमें डालनेवाले, १५६. गोप-वत्सवपुर्धरः= ग्वालबालों और बछड़ोंका रूप धारण करनेवाले, १५७. ब्रह्माण्डकोटिजनकः= करोड़ों ब्रह्माण्डोंके उत्पादक, १५८. ब्रह्ममोहविनाशकः= ब्रह्माजीके मोहका नाश करनेवाले।<br>१५९. ब्रह्मा= स्वयं ही ब्रह्माजीके रूपमें प्रकट, १६०. ब्रह्मेडितः= ब्रह्माजीके द्वारा स्तुत, १६१. स्वामी= सबके अधिपति, १६२. शक्रदर्पादिनाशनः= इन्द्रके घमण्ड आदिको नष्ट करनेवाले, १६३. गिरिपूजोपदेष्टा= गोवर्धन पर्वतकी पूजाका उपदेश देनेवाले, १६४. धृतगोवर्धनाचलः= गोवर्धन पर्वतको धारण करनेवाले।<br>१६५. पुरन्दरेडितः= इन्द्रके द्वारा स्तुत, १६६. पूज्यः= सबके लिये पूजनीय, १६७. कामधेनुप्रपूजितः= कामधेनुद्वारा पूजित, १६८. सर्वतीर्थाभिषिक्तः= सुरभिद्वारा सम्पूर्ण तीर्थोंके जलसे इन्द्रपदपर अभिषिक्त, १६९. गोविन्दः= गौओंके इन्द्र होनेपर गोविन्द नामसे प्रसिद्ध, १७०. गोपरक्षकः= गोपोंकी रक्षा करनेवाले।<br>१७१. कालियार्तिकरः= कालिय नागका दमन करनेवाले, १७२. क्रूरः= दुष्टोंको दण्ड देनेके लिये कठोर, १७३. नागपत्नीरितः= नागपत्नियोंद्वारा स्तुत, १७४. विराद्= विराट् पुरुष, १७५. धेनुकारिः= धेनुकासुरके शत्रु, १७६. प्रलम्बारिः= बलभद्ररूपसे प्रलम्ब नामक असुरका नाश करनेवाले, १७७. वृषासुरविमर्दनः= वृषभरूपधारी अरिष्टासुरका मर्दन करनेवाले।<br>१७८. मयासुरआत्मजध्वंसी= मयासुरके पुत्र |