भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 739
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देते हैं। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर—इन तीन युगोंमें तो सब लोग उन्हें प्रत्यक्ष देखते हैं, किंतु कलियुगमें जबतक उसका एक चरण स्थित रहता है, वे अन्तर्धान हो जाते हैं। जो वहाँ जाकर भक्तिभावसे युक्त हो कामाक्षा देवीकी नित्य पूजा करते हुए एक वर्षतक सिद्धनाथजीका चिन्तन करता है, वह स्वप्नमें उनका दर्शन पाता है। दर्शनके अन्तमें एकाग्रचित्त होकर उनके द्वारा सूचित की हुई सिद्धिको पाकर इस पृथ्वीपर सिद्ध होता है। शुभे! फिर वह सब लोगोंकी कामना पूर्ण करता हुआ सर्वत्र विचरता है। तीनों लोकोंमें जो-जो वस्तुएँ हैं, उन सबको वह वरदानके प्रभावसे खींच लेता है। भद्रे! विज्ञानमें पारङ्गत योगी मत्स्यनाथ ही 'सिद्धनाथ'के नामसे वहाँ विराजमान हैं। वे लोगोंको अभीष्ट वस्तुएँ देते हुए अत्यन्त घोर तपस्यामें लगे हैं।

प्रभासक्षेत्रका माहात्म्य तथा उसके अवान्तर तीर्थोंकी महिमा

मोहिनी बोली—द्विजश्रेष्ठ! अब मुझे प्रभासक्षेत्रका माहात्म्य बताइये; जिसे सुनकर मेरा चित्त प्रसन्न हो जाय और मैं आपके कृपा-प्रसादसे अपनेको धन्य समझूँ।

पुरोहित वसुने कहा—देवि! सुनो, मैं उत्तम पुण्यदायक प्रभासतीर्थका वर्णन करता हूँ। वह मनुष्योंके सब पापोंको हर लेनेवाला और भोग एवं मोक्ष देनेवाला है। विधिनन्दिनि! जिसमें असंख्य तीर्थ हैं और जहाँ गिरिजापति भगवान् विश्वनाथ सोमनाथके नामसे प्रसिद्ध हैं, उस प्रभासतीर्थमें स्नान करके सोमनाथकी पूजा करनेपर मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है। प्रभासमण्डलका विस्तार बारह योजनका है। उसके मध्यमें इस तीर्थकी पीठिका है, जो पाँच योजन विस्तृत कही गयी है। उसके मध्य भागमें गोचर्ममात्र* तीर्थ है, जिसका महत्त्व कैलाससे भी अधिक है। वहीं एक परम दूसरा सुन्दर पुण्यतीर्थ है, जिसे अर्कस्थल कहते हैं। उस तीर्थमें सिद्धेश्वर आदि सहस्रों लिङ्ग हैं। उसमें स्नान करके भक्तिभावसे देवता, पितरोंका तर्पण तथा शिवलिङ्गोंका पूजन करके मनुष्य भगवान् रुद्रके लोकमें जाता है। इसके सिवा समुद्रतटपर दूसरा तीर्थ, जिसको अग्नितीर्थ कहते हैं, विद्यमान है। देवि! उसमें स्नान करके मनुष्य अग्निलोकमें जाता है। वहाँ उपवासपूर्वक भगवान् कपर्दीश्वरकी पूजा करके मानव इहलोकमें मनोवाञ्छित भोगोंका उपभोग करता और अन्तमें शिवलोकको प्राप्त होता है। तदनन्तर केदारेश्वरके समीप जाकर विधिपूर्वक उनकी पूजा करके मनुष्य देवपूजित हो विमानद्वारा स्वर्गलोकमें जाता है। कपर्दीश्वर और केदारेश्वरके पश्चात् क्रमशः भीमेश्वर, भैरवेश्वर, चण्डीश्वर, भास्करेश्वर, अङ्गारेश्वर, गुर्वीश्वर, सोमेश्वर, भृगुजेश्वर, शनीश्वर, राह्वीश्वर तथा केत्वीश्वरकी पूजा करे। इस प्रकार क्रमशः चौदह लिङ्गोंकी यात्रा करनी चाहिये। विधिज्ञ पुरुष भक्तिभावसे उन सबकी पृथक्-पृथक् पूजा करके भगवान् शिवका सालोक्य पाता और निग्रहानुग्रहमें समर्थ हो जाता है। वरारोहा, अजापाला, मङ्गला तथा ललितेश्वरी—इन देवियोंका क्रमशः पूजन करके मनुष्य निष्पाप हो जाता है। लक्ष्मीश्वर, बाडवेश्वर, अर्घ्येश्वर तथा कामकेश्वरका भक्तिपूर्वक पूजन करके मानव लोकेश ब्रह्माजीका पद प्राप्त कर लेता है। गौरी-तपोवनमें जाकर गौरीश्वर, वरुणेश्वर तथा उषेश्वरका पूजन करके मानव स्वर्गलोक पाता है। जो मानव


*२१०० हाथ लंबी-और इतनी ही चौड़ी भूमिको 'गोचर्म भूमि' कहते हैं। (हिंदी-शब्दसागर)