भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ
  • उत्तरभाग * | ७३७ ---|---

देते हैं। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर—इन तीन युगोंमें तो सब लोग उन्हें प्रत्यक्ष देखते हैं, किंतु कलियुगमें जबतक उसका एक चरण स्थित रहता है, वे अन्तर्धान हो जाते हैं। जो वहाँ जाकर भक्तिभावसे युक्त हो कामाक्षा देवीकी नित्य पूजा करते हुए एक वर्षतक सिद्धनाथजीका चिन्तन करता है, वह स्वप्नमें उनका दर्शन पाता है। दर्शनके अन्तमें एकाग्रचित्त होकर उनके द्वारा सूचित की हुई सिद्धिको पाकर इस पृथ्वीपर सिद्ध होता है। शुभे! फिर वह सब लोगोंकी कामना पूर्ण करता हुआ सर्वत्र विचरता है। तीनों लोकोंमें जो-जो वस्तुएँ हैं, उन सबको वह वरदानके प्रभावसे खींच लेता है। भद्रे! विज्ञानमें पारङ्गत योगी मत्स्यनाथ ही 'सिद्धनाथ'के नामसे वहाँ विराजमान हैं। वे लोगोंको अभीष्ट वस्तुएँ देते हुए अत्यन्त घोर तपस्यामें लगे हैं।

प्रभासक्षेत्रका माहात्म्य तथा उसके अवान्तर तीर्थोंकी महिमा

मोहिनी बोली—द्विजश्रेष्ठ! अब मुझे प्रभासक्षेत्रका माहात्म्य बताइये; जिसे सुनकर मेरा चित्त प्रसन्न हो जाय और मैं आपके कृपा-प्रसादसे अपनेको धन्य समझूँ।

पुरोहित वसुने कहा—देवि! सुनो, मैं उत्तम पुण्यदायक प्रभासतीर्थका वर्णन करता हूँ। वह मनुष्योंके सब पापोंको हर लेनेवाला और भोग एवं मोक्ष देनेवाला है। विधिनन्दिनि! जिसमें असंख्य तीर्थ हैं और जहाँ गिरिजापति भगवान् विश्वनाथ सोमनाथके नामसे प्रसिद्ध हैं, उस प्रभासतीर्थमें स्नान करके सोमनाथकी पूजा करनेपर मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है। प्रभासमण्डलका विस्तार बारह योजनका है। उसके मध्यमें इस तीर्थकी पीठिका है, जो पाँच योजन विस्तृत कही गयी है। उसके मध्य भागमें गोचर्ममात्र* तीर्थ है, जिसका महत्त्व कैलाससे भी अधिक है। वहीं एक परम दूसरा सुन्दर पुण्यतीर्थ है, जिसे अर्कस्थल कहते हैं। उस तीर्थमें सिद्धेश्वर आदि सहस्रों लिङ्ग हैं। उसमें स्नान करके भक्तिभावसे देवता, पितरोंका तर्पण तथा शिवलिङ्गोंका पूजन करके मनुष्य भगवान् रुद्रके लोकमें जाता है। इसके सिवा समुद्रतटपर दूसरा तीर्थ, जिसको अग्नितीर्थ कहते हैं, विद्यमान है। देवि! उसमें स्नान करके मनुष्य अग्निलोकमें जाता है। वहाँ उपवासपूर्वक भगवान् कपर्दीश्वरकी पूजा करके मानव इहलोकमें मनोवाञ्छित भोगोंका उपभोग करता और अन्तमें शिवलोकको प्राप्त होता है। तदनन्तर केदारेश्वरके समीप जाकर विधिपूर्वक उनकी पूजा करके मनुष्य देवपूजित हो विमानद्वारा स्वर्गलोकमें जाता है। कपर्दीश्वर और केदारेश्वरके पश्चात् क्रमशः भीमेश्वर, भैरवेश्वर, चण्डीश्वर, भास्करेश्वर, अङ्गारेश्वर, गुर्वीश्वर, सोमेश्वर, भृगुजेश्वर, शनीश्वर, राह्वीश्वर तथा केत्वीश्वरकी पूजा करे। इस प्रकार क्रमशः चौदह लिङ्गोंकी यात्रा करनी चाहिये। विधिज्ञ पुरुष भक्तिभावसे उन सबकी पृथक्-पृथक् पूजा करके भगवान् शिवका सालोक्य पाता और निग्रहानुग्रहमें समर्थ हो जाता है। वरारोहा, अजापाला, मङ्गला तथा ललितेश्वरी—इन देवियोंका क्रमशः पूजन करके मनुष्य निष्पाप हो जाता है। लक्ष्मीश्वर, बाडवेश्वर, अर्घ्येश्वर तथा कामकेश्वरका भक्तिपूर्वक पूजन करके मानव लोकेश ब्रह्माजीका पद प्राप्त कर लेता है। गौरी-तपोवनमें जाकर गौरीश्वर, वरुणेश्वर तथा उषेश्वरका पूजन करके मानव स्वर्गलोक पाता है। जो मानव


*२१०० हाथ लंबी-और इतनी ही चौड़ी भूमिको 'गोचर्म भूमि' कहते हैं। (हिंदी-शब्दसागर)

७३८* संक्षिप्त नारदपुराण *

गणेश, कुमारेश, स्वाककेश, कुलेश्वर, उत्तङ्केश, वह्नीश, गौतम तथा दैत्यसूदनका विधिपूर्वक पूजन करता है, वह कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। तदनन्तर चक्रतीर्थमें जाकर वहाँ विधिपूर्वक स्नान और गौरीदेवीकी पूजा करके मनुष्य मनोवाञ्छित फल पाता है। वरानने! सन्निहत्यतीर्थमें जाकर वहाँ स्नान तथा देवता आदिका तर्पण करके उसका पूरा फल पाता है। जो भूतेश्वर आदि ग्यारह लिङ्गोंका पूजन करता है, वह इस लोकमें उत्तम भोग प्राप्त करके अन्तमें भगवान् रुद्रके लोकमें जाता है। देवि! जो श्रेष्ठ मानव भगवान् आदिनारायणकी पूजा करता है, वह मोक्षका भागी होता है।

नरेश्वरि! तत्पश्चात् मानव बालब्रह्माके समीप जाकर सब देवताओंसे पूजित हो भोग एवं मोक्षका अधिकारी होता है। तदनन्तर गङ्गा-गणपतिके पास जाकर उनकी विधिपूर्वक पूजा करनेसे श्रद्धालु पुरुष इहलोक और परलोकमें मनोवाञ्छित कामनाएँ प्राप्त कर लेता है। तत्पश्चात् जाम्बवती नदीमें जाकर वहाँ भक्तिभावसे एकाग्रचित्त होकर स्नान और देवता आदिका पूजन करनेसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। तदनन्तर पाण्डुकूपमें स्नान करके पाण्डवेश्वरकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेवाला मानव स्वर्गलोकमें जाता है। तत्पश्चात् यादवस्थलमें जाकर मानव यदि वर्षेश्वरका पूजन करे तो वह देवराज इन्द्रसे सम्मानित होकर मनोवाञ्छित सिद्धिलाभ करता है। हिरण्यासंगममें स्नान करके जो मानव भक्तिपूर्वक भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये ब्राह्मणको सुवर्णयुक्त रथ दान करता है, वह अक्षय लोक पाता है। तत्पश्चात् नगरादित्यकी पूजा करके मानव सूर्यलोक प्राप्त कर लेता है। नगरादित्यके समीप बलभद्र, श्रीकृष्ण और सुभद्राका दर्शन एवं विधिपूर्वक पूजन करनेसे मानव भगवान् श्रीकृष्णका सायुज्य-लाभ करता है। तदनन्तर कुमारिकाके समीप जाकर विधिपूर्वक पूजा करके मनुष्य मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और इन्द्रलोकका अधिकारी होता है। जो सरस्वतीके तटपर स्थित ब्रह्मेश्वरका पूजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। पिङ्गला नदीके समीप जाकर उसमें स्नान करके जो मनुष्य देवता आदिका तर्पण और श्राद्ध करता है, वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। सङ्गमेश्वरका पूजन करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। शङ्करादित्य, घटेश तथा महेश्वरका पूजन करके मनुष्य निश्चय ही अपनी सम्पूर्ण कामनाएँ पा लेता है।

तदनन्तर ऋषितीर्थमें जाय; वहाँ स्नान करके मनको संयममें रखते हुए ऋषियोंका पूजन करे। ऐसा करनेवालेको सम्पूर्ण तीर्थोंका फल प्राप्त होता है। तदनन्तर नन्दादित्यकी पूजा करके मनुष्य सब रोगोंसे मुक्त होता है। तत्पश्चात् त्रित कूपके समीप जाकर वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है। तदनन्तर न्यंकुमती नदीके समीप जाकर वहाँ विधिपूर्वक स्नान और सिद्धेश्वरका पूजन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष अणिमा आदि सिद्धियोंका भागी होता है। वाराह स्वामीका दर्शन करके मनुष्य भवसागरसे मुक्त हो जाता है। छायालिङ्गका पूजन करके पुरुषको सम्पूर्ण पातकोंसे छुटकारा मिल जाता है। सती मोहिनी! जो मानव कनकनन्दा देवीका भलीभाँति पूजन करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको पाता और शरीरका अन्त होनेपर स्वर्गलोकमें जाता है। कुन्तीश्वरका पूजन करनेसे मनुष्य सब पातकोंसे छूट जाता है। जो मानव गङ्गाजीमें स्नान करके गङ्गेश्वरका पूजन करता है, वह तीन प्रकारके पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो चमसोद्भेदतीर्थमें स्नान करके पिण्डदान करता है, वह गयाकी अपेक्षा कोटिगुने पुण्यका भागी होता है। ब्रह्मकुमारी! तत्पश्चात् उत्तम

\ उत्तरभाग \

* उत्तरभाग * ७३९


विदुराश्रममें जाकर त्रिग और त्रिभुवनेश्वरका पूजन करनेसे मनुष्य सुखी होता है। मङ्कणेश्वरका पूजन करके मानव उत्तम गति पाता है। त्रैपुर और त्रिलिङ्गकी पूजा करनेपर सब पापोंसे छुटकारा मिल जाता है। जो मनुष्य षण्डतीर्थमें जाकर स्नान करके सुवर्ण दान करता है, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त हो भगवान् शिवके धाममें जाता है। त्रिलोचनमें स्नान करनेसे रुद्रलोककी प्राप्ति होती है। देविकामें उमानाथका पूजन करके श्रेष्ठ मानव मनोवाञ्छित कामनाओंको पाता और शरीरका अन्त होनेपर स्वर्गलोकमें जाता है। भृङ्गारकी पूजा करनेसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। शूलस्थानमें वाल्मीकिको नमस्कार करके मनुष्य कवि होता है। तदनन्तर च्यवनादित्यका पूजन करके तीर्थसेवी पुरुष सम्पूर्ण भोगसामग्रियोंसे सम्पन्न होता है। च्यवनेश्वरके पूजनसे मानव भगवान् शिवका अनुचर होता है। प्रजापालेश्वरकी पूजासे धन-धान्यकी वृद्धि होती है। बालादित्यकी पूजा करनेवाला मनुष्य विद्वान् और धनवान् होता है। कुबेरस्थानमें स्नान करके मानव निश्चय ही निधि पाता है। ऋषितोया नदीमें जाकर वहाँ स्नान करनेसे मानव पवित्र हो ब्राह्मणको सुवर्ण दान करे तो सब पातकोंसे छूट जाता है। सङ्गालेश्वरकी पूजा करनेसे रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।

तदनन्तर नारायणदेवकी पूजा करनेसे मनुष्य मोक्षका भागी होता है। तप्तकुण्डोदकमें स्नान करके मूलचण्डीश्वरकी पूजा करे। इससे समस्त पापोंसे मुक्त हुआ मानव मनोवाञ्छित वस्तुको पा लेता है। चतुर्मुख विनायककी पूजा करनेसे भी अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति होती है। क्षेमादित्यके पूजनसे मनुष्य क्षेमयुक्त, सफलमनोरथ तथा सत्यका भागी होता है। रुक्मिणी देवीकी पूजा की जाय तो वे मनुष्योंको अभीष्ट वस्तु देती हैं। दुर्वासेश्वर और पिङ्गेश्वरकी पूजा करनेसे मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। भद्रासङ्गममें स्नान करके मनुष्य सैकड़ों कल्याणकी बातें देखता है। मोक्षतीर्थमें स्नान करके मानव भवसागरसे मुक्त हो जाता है। नारायणगृहमें जाकर मानव फिर कभी शोक नहीं करता। हुंकारतीर्थमें स्नान करनेवाला पुरुष गर्भवासका कष्ट नहीं पाता तथा चण्डीश्वरका पूजन करनेसे सब तीर्थोंका फल मिल जाता है। आशापूरनिवासी विघ्नेश्वरका पूजन करनेसे विघ्नकी प्राप्ति नहीं होती। कलाकुण्डमें स्नान करनेवाला मानव निस्संदेह मोक्षका भागी होता है। नारदेश्वरका पूजक भगवान् विष्णु और शङ्करका भक्त होता है। भल्लतीर्थमें स्नान करके मानव समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है और कर्दमालतीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यके समस्त पातक दूर हो जाते हैं। गुप्त सोमनाथका दर्शन करके मनुष्य फिर कभी शोकमें नहीं पड़ता। शृङ्गेश्वरका पूजन करनेवाला पुरुष दुःखोंसे पीड़ित नहीं होता। नारायणतीर्थमें स्नान करनेवाला मानव मोक्ष प्राप्त कर लेता है। मार्कण्डेयेश्वरके पूजनसे मनुष्य दीर्घायु होता है।

७४० * संक्षिप्त नारदपुराण *


कोटिह्रदमें स्नान करके कोटीश्वरका पूजन करनेसे मानव सुखी होता है। फिर सिद्धस्थानमें स्नान करके जो मनुष्य वहाँके असंख्य शिव-लिङ्गोंका पूजन करता है, वह इस पृथ्वीपर सिद्ध होता है। दामोदरगृहका दर्शन करके मनुष्य उत्तम सुख पाता है। शुभे! प्रभासके नाभिस्थानमें वस्त्रापथतीर्थ है। वहाँ भगवान् शङ्करकी आराधना करनेसे मनुष्य स्वयं साक्षात् शङ्करके समान हो जाता है। दामोदरमें स्वर्णरेखातीर्थ, रैवतक पर्वतपर ब्रह्मकुण्ड, उज्जयन्ततीर्थमें कुन्तीश्वर और महातेजस्वी भीमेश्वर तथा वस्त्रापथक्षेत्रमें मृगीकुण्डतीर्थ सर्वस्व माना गया है। इनमें क्रमशः स्नान करके देवताओंका यत्नपूर्वक पूजन तथा जलसे पितरोंका तर्पण करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण तीर्थोंका फल पाता है। तदनन्तर गङ्गेश्वरका पूजन करनेसे मनुष्यको गङ्गास्नानका फल मिलता है। देवि! रैवतक पर्वतपर बहुतसे तीर्थ हैं। उनमें स्नान करके भक्तिपूर्वक ब्रह्मा, विष्णु, शिव और इन्द्र आदि लोकपालोंकी पूजा करनेसे मनुष्य भोग और मोक्ष दोनों पा लेता है। सुन्दरि! ये सब तीर्थ तुमसे बहुत थोड़ेमें बताये गये हैं। इनमें अवान्तरतीर्थ तो अनन्त हैं, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता। मोहिनि! तीनों लोकोंमें प्रभास-क्षेत्रके समान दूसरा कोई तीर्थ नहीं है।

पुष्कर-माहात्म्य

मोहिनि बोली— द्विजश्रेष्ठ! प्रभासक्षेत्रका अत्यन्त पुण्यदायक माहात्म्य सुना। अब पुष्करतीर्थका, जो कि मेरे पिता ब्रह्माजीका यज्ञसदन है, माहात्म्य विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।

पुरोहित वसुने कहा— भद्रे! सुनो; मैं पुष्करके पवित्र माहात्म्यका, जो मनुष्योंको सदा अभीष्ट वस्तु देनेवाला है, वर्णन करता हूँ। इसमें अनेक तीर्थोंका माहात्म्य सम्मिलित है। जहाँ भगवान् विष्णुके साथ इन्द्र आदि देवता, गणेश, रैवत और सूर्य विराजमान हैं, उस पुष्करवनमें जो बिना किसी साधनके भी निवास करता है, वह अष्टाङ्गयोग-साधनका पुण्य पाता है। पृथ्वीपर इससे बढ़कर दूसरा कोई क्षेत्र नहीं है। अतः श्रेष्ठ मानवोंको सर्वथा प्रयत्न करके इस उत्तम क्षेत्रका सेवन करना चाहिये। जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र इस क्षेत्रमें निवास करते हुए सर्वतोभावेन ब्रह्माजीमें भक्ति रखते और सभी जीवोंपर दया करते हैं, वे ब्रह्माजीके लोकमें जाते हैं। पुष्करवनमें, जहाँ प्राची सरस्वती बहती हैं, जानेसे मनुष्यको मति (मननशक्ति), स्मृति (स्मरणशक्ति), दया, प्रज्ञा (उत्कृष्ट ज्ञानशक्ति), मेधा (धारणाशक्ति) और बुद्धि (निश्चयात्मक वृत्ति) प्राप्त होती है। जो वहाँ तटपर स्थित होकर प्राची सरस्वतीके उस जलको पीते हैं, वे भी अश्वमेध-यज्ञका फल पाकर सुखस्वरूप ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। पुष्करमें तीन उज्ज्वल शिखर हैं, तीन निर्मल झरने हैं तथा ज्येष्ठ, मध्य और कनिष्ठ—ये तीन सरोवर हैं। सती मोहिनि! वहाँ नन्दासरस्वतीके नामसे सुप्रसिद्ध महान् तीर्थ है, जो पुष्करसे एक योजन दूर पश्चिम दिशामें विद्यमान है। वहाँ विधिपूर्वक स्नान और वेदवेत्ता ब्राह्मणको दूध देनेवाली गौका दान करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकमें जाता है। इसके सिवा वहाँ कोटितीर्थ है, जहाँ करोड़ों ऋषियोंका आगमन हुआ था। वहाँ स्नान और ब्राह्मणोंका पूजन करके मनुष्य सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। उसके बाद अगस्त्याश्रममें जाकर स्नान और कुम्भज ऋषिका पूजन करके मनुष्य भोगसामग्रीसे सम्पन्न और दीर्घायु होता है तथा शरीरका अन्त होनेपर वह स्वर्गलोकमें जाता है। सप्तर्षियोंके आश्रममें जाकर वहाँ एकाग्रचित्त

\ उत्तरभाग \ ७४१

* उत्तरभाग * ७४१


हो स्नान तथा भक्तिभावसे उनका पूजन करके मनुष्य सप्तर्षिलोकमें जाता है। मनुके आश्रममें स्नान करके मानव सर्वत्र पूजा प्राप्त करता है। गङ्गाके उद्गमस्थानमें स्नान करनेसे गङ्गास्नानका फल मिलता है। ज्येष्ठ पुष्करमें स्नान करके ब्राह्मणको गोदान देनेसे मनुष्य इहलोकमें सम्पूर्ण भोगोंके पश्चात् ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। मध्यम पुष्करमें स्नान करके ब्राह्मणको भूदान करनेवाला पुरुष श्रेष्ठ विमानपर बैठकर भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। कनिष्ठ पुष्करमें स्नान और ब्राह्मणको सुवर्ण दान करके मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको पाता और अन्तमें भगवान् रुद्रके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। तदनन्तर विष्णुपदमें स्नान और ब्राह्मणको कुछ दान करके मनुष्य भगवान् विष्णुके प्रसादसे समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। तत्पश्चात् नागतीर्थमें स्नान और नागोंका पूजन करके ब्राह्मणोंको दान देनेसे मनुष्य एक युगतक स्वर्गमें आनन्द भोगता है। आकाशमें पुष्करका चिन्तन करके 'आपो हि ष्ठा' इत्यादि मन्त्रोंद्वारा जो पुष्करवनमें स्नान करता है, वह शाश्वत ब्रह्मपदको प्राप्त कर लेता है।

जब कभी कार्तिककी पूर्णिमाको कृत्तिका नक्षत्र हो तो वह महातिथि समझी जाती है। उस समय आकाश पुष्करमें स्नान करना चाहिये। भरणी नक्षत्रसे युक्त कार्तिककी पूर्णिमाको मध्यम पुष्करमें स्नान करनेवाला मानव आकाश पुष्करमें स्नान करनेका पुण्यफल पाता है। रोहिणी नक्षत्रसे युक्त कार्तिककी पूर्णिमाको कनिष्ठ पुष्करमें स्नान करनेवाला पुरुष आकाश पुष्करजनित पुण्यफलका भागी होता है। जब सूर्य भरणी नक्षत्रपर, बृहस्पति कृत्तिकापर तथा चन्द्रमा रोहिणी नक्षत्रपर हों और नन्दा तिथिका योग हो तो उस समय पुष्करमें स्नान करनेपर आकाश पुष्करका सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है। जब विशाखा नक्षत्रपर सूर्य और कृत्तिका नक्षत्रपर चन्द्रमा हों, तब आकाश पुष्कर नामक योग होता है। उसमें स्नान करनेवाला पुरुष स्वर्गलोकमें जाता है। आकाशमें उतरे हुए इस कल्याणमय पितामहतीर्थमें जो मनुष्य स्नान करते हैं, उन्हें महान् अभ्युदयकारी लोक प्राप्त होते हैं। सती मोहिनी! पुष्करवनमें पञ्चस्रोता सरस्वती नदीमें सिद्ध महर्षियोंने बहुत-से तीर्थ और देवस्थान स्थापित किये हैं। जो मनुष्य यहाँ श्रेष्ठ ब्राह्मणको धान्य और तिल दान करता है, वह इहलोक और परलोकमें परम गतिको प्राप्त होता है। जो गङ्गा-सरस्वतीके सङ्गममें स्नान करके ब्राह्मणोंका पूजन करता है, वह इहलोकमें मनोवाञ्छित भोग भोगनेके पश्चात् श्रेष्ठ गतिको प्राप्त होता है। सती मोहिनी! जो मानव अवियोगा बावड़ीमें स्नान करके विधिपूर्वक पिण्डदान देता है, वह अपने पितरोंको स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है। जो अजगन्ध शिवके समीप जाकर उनकी विधिपूर्वक पूजा करता है, वह इहलोक और परलोकमें भी मनोवाञ्छित भोग पाता है। पुष्करतीर्थमें सरोवरसे दक्षिण भागमें एक पर्वतशिखरपर सावित्री देवी विराजमान हैं। जो उनकी पूजा करता है, वह वेदके तत्त्वका ज्ञाता होता है। मोहिनी! वहाँ भगवान् वाराह, नृसिंह, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, चन्द्रमा, कार्तिकेय, पार्वती तथा अग्निके पृथक्-पृथक् तीर्थ हैं। महाभागे! जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर उनमें स्नान करके ब्राह्मणोंको दान देता है, वह उत्तम गति पाता है। पुष्करमें स्नान दुर्लभ है, पुष्करमें तपस्याका अवसर भी दुर्लभ है, पुष्करमें दान दुर्लभ है और पुष्करमें रहनेका सुयोग भी दुर्लभ है। सौ योजन दूर रहकर भी जो मनुष्य स्नानके समय भक्तिभावसे पुष्करका चिन्तन करता है, वह उसमें स्नानका फल पाता है।

७४२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

गौतमाश्रम-माहात्म्यमें गोदावरीके प्राकट्यका तथा पञ्चवटीके माहात्म्यका वर्णन

**मोहिनी बोली—**वसुजी! मैंने पुष्करका पापनाशक माहात्म्य सुन लिया। प्रभो! अब गौतम-आश्रमका माहात्म्य कहिये।

**पुरोहित वसुने कहा—**देवि! महर्षि गौतमका आश्रम परम पवित्र तथा देवर्षियोंद्वारा सेवित है। वह सब पापोंका नाशक तथा सब प्रकारके उपद्रवोंकी शान्ति करनेवाला है। जो मनुष्य भक्तिभावसे युक्त हो बारह वर्षोंतक गौतम-आश्रमका सेवन करता है, वह भगवान् शिवके धाममें जाता है, जहाँ जाकर मनुष्य शोकका अनुभव नहीं करता। ब्रह्मपुत्री मोहिनी! महर्षि गौतमके तपस्या करते समय एक बार बारह वर्षोंतक घोर अनावृष्टि हुई, जो समस्त जीवोंका संहार करनेवाली थी। शुभे! उस भयानक दुर्भिक्षके आरम्भ होते ही सब मुनि अनेक देशोंसे गौतमके आश्रमपर आये। उन्होंने तपस्वी गौतमको इस बातकी जानकारी करायी कि 'आप हमें भोजन दें, जिससे हमारे प्राण शरीरमें रह सकें।' उन मुनियोंके इस प्रकार सूचना देनेपर महर्षि गौतमको बड़ी दया आयी। वे अपने ऊपर विश्वास करनेवाले उन ऋषियोंसे अपनी तपस्याके बलपर बोले।

**गौतमने कहा—**मुनियो! आप सब लोग मेरे आश्रमके समीप ठहरें। जबतक यह दुर्भिक्ष रहेगा, तबतक मैं आदरपूर्वक आपको भोजन दूँगा।

ऐसा कहकर गौतमने तपोबलसे गङ्गादेवीका ध्यान किया। उनके स्मरण करते ही गङ्गादेवी पृथ्वीतलसे प्रकट हुईं। महर्षिने गङ्गाजीको प्रकट हुई देख प्रातःकाल पृथ्वीपर अगहनीके बीज रोपे और दोपहर होते-होते वे धानके पौधे बढ़कर उनमें फल लग गये। उसी समय वे पक भी गये; अतः मुनिने उन सबको काट लिया। फिर उसी अगहनीके चावलसे रसोई तैयार करके उन्होंने उन ऋषियोंको भोजन कराया। भद्रे! इस प्रकार प्रतिदिन पके हुए अगहनी धानके चावलोंसे गौतमजीने भक्तिभावसे युक्त हो उन अतिथियोंका अतिथिसत्कार किया। तदनन्तर नित्यप्रति ब्राह्मण-भोजन कराते हुए मुनीश्वर गौतमके बारह वर्ष बीत जानेपर दुर्भिक्षकाल समाप्त हो गया। इसलिये वे सब मुनि मुनिश्रेष्ठ गौतमसे पूछकर अपने-अपने देशको चले गये। मोहिनी! गौतम मुनि बहुत वर्षोंतक वहाँ तपस्यामें लगे रहे।

तदनन्तर अम्बिकापति भगवान् शिवने उनकी तपस्यासे संतुष्ट हो उन्हें अपने पार्षदगणोंके साथ दर्शन दिया और कहा—'वर माँगो।' तब मुनिवर गौतमने भगवान् त्र्यम्बकको साष्टाङ्ग प्रणाम किया और बोले—'सबका कल्याण करनेवाले भगवन्!

आपके चरणोंमें मेरी सदा भक्ति बनी रहे और मेरे आश्रमके समीप इसी पर्वतके ऊपर आपको मैं सदा विराजमान देखूँ, यही मेरे लिये अभीष्ट

उत्तरभाग ७४३

  • उत्तरभाग * ७४३

वर है।' मुनिके ऐसा कहनेपर भक्तोंको मनोवाञ्छित वर देनेवाले पार्वतीवल्लभ भगवान् शिवने उन्हें अपना सामीप्य प्रदान किया। भगवान् त्र्यम्बक उसी रूपसे वहीं निवास करने लगे। तभीसे वह पर्वत त्र्यम्बक कहलाने लगा। शुभगे! जो मानव भक्तिभावसे गोदावरी-गङ्गामें जाकर स्नान करते हैं, वे भवसागरसे मुक्त हो जाते हैं। जो लोग गोदावरीके जलमें स्नान करके उस पर्वतपर विराजमान भगवान् त्र्यम्बकका विविध उपचारोंसे पूजन करते हैं, वे साक्षात् महेश्वर हैं। मोहिनी! भगवान् त्र्यम्बकका यह माहात्म्य मैंने संक्षेपसे बताया है। तदनन्तर जहाँतक गोदावरीका साक्षात् दर्शन होता है, वहाँतक बहुत-से पुण्यमय आश्रम हैं। उन सबमें स्नान करके देवताओं तथा पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण करनेसे मनुष्य मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। भद्रे ! गोदावरी कहीं प्रकट हैं और कहीं गुप्त हैं; फिर आगे जाकर पुण्यमयी गोदावरी नदीने इस पृथ्वीको आप्लावित किया है। मनुष्योंकी भक्तिसे जहाँ वे महेश्वरी देवी प्रकट हुई हैं, वहाँ महान् पुण्यतीर्थ है जो स्नानमात्रसे पापोंको हर लेनेवाला है। तदनन्तर गोदावरी देवी पञ्चवटीमें जाकर भलीभाँति प्रकाशमें आयी हैं। वहाँ वे सम्पूर्ण लोकोंको उत्तम गति प्रदान करती हैं। विधिनन्दिनि ! जो मनुष्य नियम एवं व्रतका पालन करते हुए पञ्चवटीकी गोदावरीमें स्नान करता है, वह अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जब त्रेतायुगमें भगवान् श्रीराम अपनी धर्मपत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मणके साथ आकर रहने लगे, तबसे उन्होंने पञ्चवटीको और भी पुण्यमयी बना दिया। शुभे! इस प्रकार यह सब गौतमाश्रमका माहात्म्य कहा गया है।

पुण्डरीकपुरका माहात्म्य, जैमिनिद्वारा भगवान् शङ्करकी स्तुति

मोहिनी बोली— गुरुदेव ! आपने जो गौतम-आश्रम तथा महर्षि गौतमका पवित्र उपाख्यान कहा है, उसे मैंने सुना। अब मैं पुण्डरीकपुरका माहात्म्य सुनना चाहती हूँ।

पुरोहित वसुने कहा— महादेवजी भक्तोंके वशमें रहते हैं और उन्हें तत्काल वर देते हैं। वे भक्तोंके सम्मुख प्रकट होते और उनकी इच्छाके अनुसार कार्य करते हैं। एक समयकी बात है, व्यासजीके शिष्य मुनीश्वर जैमिनि अग्निवेश्य आदि शिष्योंके साथ तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए पुण्डरीकपुरमें गये जो साक्षात् देवराज इन्द्रकी अमरावतीपुरीके समान सुशोभित था। उस नगरकी शोभा देखकर महर्षि जैमिनि बड़े प्रसन्न हुए। वहाँ सरोवरमें मुनिने स्नान करनेके पश्चात् संध्या-वन्दन आदि नित्यकर्म तथा देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण किया। फिर पार्थिव लिङ्गका निर्माण करके पाद्य, अर्घ्य आदि विविध उपचारोंसे विधिपूर्वक उसका पूजन किया। पूजनके समय उनका चित्त पूर्णतः शान्त था; मनमें कोई व्यग्रता नहीं थी। गन्ध, सुगन्धित पुष्प, धूप, दीप तथा भाँति-भाँतिके नैवेद्योंसे भलीभाँति पूजन करके ज्यों ही महर्षि जैमिनि स्थिर होकर बैठे त्यों ही प्रसन्न होकर भगवान् शिव उनके नेत्रोंके समक्ष प्रकट हो गये।

तदनन्तर जैमिनि साक्षात् भगवान् उमापतिको प्रकट हुआ देख उनके आगे दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़ गये। फिर सहसा उठकर हाथ जोड़ शरणागतोंकी पीड़ा दूर करनेवाले तथा आधे अङ्गमें हरि और आधेमें हररूपसे प्रकट हुए भगवान् शिवसे बोले।

जैमिनिने कहा— देवदेव जगत्पते ! मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ; क्योंकि आप ब्रह्मा आदिके भी

७४४ * संक्षिप्त नारदपुराण *

ध्यान करनेयोग्य साक्षात् महेश्वर मेरी दृष्टिके सम्मुख प्रकट हैं।

तब प्रसन्न होकर भगवान् शिवने उनके मस्तकपर अपना हाथ रखा और कहा—'बेटा! बोलो, तुम क्या चाहते हो?' भगवान् शिवका यह वचन सुनकर जैमिनिने उत्तर दिया—'भगवन्! मैं माता पार्वती, विघ्नराज गणेश तथा कुमार कार्तिकेयजीके साथ आपका दर्शन करना चाहता हूँ।' तब पार्वतीदेवी तथा अपने दोनों पुत्रोंके साथ भगवान् शङ्करने उन्हें दर्शन दिया। तत्पश्चात् प्रसन्नचित्त हो भगवान् शिवने फिर पूछा—'बेटा! कहो, अब क्या चाहते हो?' जैमिनिने जगद्गुरु शङ्करकी यह दयालुता देखकर मुस्कराते हुए कहा—'मैं आपके ताण्डवनृत्यकी झाँकी देखना चाहता हूँ।' तब उनकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये भगवान् अम्बिकापतिने भाँति-भाँतिकी क्रीडामें कुशल समस्त प्रमथगणोंका स्मरण किया। उनके स्मरण करते ही वे नन्दी-भृङ्गी आदि सब लोग कौतूहलमें भरकर वहाँ आये और गणेश, कार्तिकेय तथा पार्वतीसहित भगवान् शिवको नमस्कार करके देवदेव महादेवजीके आदेशकी प्रतीक्षा करते हुए चुपचाप हाथ जोड़कर खड़े हो गये।

तदनन्तर भगवान् रुद्र अद्भुत रूप बनाकर ताण्डवनृत्य करनेको उद्यत हुए। उस समय वे विचित्र वेश-भूषासे विभूषित हो अद्भुत शोभा पा रहे थे। उन्होंने चञ्चल नागरूपी बेलसे अपनी कमर कस ली थी। मुखपर कुछ-कुछ मुसकराहट खेल रही थी। ललाटमें आधे चन्द्रमाकी रेखा सुशोभित थी। सिरके बाल ऊपरकी ओर खड़े थे। उन्होंने अपने सुन्दर नेत्रकी तथा शरीरमें रमायी हुई विभूतिकी उज्ज्वल प्रभासे चन्द्रमा और उसकी चाँदनीको मात कर दिया था। नृत्यके समय उनके जटा-जूटसे झरती हुई गङ्गाके जलसे भगवान्‌का सारा अङ्ग भीग रहा था। ताण्डवकालमें बार-बार अपने चरणारविन्दोंके आघातसे वे समूची पृथ्वीको कम्पित किये देते थे। उत्तम वाद्य बज रहे थे और हर्षातिरेकसे भगवान्‌के अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था। देवताओं तथा दैत्योंके अधिपतिगण अपने मुकुटकी मणियोंके प्रकाशसे भगवान् शिवके चरणकमलोंकी शोभा बढ़ाते थे। गणेश, कार्तिकेय तथा गिरिराजनन्दिनी पार्वतीके नेत्र भगवान्‌के मुखपर लगे थे। भक्तोंके हृदयमें हर्षकी बाढ़-सी आ गयी थी और बड़े उत्साहसे जय-जयकार कर रहे थे। इस प्रकार भगवान् शिव अपने ताण्डवनृत्यसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए शोभा पा रहे थे।

तदनन्तर महेश्वरका ताण्डवनृत्य देखकर महर्षि जैमिनि आनन्दके समुद्रमें डूब गये और एकाग्रचित्त हो वेदपादस्तोत्रों*से उनकी स्तुति करने लगे—


* इस स्तुतिमें प्रत्येक श्लोकके अन्तमें वैदिक मन्त्रका एक पाद रखा गया है, इसलिये इसे 'वेदपादशिवस्तुति' कहते हैं।

उत्तरभाग

  • उत्तरभाग * ७४५

'काम्पिल्य देशमें निवास करनेवाली देवि! ब्रह्मा, विष्णु और शिव तुम्हारे चरणारविन्दोंमें मस्तक झुकाते हैं। जगदम्ब! तुम्हें नमस्कार है। विघ्नराज! ब्रह्मा, सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्र और विष्णु आदि आपकी वन्दना करते हैं। गणपते! आप ब्राह्मणों तथा ब्रह्माजीके अधिपति हैं, आपको नमस्कार है। उमादेवी अपने कोमल करारविन्दोंसे जिनके ललाटमें तिलक लगाती हैं, जो कानोंमें कुण्डल तथा गलेमें कमलपुष्पोंकी माला धारण करते हैं उन कुमार कार्तिकेयको मैं प्रणाम करता हूँ। ब्रह्मा आदिके लिये भी जिनका दर्शन करना अत्यन्त कठिन है उन भगवान् शिवकी स्तुति कौन कर सकता है? तथापि प्रभो! आपके दर्शनसे मेरे द्वारा स्वतः स्तुति होने लगी है, ठीक उसी तरह जैसे मेघोंकी घटासे स्वतः वर्षा होने लगती है। अम्बा पार्वतीसहित भगवान् शिवको नमस्कार है। संहारकारी शर्व एवं कल्याणकारी शम्भुको नमस्कार है। ताण्डवनृत्य करनेवाले सभापति रुद्रदेवको नमस्कार है। जिनके पैरोंकी धमकसे सम्पूर्ण लोक विदीर्ण होने लगते हैं, मस्तकके आघातसे ब्रह्माण्डकी दीवार फट जाती है और भुजाओंके आघातसे समस्त दिगन्त विभ्रान्त हो उठता है उन भगवान् भूतनाथको नमस्कार है। ताण्डवके समय जिनके युगलचरणोंमें नूपुरकी छम-छम ध्वनि होती रहती है, जिनके कटिभागमें चर्ममय वस्त्र सुशोभित होता है और जो नागराजकी मेखला धारण करते हैं उन भगवान् पशुपतिको नमस्कार है। जो कालके भी काल हैं, सोमस्वरूप, भोगशक्तिसम्पन्न तथा हाथमें शूल धारण करनेवाले हैं उन जगत्पति शिवको नमस्कार है। भगवन्! आप सम्पूर्ण जगत्के पालक, समस्त देवताओंके नेता तथा पर्वतों और क्षेत्रोंके अधिपति हैं, आपको नमस्कार है। लोककल्याणकारी आप भगवान् शङ्करको नमस्कार है। मङ्गलस्वरूप शिवको नमस्कार है। आत्माके अधिपति! आपको नमस्कार है। समस्त कामनाओंकी वर्षा करनेवाले ! आपको नमस्कार है। आप आठ अङ्गोंसे युक्त और अत्यन्त मनोरम स्वरूपवाले हैं, क्लेशमें पड़े हुए भक्तोंको अभीष्ट वस्तु प्रदान करनेवाले हैं; आप (दक्ष) यज्ञके नाशक और परम संतुष्ट हैं; आप पाँचों भूतोंके स्वामी, कालके नियन्ता, आत्माके अधीश्वर तथा सम्पूर्ण दिशाओंके पालक हैं; आपको बारम्बार नमस्कार है। जो सम्पूर्ण विश्वके कर्ता, जगत्का भरण-पोषण करनेवाले तथा संसारका संहार करनेवाले हैं; अग्नि जिनका नेत्र और विश्व जिनका स्वरूप है; उन भगवान् महेश्वरको नमस्कार है। ईशान ! तत्पुरुष ! वामदेव ! सद्योजात ! आपको नमस्कार है। भस्म ही जिनका आभूषण है, जो भक्तोंका भय भङ्ग करनेवाले हैं, जो भव (जगत्की उत्पत्तिके कारण), भर्ग (तेजस्वरूप), रुद्र (दुःख-निवारण करनेवाले) तथा मीढ़वान् (भक्तोंकी आशालताको सींचनेवाले) हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। जिनके कपोल, ललाट, भौंहें तथा शरीर सभी परम सुन्दर हैं; जो सोमस्वरूप हैं; उन भगवान् शिवको नमस्कार है। भगवन्! सांसारिक क्लेशके कारण होनेवाले महान् भयका सदाके लिये आप उच्छेद करनेवाले हैं। भक्तोंपर कृपाकी वर्षा करनेवाले ! आपको नमस्कार है। जो आनन्दके समुद्र तथा ताण्डवलास्यके द्वारा परम सुन्दर प्रतीत होते हैं उन सम्पूर्ण जगत्के स्वामी तथा देवसभाके अधीश्वर अद्भुत देवता महादेवको मैं नमस्कार करता हूँ। यक्षराज कुबेर जिन्हें अपना इष्टदेव मानते हैं उन अविनाशी परम प्रभु महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो एक बार भी प्रणाम करनेवाले भक्तको संसाररूपी महासागरसे तार देते हैं उन चराचर जगत्के स्वामी भगवान् ईशानको मैं प्रणाम करता हूँ। जो जगत्के धारण-

७४६* संक्षिप्त नारदपुराण *

पोषण करनेवाले और ईश्वर हैं; समस्त सम्पत्तियोंके दाता हैं; देवताओंके नेता, विजेता तथा स्वयं कभी पराजित न होनेवाले हैं उन भगवान् शिवकी मैं वन्दना करता हूँ। जो मुझे और इन तीनों लोकोंको रचकर सबका धारण-पोषण करते हैं उन कालके भी नियन्ता आप भगवान् गङ्गाधरकी मैं वन्दना करता हूँ। जिनसे यजुर्वेदके साथ ऋग्वेद और सामवेद भी प्रकट हुए हैं उन सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, सर्वस्वरूप, विद्वान् एवं ईश्वर शिवकी मैं वन्दना करता हूँ। जो सम्पूर्ण विश्वको सब ओरसे देखते रहते हैं तथा जिनके भयसे भूत, वर्तमान और भविष्य जगत्‌के जीव पापकर्मोंका त्याग करते हैं, उन सर्वोत्तम द्रष्टा आप भगवान् शिवकी मैं वन्दना करता हूँ। जो देवताओंके नियन्ता और समस्त पापोंको हर लेनेवाले हर हैं उन भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। उत्तम ज्ञानसे सम्पन्न शान्त संन्यासी अपने हृदयकमलमें जिन कल्याणमय परमात्माकी उपासना करते हैं, उन ईशान देवको मैं प्रणाम करता हूँ।

'ईश! मैं अज्ञानी, अत्यन्त क्षीण, अशिक्षित, असहाय, अनाथ, दीन, विपत्तिग्रस्त तथा दरिद्र हूँ; आप मेरी रक्षा कीजिये। मैं दुर्मुख, दुष्कर्मी, दुष्ट तथा दुर्दशाग्रस्त हूँ; मेरी रक्षा कीजिये। मैं आपके सिवा दूसरे किसीको ऐसा नहीं देखता, जिसको सिद्धिके लिये वरण करूँ। शम्भो! राग, द्वेष तथा मदकी लपटोंसे प्रज्वलित संसाररूपी अग्निके द्वारा हम दग्ध हो रहे हैं; दयालो! आप हमारी रक्षा कीजिये। आपके अनेक नाम हैं और बहुतोंने आपका स्तवन किया है। हर! मैं परायी स्त्री, पराये घर, पराये वस्त्र, पराये अन्न तथा पराये आश्रयमें आसक्त हूँ; आप मेरी रक्षा करें। मुझे विश्वका भरण-पोषण करनेवाली धन-सम्पत्तिके साथ उत्तम विद्या दीजिये। देवेश! अनिष्ट तो मुझे सहस्रों मिलते हैं, किंतु इष्ट वस्तुका सदा वियोग ही बना रहता है; आप मेरे मानसिक रोगका नाश कीजिये। भगवन्! आप महान् हैं। देवेश! आप ही हमारे रक्षक हैं, दूसरा कोई मेरी रक्षा करनेवाला नहीं है। आप ब्रह्माजीके भी अधिपति हैं, अतः मुझे स्वीकार करके मेरी रक्षा कीजिये। उमापते! आप ही मेरे माता-पिता, पितामह, आयु, बुद्धि, लक्ष्मी, भ्राता तथा सखा हैं। देवेश! आप ही सब कर्मके कर्ता हैं, अतः मैंने जो भी दुष्कर्म किया है, वह सब आप क्षमा करें। प्रभुतामें आपकी समता करनेवाला कोई नहीं है और लघुतामें मैं भी अपना सानी नहीं रखता। अतः देव! महादेव! मैं आपका हूँ और आप मेरे हैं। आपके मुखपर सुन्दर मुसकान सुशोभित है। गोरे अङ्गोंमें लगी हुई विभूति उनकी गौरताको और बढ़ा देती है। आपका श्रीविग्रह बालसूर्यके समान तेजस्वी तथा सौम्य है। आपका मुख सदा प्रसन्न रहता है तथा आप शान्तस्वरूप हैं। मैं मन और वाणीके द्वारा आपके गुणोंका गान करता हूँ। ताण्डवनृत्य करते और मेरी ओर देखते हुए आप भगवान् उमाकान्तको हम सैकड़ों वर्षोंतक निहारते रहें, यही हमारा अभीष्ट वर है। महाभाग! भगवन्! हम आपके प्रसादसे नीरोग, विद्वान् और बहुश्रुत होकर सैकड़ों वर्षोंतक जीवित रहें। ईशान! स्त्री तथा भाई-बन्धुओंके साथ आपके ताण्डवरूपी अमृतका यथेष्ट पान करते हुए सैकड़ों वर्षोंतक आनन्दका अनुभव करते रहें। देवदेव! महादेव! हम इच्छानुसार आपके चरणारविन्दोंके मधुर मकरन्दका पान करते हुए सौ वर्षोंतक आमोदमें मग्न रहें।

'महादेव! हम प्रत्येक जन्ममें कीट, नाग, पिशाच अथवा जो कोई भी क्यों न हों, सैकड़ों वर्षोंतक आपके दास बने रहें। ईश! देव! महादेव! हम सभामें अपने कानोंद्वारा आपके नृत्य, वाद्य तथा कण्ठकी मधुर ध्वनिका सैकड़ों वर्षोंतक श्रवण करते रहें। जो स्मरणमात्रसे संसार-बन्धनका

\ उत्तरभाग \ ७४७

* उत्तरभाग * ७४७

नाश करनेवाले हैं, आपके उन दिव्य नामोंका हम सैकड़ों वर्षोंतक कीर्तन करते रहें। जो नित्य तरुण, सम्पूर्ण विश्वके अधिपति तथा त्रिकालदर्शी विद्वान् हैं उन भगवान् शिवका मैं कब दर्शन करूँगा। जिसमें बहुत-से पाप भरे हुए हैं, जिसने कभी लेशमात्र भी पुण्यका उपार्जन नहीं किया है तथा जिसकी बुद्धि अत्यन्त खोटी है ऐसे मुझ अधमको भगवान् महेश्वर क्या कभी अपना सेवक जानकर स्वीकार करेंगे? गायको! तुम गाओ; यदि राग आदि प्राप्त करना चाहते हो तो कुबेरके सखा भगवान् शिवकी महिमाका गान करो। सखी जिह्वे! तेरा कल्याण हो। तू विद्यादाता उमापतिकी उच्च स्वरसे स्तुति बोला कर। अजन्मा जीव! तू शान्तभावसे चेत जा, क्या तुझे यह ज्ञात नहीं है कि इन भगवान् शिवकी तृप्तिसे ही यह सम्पूर्ण जगत् तृप्त होता है। इसलिये इनके नामामृतका पान कर। ऐ मेरे चित्त! जिनकी गन्ध मनोहर और स्पर्श सुखद है, जो सबकी इच्छा पूर्ण करनेवाले हैं तथा चन्द्रमा जिनका आभूषण है उन भगवान् शङ्करका गाढ़ आलिङ्गन कर। त्रिपुरासुरका अन्त करनेवाले भगवान् शिवको नमस्कार है। तीनों लोकोंके स्वामी दिगम्बर शिवको नमस्कार है। भवकी उत्पत्तिके कारण भगवान् शिवको नमस्कार है। प्रभो! आपकी असंख्य प्रजाएँ हैं तथा आपका स्वरूप अत्यन्त विचित्र है। आपसे ही जगत्की उत्पत्ति हुई है। जिनका सुवर्णमय पादपीठ देवराज इन्द्रके महाकिरीटमें जड़े हुए नाना प्रकारके रत्नोंसे आवृत होता है, भस्म ही जिनका अङ्गराग है तथा जिनसे भिन्न पर अथवा अपर किसी भी वस्तुकी सत्ता नहीं है, उन परमेश्वर शिवको नमस्कार है। जिन आपमें यह सम्पूर्ण जगत् प्रकट होता और विलीन हो जाता है; जो छोटे-से-छोटे और बड़े-से-बड़े हैं; जिनका कहीं अन्त नहीं है; जो अव्यक्त, अचिन्त्य, एक, दिगम्बर, आकाशस्वरूप, अजन्मा, पुराणपुरुष तथा यज्ञयूपमय हैं उन भगवान् हरको मैं प्रणाम करता हूँ। पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण तथा ऊपर-नीचे सब ओर वे ही तो हैं। जो चन्द्रमाका मुकुट धारण करते हैं तथा जो परमानन्दस्वरूप एवं शोक-दुःखसे रहित हैं; सबके हृदयकमलमें परमात्मरूपसे जिनका निवास है; जिनसे सम्पूर्ण दिशाएँ और अवान्तर दिशाएँ प्रकट हुई हैं; उन शिवस्वरूप भगवान् महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। चन्द्रमौले! राग आदि कपट-दोषके कारण प्रकट हुई भवरूपी महारोगसे मैं बड़ी घबराहटमें हूँ। अपनी कृपादृष्टिसे मुझे देखकर आप मेरी रक्षा कीजिये; क्योंकि वैद्योंमें आप सबसे बड़े वैद्य हैं।

‘मेरे मनमें दुःखका महासागर उमड़ आया है, मैं लेशमात्र सुखसे भी वञ्चित हूँ, पुण्यका तो मैंने कभी स्पर्श भी नहीं किया है और मेरे पातक असंख्य हैं; मैं मृत्युके हाथमें आ गया हूँ और बहुत डरा हुआ हूँ; भगवान् भव! आप आगे-पीछे, ऊपर-नीचे सब ओरसे मेरी रक्षा कीजिये। महेश! मैं असार-संसाररूपी महासागरमें डूबकर जोर-जोरसे क्रन्दन कर रहा हूँ; मेरा राग बहुत बढ़ गया है; मैं सर्वथा असमर्थ हो गया हूँ; आप अपनी कृपादृष्टिसे मेरी रक्षा कीजिये। जिनके मुखपर मनोहर मुसकानकी छटा छा रही है, चन्द्रमाकी कला जिनके मस्तकका आभूषण बनी हुई है तथा जो अन्धकारसे परे हैं, उन सूर्यके समान तेजस्वी भगवान् शिवका माता पार्वतीके साथ कब दर्शन करूँगा? अनादिकालसे मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले जीवो! तुम सब लोग यहाँ आओ और अपने हृदयकमलमें भगवान् शिवका चिन्तन करो; क्योंकि जिन्होंने वेदान्त-शास्त्र (उपनिषद्)-के विज्ञानद्वारा उसके अर्थभूत परमात्माको पूर्ण निश्चयपूर्वक जान लिया है, वे ज्ञानीजन मोक्षके लिये सदा उन्हींका ध्यान करते हैं। जो उत्तम

७४८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

पुत्रकी इच्छा रखनेवाले हैं, वे मनुष्य भी इन नित्य तरुण भगवान् शिवकी आराधना करें। इन्हींसे सृष्टिके आरम्भमें जगद्विधाता स्वयम्भू ब्रह्माजी प्रकट हुए थे। बहुत कहनेसे क्या लाभ? इन भगवान् शिवकी शरणमें जानेसे समस्त कामनाएँ सिद्ध होती हैं। पूर्वकालमें इन्हींकी शरण लेकर महर्षि अगस्त्य दिन-रातमें वृद्धावस्थासे युवा हो गये थे। ऐ मेरे नेत्ररूपी भ्रमरो! तुम और सब कुछ छोड़कर सदा इन भगवान् शिवका ही आश्रय लो। ये आमोदवान् (सुगन्ध और आनन्दसे परिपूर्ण) और मृदु (कमलसे भी कोमल) हैं। परम स्वादिष्ट एवं मधुर हैं; ये तुम्हारा कल्याण करेंगे। ओ मनुष्य! तुम भगवान् शिवकी शरण लेकर ऐसे हो जाओगे कि तुम्हारी किसीसे भी तुलना नहीं हो सकेगी। तुम समस्त मनुष्यों और देवताओंको भी अपने गुणोंसे परास्त कर दोगे। वाणी तुम्हें नमस्कार है; तुम हृदयगुफामें शयन करनेवाले इन नित्य-तरुण भगवान् महेश्वरकी स्तुति करो। मन! तू जिस-जिस अभीष्ट वस्तुका चिन्तन करेगा, वह सब तुझे अवश्य प्राप्त होगी। विषयोंमें कभी दुःखसे छुटकारा नहीं मिल सकता। हम हृदयकी शुद्धिके लिये भगवान् रुद्रकी आराधना करेंगे। दयालु भगवन्! हमने पूर्वकालमें अज्ञानवश जो आपके विरुद्ध अपराध या दुष्कर्मका अनुष्ठान किया है, वह सब क्षमा करके जैसे पिता अपने पुत्रोंको आश्रय देता है उसी प्रकार आप हमें भी अपनाइये।

'संसार नामक क्रोधमें भरे हुए सर्पने राग, द्वेष, उन्माद और लोभ आदिरूप तीखे दाँतोंसे मुझे डँस लिया है। इस अवस्थामें मुझे देखकर सबकी रक्षा करनेवाले दयालु देवता पिनाकधारी भगवान् शिव मेरी रक्षा करें। रुद्रदेव! जो लोग समाधिके अन्तमें उपर्युक्त वचन कहकर आपको नमस्कार करते हैं, वे जन्म-मृत्युरूपी सर्पसे डसे हुए लोग संत होकर आपको प्राप्त होते हैं। नीलग्रीव! मैं जीवात्मारूपसे ब्रह्माजीके साथ आपकी वन्दना करता हुआ आपकी ही शरण आता हूँ। अनाथनाथ वसुस्वरूप! महेश्वर! हम सांसारिक चिन्ताके भीषण ज्वरसे पीडित हैं; बड़े-बड़े रोगोंसे ग्रस्त हो गये हैं; समस्त पातकोंके निवासस्थान बने हुए हैं; कालकी दृष्टि हमसे दूर नहीं है; ऐसी दशामें आप अपने औषधरूप हाथसे हमारा स्पर्श करें। शूरवीर! आपका करस्पर्श सब प्रकारकी सिद्धियोंका हेतु है। आप कालके भी काल हैं। संसारकी उत्पत्तिके हेतुभूत भगवान् भवको नमस्कार है। भस्मभूषित वक्षवाले हरको नमस्कार है। संसारके पराभव और भयमें साथ देनेवाले पिनाकधारी रुद्रको नमस्कार है। विश्वके पालक कल्याणस्वरूप शिवको नमस्कार है। जीवके सनातन सखा उन महेश्वरको नमस्कार है, जिनके सखारूप जीवको न तो कोई मार सकता है और न कोई परास्त ही कर सकता है। देवताओंके पति, इन्द्रके भी स्वामी भगवान् शिवको नमस्कार है। प्रजापतियोंके और भूमिपतियोंके भी अधिपति भगवान् शिवको नमस्कार है तथा अम्बिकापति उमापतिको नमस्कार है, नमस्कार है।

'जो प्रणतजनोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले, त्रिकालदर्शी, विद्वानोंमें भी सबसे श्रेष्ठ विद्वान् और उत्तम यशवाले हैं उन भगवान् गणेशको मैं नित्य नमस्कार करता हूँ। देवतालोग युद्धमें जिन स्कन्दस्वामीका आवाहन करके विजय पाते हैं उन सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् सुब्रह्मण्यकी मैं वन्दना करता हूँ। सुब्रह्मण्य—स्कन्दस्वामी सच्चिदानन्दमय हैं। कल्याणमयी जगदम्बिकाको नमस्कार है। कल्याणमय विग्रहवाली शिवप्रियाको नमस्कार है। जिनके शरीरकी कान्ति सुवर्णके समान है; जो अपने चरणोंमें मणिमय नूपुर धारण करती हैं; जिनका मुख सदा प्रसन्न रहता है; जो अपने हाथोंमें कमल धारण किये रहती हैं; जिनके नेत्र विशाल हैं, जो भाषाशास्त्रकी विदुषी तथा उत्तम वचन बोलनेवाली हैं, उन गौरीदेवीको मैं प्रणाम करता हूँ। मैं मेनाकी पुत्री उन

उत्तरभाग

  • उत्तरभाग * ७४९

उमादेवीको नमस्कार करता हूँ। जो अप्रमेय हैं—जिनके सौन्दर्य आदि दिव्य गुणोंका माप नहीं है तथा जो परम कान्तिमती हैं एवं जो सदा भगवान् शङ्करके पार्श्वभागमें रहती हैं और समस्त भुवनोंको देखा करती हैं, उन पार्वतीदेवीको मैं नमस्कार करता हूँ। दीनजनोंकी रक्षा जिनके लिये मनोरञ्जनका कार्य है; जो मान और आनन्द देती हैं तथा जो विद्याओं और मधुर एवं मङ्गलमयी वाणीकी नायिका और सिद्धिकी स्वामिनी हैं, उन पार्वतीजीको मैं प्रणाम करता हूँ। भवानी! आप सांसारिक तापके महान् भयका निवारण करनेवाली हैं। अन्न, वस्त्र और आभूषण आदि एकमात्र आपके ही उपभोग हैं। शिवे! आप मुझे वह श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान कीजिये जो कहीं भी कुण्ठित न होनेवाली हो तथा जिसके द्वारा हम समस्त पापोंको लाँघ जायँ। शिवे! आपकी उपमा कैसे और कहाँ दी जाय ? सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि आपके लिये खिलवाड़ है। कल्याणमय भगवान् शिव आपके पति हैं। साक्षात् भगवान् विष्णु आपके सेवक हैं। लक्ष्मी, शची और सौभाग्यवती सरस्वती आपकी दासियाँ हैं तथा आप स्वयं ही वसु (रत्न, धन, सुवर्ण आदि) देनेवाली हैं।'

पुरोहित वसु कहते हैं—महामुनि जैमिनिने उपर्युक्त स्तुतिके द्वारा इस प्रकार भगवान् शङ्करका स्तवन करके प्रेमाश्रुपूर्ण नयनोंसे देखते हुए सभापति भगवान् शिवको प्रणाम किया। उन्होंने बारम्बार भगवान् शिवके ताण्डव नृत्यरूप मङ्गलमय अमृतका पान करके सम्पूर्ण कामनाएँ पा लीं और अन्तमें शिवगणोंका आधिपत्य प्राप्त कर लिया। जो प्रतिदिन इस स्तोत्रके एक श्लोक, आधे श्लोक, एक पाद अथवा आधे पादको भी धारण करता है, वह शिवलोकमें जाता है। शुभे ! जहाँ भगवान् शिवने ताण्डवनृत्य किया था, वह स्थल पवित्रसे भी परम पवित्र तीर्थ बन गया। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य मुक्त हो जाता है। जो श्रेष्ठ मानव वहाँ पितरोंका श्राद्ध करता है, वह अपने पूर्वजोंको स्वर्गलोक पहुँचा देता है। जो उस तीर्थमें ब्राह्मणको गौ, सुवर्ण, भूमि, शय्या, वस्त्र, छाता, अन्न और पान (पीनेयोग्य वस्तु) देता है, उसका वह समस्त दान अक्षय होता है।

परशुरामजीके द्वारा गोकर्णक्षेत्रका उद्धार तथा उसका माहात्म्य

मोहिनी बोली—गुरुदेव! आपके द्वारा कहे हुए पुण्डरीकपुरके माहात्म्यको मैंने सुना। अब मुझे गोकर्णतीर्थका माहात्म्य बताइये।

पुरोहित वसुने कहा—मोहिनी ! पश्चिम समुद्रके तटपर 'गोकर्णतीर्थ' है, जिसका विस्तार दो कोसका है। वह दर्शनमात्रसे भी मोक्ष देनेवाला है। देवि ! जब सगरके पुत्रोंने क्रमशः पृथ्वी खोद डाली तो वहाँतक समुद्र बढ़ आया और उसने आसपासकी तीस योजन विस्तृत तीर्थ, क्षेत्र और वनोंसहित भूमिको जलसे आप्लावित कर दिया। तब वहाँके रहनेवाले देवता, असुर और मनुष्य सब-के-सब वह स्थान छोड़कर सह्य आदि पर्वतोंपर जा बसे। तब गोकर्ण नामक उत्तम तीर्थ समुद्रके भीतर छिप गया। तब श्रेष्ठ मुनियोंने इस बातका विचार करके गोकर्णतीर्थके उद्धारमें मन लगाया। पर्वतपर ठहरे हुए वे सब महात्मा आपसमें सलाह करके महेन्द्रपर्वतपर रहनेवाले परशुरामजीके दर्शनके लिये वहाँ गये। उनकी यह यात्रा गोकर्णतीर्थके उद्धारकी इच्छासे हुई थी। महेन्द्रपर्वतपर आरूढ़ हो महर्षियोंने परशुरामजीका आश्रम देखा। वेदमन्त्रोंके उच्चघोषसे वह सारा आश्रम गूँज उठा था। महर्षियोंने प्रसन्नचित्त होकर उस समय उस आश्रममें प्रवेश किया। परशुरामजी ब्रह्मासनपर कोमल एवं काला मृगचर्म बिछाकर सुखपूर्वक बैठे थे। ऋषियोंने शान्तभावसे बैठे हुए तपस्वी परशुरामको देखा। महर्षियोंने उनको

७५० * संक्षिप्त नारदपुराण *

उन्होंने उन महर्षियोंकी बात सुनकर निश्चय किया कि साधु पुरुषोंकी रक्षा धर्मका कार्य है; अतः इसे करना चाहिये। तब अपने धनुष-बाण लेकर वे उन मुनियोंके साथ चले। महेन्द्र पर्वतसे उतरकर मुनियोंके साथ समुद्रके तटपर जा पहुँचे। वहाँ वक्ताओंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने मेघके समान गम्भीर वाणीद्वारा जल-जन्तुओंके स्वामी वरुणको सम्बोधित करके कहा—'प्रचेता वरुणदेव! मैं भृगुवंशी परशुराम मुनियोंके साथ एक विशेष कार्यसे यहाँ आया हूँ, दर्शन दीजिये; आपसे अत्यन्त आवश्यक काम है।' परशुरामजीके इस प्रकार पुकारनेपर उनकी बात सुनकर भी वरुणदेव अहंकारवश उनके समीप नहीं आये। इस प्रकार बार-बार परशुरामजीके बुलानेपर भी जब वे नहीं आये तब भृगुवंशी परशुरामने अत्यन्त कुपित होकर धनुष उठाया और उसपर अग्निबाण रखकर समुद्रको सुखा देनेके लिये उसका संधान किया। भद्रे! महात्मा परशुरामद्वारा उस आग्नेय अस्त्रके संधान करते ही जल-जन्तुओंसे भरा हुआ समुद्र क्षुब्ध हो उठा। परशुरामजीके उस अस्त्रकी आँचसे वरुण भी जलने लगे। तब भयभीत होकर वे प्रत्यक्षरूपसे वहाँ आये और उन्होंने परशुरामजीके दोनों पैर पकड़ लिये। यह देख परशुरामजीने अपना अस्त्र लौटा लिया और वरुणसे कहा—'तुम अपना सारा जल शीघ्र हटा लो जिससे भगवान् गोकर्णका दर्शन किया जाय।' तब परशुरामजीकी आज्ञासे वरुणने गोकर्ण-तीर्थका जल हटा लिया; परशुरामजी भी गोकर्णनाथ महादेवका पूजन करके फिर महेन्द्रपर्वतपर चले गये और वे ब्राह्मण ऋषि-मुनि वहीं रहने लगे। उन उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सम्पूर्ण महर्षियोंने वहाँ तपस्या करके पुनरावृत्तिरहित परम निर्वाणरूप मोक्ष प्राप्त कर लिया। उस क्षेत्रके प्रभावसे प्रसन्न होकर पार्वतीदेवी, भूतगण तथा सम्पूर्ण देवताओंके साथ भगवान् शङ्कर वहाँ नित्य निवास करते हैं।

विनयपूर्वक प्रणाम किया।

तदनन्तर भृगुवंशियोंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने उन मुनियोंको आया देख अर्घ्य, पाद्य आदि सामग्रियोंसे उनका आदरपूर्वक पूजन किया। आतिथ्य ग्रहण करके जब वे सुखपूर्वक आसनपर बैठ गये तब भृगुनन्दन परशुरामजीने उनसे कहा—'महाभाग महर्षिगण! आपका स्वागत है। आपलोग जिस उद्देश्यसे यहाँ पधारे हुए हैं, उसे निर्भय होकर कहें। उसकी मैं पूर्ति करूँगा।' तब वे मुनिश्रेष्ठ जिस कार्यके लिये परशुरामजीके पास आये थे, उसे बताते हुए बोले—'भृगुश्रेष्ठ! आपको ज्ञात होना चाहिये कि हमलोग गोकर्णतीर्थमें निवास करनेवाले मुनि हैं। राजा सगरके पुत्रोंने पृथ्वी खोदकर हमें उस तीर्थसे बाहर निकाल दिया है। विप्रेन्द्र! अब आप ही अपने प्रभावसे समुद्रका जल हटाकर वह उत्तम क्षेत्र हमें देनेके योग्य हैं।'

श्रीराम-लक्ष्मणका संक्षिप्त चरित्र तथा लक्ष्मणाचलका माहात्म्य

  • उत्तरभाग * | ७५१ ---|---

उन गोकर्णनाथ महादेवके दर्शनसे सारे पाप मनुष्यको तत्काल छोड़कर चले जाते हैं। जिसके स्मरण करनेमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है, वह गोकर्ण नामक क्षेत्र सब तीर्थोंका निकेतन है। जो वहाँ काम-क्रोधादि दोषोंसे रहित होकर निवास करते हैं, वे थोड़े ही समयमें सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। सती मोहिनी! उस तीर्थमें किये हुए दान, होम, जप, श्राद्ध, देवपूजन तथा ब्राह्मण-समादर आदि कर्म अन्य तीर्थोंकी अपेक्षा कोटिगुने होकर फल देते हैं।


श्रीराम-लक्ष्मणका संक्षिप्त चरित्र तथा लक्ष्मणाचलका माहात्म्य

**मोहिनी बोली—**पुरोहितजी! गोकर्णतीर्थका पापनाशक माहात्म्य मैंने सुना; अब लक्ष्मणतीर्थका माहात्म्य बतानेकी कृपा करें।

**पुरोहित वसुने कहा—**प्राचीन कालकी बात है, ब्रह्मा आदि देवताओंके प्रार्थना करनेपर साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु ही राजा दशरथसे चार स्वरूपोंमें प्रकट हुए। वे ही राम-लक्ष्मण आदि नामोंसे प्रसिद्ध हुए। देवि! तत्पश्चात् कुछ कालके अनन्तर मुनीश्वर विश्वामित्र अयोध्यामें आये। उन्होंने अपने यज्ञकी रक्षाके लिये श्रीराम और लक्ष्मणको राजासे माँगा। तब राजा दशरथने मुनिके शापसे डरकर अपने प्राणोंसे भी प्रिय पुत्र श्रीराम और लक्ष्मणको उन्हें सौंप दिया। तब वे दोनों भाई मुनीश्वर विश्वामित्रके यज्ञमें जाकर उसकी रक्षा करने लगे। श्रीरामने ताड़कासहित सुबाहुको मारकर मारीचको मानवास्त्रसे दूर फेंक दिया; फिर मुनिने उनका बड़ा सत्कार किया। तदनन्तर विश्वामित्रजी उन्हें राजा विदेहके नगरमें ले गये। वहाँ महाराज जनकने विश्वामित्रजीका भलीभाँति सत्कार करके उनसे पूछा—'महर्षे! ये दोनों बालक किस क्षत्रिय-कुल-नरेशके पुत्र हैं?' तब मुनिवर विश्वामित्रने राजा जनकको यह बताया कि 'ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण महाराज दशरथके पुत्र हैं।' यह सुनकर विदेहराज जनक बड़े प्रसन्न हुए। फिर महर्षि विश्वामित्र जनकसे बोले—'इन्हें वह धनुष दिखाओ जो महादेवजीकी धरोहर है और सीताके स्वयंवरके लिये तोड़नेकी शर्तके साथ रखा गया है।' विश्वामित्रजीका यह वचन सुनकर राजा जनकने तत्काल तीन सौ सेवकोंद्वारा उस धनुषको मँगवाकर आदरपूर्वक उन्हें दिखाया। श्रीरामने महादेवजीके उस धनुषको उसी क्षण बायें हाथसे उठा लिया और उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर खींचते हुए सहसा उसे तोड़ डाला। इससे मिथिला-नरेशको बड़ी

७५२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

प्रसन्नता हुई। उन्होंने श्रीराम और लक्ष्मणकी पूजा करके उन्हें वैदिक विधिके अनुसार अपनी दोनों कन्याएँ दे दीं। मुनिवर विश्वामित्रसे यह जानकर कि राजा दशरथके दो पुत्र और हैं, जनकने उन पुत्रोंके साथ महाराजको बुलवाया और अपने भाईकी दो पुत्रियोंका उन दोनों भाइयोंके साथ ब्याह कर दिया। तदनन्तर मिथिलानरेशके द्वारा भलीभाँति सम्मानित हो मुनिकी आज्ञा ले अपने चारों विवाहित पुत्रोंके साथ महाराज दशरथ अयोध्यापुरीके लिये प्रस्थित हुए। मार्गमें श्रीरामचन्द्रजीने भृगुपति परशुरामजीके गर्वको शान्त किया और पिता तथा भाइयोंके साथ वे बहुत वर्षोंतक आनन्दपूर्वक रहे।

तदनन्तर राजा दशरथ यह देखकर कि मेरे पुत्र श्रीराम जाननेयोग्य सभी तत्त्वोंको जान चुके हैं, उन्हें प्रसन्नतापूर्वक युवराजपदपर अभिषिक्त करनेके लिये उद्यत हुए। यह जानकर राजाकी सबसे अधिक प्रियतमा छोटी रानी कैकेयीने हठपूर्वक रामके राज्याभिषेकको रोका और अपने पुत्र भरतके लिये उस अभिषेकको पसंद किया। शुभे! तब माता कैकेयीकी प्रसन्नताके लिये पिताकी आज्ञा ले, श्रीरामचन्द्रजी अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ चित्रकूट पर्वतपर चले गये और वहीं मुनिवेष धारण करके उन्होंने कुछ कालतक निवास किया।

इधर भरतजी पिताके मरनेका समाचार सुनकर अपने नानाके घरसे अयोध्या आये। यहाँ उन्हें मालूम हुआ कि पिताजी 'हा राम ! हा राम !'-की रट लगाते हुए परलोकवासी हुए हैं; तब भरतजीने कैकेयीको धिक्कार देकर श्रीरामचन्द्रजीको लौटा लानेके लिये वनको प्रस्थान किया; किंतु वहाँसे श्रीरामने भरतको अपनी चरण-पादुका देकर अयोध्या लौटा दिया। श्रीराम क्रमशः अत्रि, सुतीक्ष्ण तथा अगस्त्यके आश्रमोंपर गये। इन सब स्थानोंमें बारह वर्ष बिताकर श्रीरघुनाथजी भाई और पत्नीके साथ पञ्चवटीमें गये और वहाँ रहने लगे। जनस्थानमें शूर्पणखा नामकी राक्षसी रहती थी। श्रीरामकी प्रेरणासे लक्ष्मणने उसकी नाक काटकर उसे विकृत बना दिया। तब उस राक्षसीसे प्रेरित होकर युद्धके लिये आये हुए चौदह हजार राक्षसोंसहित खर, दूषण और त्रिशिराको श्रीरामचन्द्रजीने नष्ट कर दिया। यह समाचार सुनकर राक्षसोंका राजा रावण वहाँ आया। उसने मारीचको सुवर्णमय मृगके रूपमें दिखाकर उसके पीछे दोनों भाइयोंको आश्रमसे दूर हटा दिया और सीताको हर लिया। उस समय जटायुने उसका मार्ग रोका, परंतु रावण उसे मारकर सीताको लंकामें ले गया। दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण जब लौटकर आश्रमपर आये तो सीताका हरण हो चुका था। अब वे सब ओर उनकी खोज करने लगे। मार्गमें जटायुको गिरा देख उसके मरनेपर दोनों भाइयोंने उसका दाह-संस्कार किया। फिर कबन्धको मारकर शबरीपर कृपा की। वहाँसे ऋष्यमूक पर्वतपर आये। तत्पश्चात् हनुमान्‌जीके कहनेसे अपने मित्र वानरराज सुग्रीवके शत्रु बालिका वध करके श्रीरामने सुग्रीवको

उत्तरभाग

  • उत्तरभाग * ७५३

राजा बनाया। फिर सुग्रीवकी आज्ञासे सीताकी खोजके लिये सब ओर वानर गये। हनुमान् आदि वानर सीताको ढूँढ़ते हुए दक्षिण समुद्रके तटपर गये। वहाँ सम्पातिके कहनेसे उन्हें यह निश्चय हो गया कि सीताजी लंकामें हैं।

तदनन्तर अकेले हनुमान्‌जी समुद्रके दूसरे तटपर बसी हुई लंकापुरीमें गये और वहाँ रामप्रिया सती सीताको उन्होंने देखा तथा श्रीरामचन्द्रजीकी अँगूठी उन्हें देकर अपने प्रति उनके मनमें विश्वास उत्पन्न किया; फिर उन दोनों भाइयोंका कुशल-समाचार सुनाकर उनसे चूड़ामणि प्राप्त की। तदनन्तर अशोकवाटिकाको उजाड़कर सेनासहित अक्षकुमारको मारा और मेघनादके बन्धनमें आकर रावणसे वार्तालाप किया। तत्पश्चात् सम्पूर्ण लंकापुरीको जलाकर पुनः मिथिलेश-नन्दिनी सीताका दर्शन किया और उनकी आज्ञा ले समुद्र लाँघकर श्रीरामचन्द्रजीसे उनका समाचार निवेदन किया।

सीता राक्षसराज रावणके निवासस्थानमें रहती हैं—यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी भी वानर-सेनाके साथ समुद्रके तटपर पहुँचे। फिर समुद्रकी ही अनुमति लेकर उन्होंने महासागरपर पर्वतीय शिलाखण्डोंसे पुल बाँधा और उसके द्वारा दूसरे तटपर पहुँचकर सेनाकी छावनी डाली। तदनन्तर अपने छोटे भाई विभीषणके समझानेपर भी रावणको यह बात नहीं रुची कि सीता अपने पतिको वापस दे दी जाय। रावणने विभीषणको लातसे मारा और विभीषण श्रीरामचन्द्रजीकी शरणमें गये। तब श्रीरामचन्द्रजीने लंकाको चारों ओरसे घेर लिया। तदनन्तर रावणने क्रमशः अपने मन्त्रियों, अमात्यों, पुत्रों और सेवकोंको युद्धके लिये भेजा; किंतु वे सब श्रीराम-लक्ष्मण तथा कपीश्वरोंद्वारा नष्ट कर दिये गये। लक्ष्मणने इन्द्रविजयी मेघनादको तीखे बाणोंसे मार डाला। इधर श्रीरामने भी कुम्भकर्ण तथा रावणको मौतके घाट उतार दिया। इसके बाद श्रीरामने अपनी प्रियतमा सीताकी अग्निपरीक्षा ली और विभीषणको राक्षसोंका आधिपत्य, लंका तथा एक कल्पकी आयु देकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करके सुग्रीव और

७५४ * संक्षिप्त नारदपुराण *

विभीषणके साथ पुष्पक-विमानद्वारा अयोध्याको प्रस्थान किया। भरतजी नन्दिग्राममें रहते थे। उन्हें साथ लेकर श्रीरामचन्द्रजी अयोध्यामें गये। फिर चारों भाइयोंके अपनी सब माताओंको प्रणाम किया। तदनन्तर पुरोहित वसिष्ठकी आज्ञा लेकर भाइयोंने श्रीरामका राजाके पदपर अभिषेक किया। भगवान् श्रीराम भी प्रजाका औरस पुत्रकी भाँति पालन करने लगे। धर्मके ज्ञाता श्रीरामने लोकनिन्दासे सुनकर श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने यज्ञसभामें सीताके साथ महर्षि वाल्मीकिको बुलवाया। जगदम्बा सीताने वहाँ आकर अपने दोनों पुत्र श्रीरामचन्द्रजीको सौंप दिये और स्वयं उन्होंने पृथ्वीके विवरमें प्रवेश किया। यह एक अद्भुत घटना हुई। तबसे श्रीरामचन्द्रजी केवल ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए इस पृथ्वीपर यज्ञानुष्ठानमें ही लगे रहे।

तदनन्तर एक समय काल और दुर्वासा मुनि श्रीरामचन्द्रजीके पास आये। भद्रे! कालको ब्रह्माजीने भेजा था और वे श्रीरामसे वैकुण्ठ-धाममें पधारनेके लिये प्रार्थना करने आये थे। उन्होंने एकान्तमें आकर श्रीरामसे कहा— 'इस समय कोई भी डरकर सीतादेवीको त्याग दिया। गर्भवती सीता वाल्मीकि मुनिके आश्रमपर जाकर सुखसे रहने लगीं। वहाँ उन्होंने दो पुत्र उत्पन्न किये, जिनके नाम थे कुश और लव। महर्षि वाल्मीकिने उन दोनोंके जातकर्म आदि संस्कार शास्त्रोक्त विधिसे किये। उन उदारबुद्धि महर्षिने रामायण महाकाव्यकी रचना करके उन दोनों बालकोंको पढ़ाया। वे दोनों बालक मुनियोंके यज्ञोंमें रामायणगान करते थे। इसके कारण उनकी सर्वत्र ख्याति फैल गयी। एक समय श्रीरामचन्द्रजीका अश्वमेध-यज्ञ प्रारम्भ होनेपर वे दोनों भाई कुश और लव उस यज्ञमें गये। वहाँ उन दोनोंके मुँहसे अपने चरित्रका गान यहाँ न आवे। यदि कोई आये तो आप उसका वध कर डालें।' श्रीरामने ऐसा करनेकी प्रतिज्ञा की। तत्पश्चात् रघुनाथजीने लक्ष्मणको बुलाकर कहा—'तुम यहाँ द्वारपर खड़े रहो। किसीको भीतर न आने देना। यदि कोई भीतर प्रवेश करेगा तो वह मेरा वध्य होगा।' तब लक्ष्मण 'बहुत अच्छा' कहकर श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाके पालनमें लग गये। इतनेहीमें महर्षि दुर्वासा राजद्वारपर लक्ष्मणके समीप आये। उन्हें आया देख लक्ष्मणने प्रणाम करके कहा—'भगवन् ! दो घड़ी प्रतीक्षा कीजिये। इस समय श्रीरघुनाथजी मन्त्रणामें लगे हैं।' उन्होंने लक्ष्मणकी बात सुनकर उनसे क्रोधपूर्वक कहा—

\ उत्तरभाग \ ७५५

* उत्तरभाग * ७५५

'मुझे भीतर जाने दो; नहीं तो मैं अभी तुम्हें भस्म कर दूँगा।' दुर्वासाका वचन सुनकर लक्ष्मणजी घबरा गये। वे मुनिसे भयभीत हो अपने बड़े भाईको उनके आगमनकी सूचना देनेके लिये स्वयं भीतर चले गये। लक्ष्मणको आया देख कालदेव उठे। उनकी मन्त्रणा पूरी हो चुकी थी। वे श्रीरामसे बोले—'आप अपनी प्रतिज्ञाका पालन कीजिये।' ऐसा कहकर श्रीरामसे विदा ले वे चले गये। तब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीराम राजभवनसे निकले और दुर्वासा मुनिको संतुष्ट करके उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें भोजन कराया। भोजन कराकर उन्हें प्रणाम किया और विदा करके लक्ष्मणसे कहा—'भैया लक्ष्मण! धर्मके कारण बड़ा भारी संकट आ गया, क्योंकि तुम मेरे वध्य हो गये। दैव बड़ा प्रबल है। वीर! मैंने तुझे त्याग दिया (यही तुम्हारे लिये वध है)। अब तुम जहाँ चाहो, चले जाओ।' तब सत्य-धर्ममें स्थित रहनेवाले श्रीरामको प्रणाम करके लक्ष्मणजी दक्षिण दिशामें जाकर एक पर्वतके ऊपर तपस्या करने लगे। तदनन्तर भगवान् श्रीराम भी ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे साकेतपुरी और कौसल्या-प्रान्तके समस्त प्राणियोंके साथ शान्तभावसे अपने परमधामको चले गये। उस समय सरयूके गोप्रतारघाटमें श्रीरामका चिन्तन करके जिन लोगोंने गोता लगाया, वे दिव्य शरीर धारण करके योगिदुर्लभ श्रीराम-धाममें चले गये। लक्ष्मणजी कुछ कालतक तपमें लगे रहे; फिर तपस्या एवं योगबलसे युक्त हो श्रीरामका अनुगमन करते हुए अविनाशी धाममें प्रवेश कर गये। सुमित्रानन्दन लक्ष्मणने उस पर्वतको प्रतिदिन अपने सान्निध्यका वर दिया और उसपर अपना अधिकार रखा; अतः वह लक्ष्मणजीका उत्तम क्षेत्र है। जो मनुष्य लक्ष्मणपर्वतपर भक्तिभावसे लक्ष्मणजीका दर्शन करते हैं, वे कृतार्थ होकर श्रीहरिके धाममें जाते हैं। उस तीर्थमें सुवर्ण, गौ, भूमि तथा अश्वके दानकी प्रशंसा की जाती है। वहाँ किया हुआ दान, होम, जप और पुण्यकर्म सब अक्षय होता है।

सेतु-क्षेत्रके विभिन्न तीर्थोंकी महिमा

**मोहिनी बोली—**द्विजश्रेष्ठ! आपको बार-बार साधुवाद है! क्योंकि आपने मुझे पूरी रामायणकी कथा सुना दी, जो मनुष्योंके समस्त पापोंका नाश और उनके पुण्यकी वृद्धि करनेवाली है। अब मैं आपसे सेतु (सेतुबन्ध रामेश्वर)-का उत्तम माहात्म्य सुनना चाहती हूँ।

**पुरोहित वसुने कहा—**देवि! सुनो, मैं तुम्हें उस सेतुका उत्तम माहात्म्य बतलाता हूँ, जिसका दर्शन करके मनुष्य संसार-सागरसे मुक्त हो जाता है। सेतुतीर्थका दर्शन परम पुण्यमय है, जहाँ भगवान् रामेश्वर विराजमान हैं। वे दर्शनमात्रसे मनुष्योंको अमरत्व प्रदान करते हैं। जो मनुष्य अपने मनको वशमें करके श्रीरामेश्वरका पूजन करता है, वह समस्त ऐश्वर्योंका भागी होता है। यहाँ दूसरा चक्र-तीर्थ भी है, जो पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ स्नान, दान, जप और होम

७५६* संक्षिप्त नारदपुराण *

करनेपर वह अनन्तगुना हो जाता है। सुभगे! यहाँसे पापविनाशनतीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्यके सारे पाप धुल जाते हैं और वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसके बाद सीताकुण्डमें जाकर वहाँ भलीभाँति स्नान करके जो देवताओं और पितरोंका तर्पण करता है, वह समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। फिर मङ्गलतीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य पापमुक्त होता है। अमृतवापीतीर्थमें स्नान करके मरणधर्मा मानव अमरत्व प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मकुण्डमें स्नान करनेसे मनुष्यको ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। लक्ष्मणतीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य योगगति पाता है। हनुमत्-कुण्डमें स्नान करके मनुष्य शत्रुओंके लिये दुर्जय हो जाता है। रामकुण्डमें स्नान करनेवाला मानव श्रीरामका सालोक्य प्राप्त करता है। अग्नितीर्थमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है। शिवतीर्थमें स्नान करनेसे शिवलोककी प्राप्ति होती है। शङ्खतीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य दुर्गतिमें नहीं पड़ता। कोटितीर्थमें गोता लगाकर मानव सम्पूर्ण तीर्थोंका फल पाता है। धनुष्कोटितीर्थमें विधिपूर्वक स्नान करनेवाला पुरुष बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। गायत्री तथा सरस्वतीतीर्थमें स्नान करनेवाला पुरुष पापसे मुक्त हो जाता है। ऋणमोचनतीर्थ आदिमें स्नान करके मनुष्य सब प्रकारके ऋणसे छूट जाता है। शुभे! इस प्रकार मैंने सेतु (सेतुबन्ध रामेश्वर)-के तीर्थोंका माहात्म्य बताया है, जो पढ़ने और सुननेवाले पुरुषोंके सब पापोंका नाश कर देता है।

नर्मदाके तीर्थोंका दिग्दर्शन तथा उनका माहात्म्य

**मोहिनी बोली—**द्विजश्रेष्ठ! मैंने सेतुतीर्थका उत्तम माहात्म्य सुन लिया। अब नर्मदाके तीर्थ-समुदायका वर्णन सुनना चाहती हूँ।

**पुरोहित वसुने कहा—**मोहिनि! मैं नर्मदाके दोनों तटोंपर विद्यमान तीर्थोंका वर्णन करता हूँ। उत्तर तटपर ग्यारह और दक्षिण तटपर तेईस तीर्थ हैं। नर्मदा और समुद्रके संगमको पैंतीसवाँ तीर्थ कहा गया है। ॐकार-तीर्थके दोनों ओर अमरकण्टक पर्वतसे दो कोस दूरतक सब दिशाओंमें साढ़े तीन करोड़ तीर्थ विद्यमान हैं। एक करोड़ तीर्थ तो कपिलासंगममें हैं। अशोकवनिकामें एक लाख तीर्थ प्रतिष्ठित हैं। अङ्गारगर्तके सौ और कुब्जाके दस हजार तीर्थ कहे गये हैं। वायुसंगममें सहस्र और सरस्वतीसंगममें सौ तीर्थ स्थित हैं। शुक्ल-तीर्थमें दो सौ, विष्णु-तीर्थमें एक हजार तीर्थ हैं। माहिष्मतीमें एक सहस्र और शूलभेद-तीर्थमें दस हजार तीर्थोंकी स्थिति मानी गयी है। देवग्राममें एक सहस्र और उलूक-तीर्थमें सात सौ तीर्थ हैं। मणि नदीके संगममें एक सौ आठ तीर्थ हैं। वैद्यनाथमें एक सौ आठ और घटेश्वरमें भी उतने ही तीर्थ हैं। नर्मदा-समुद्र-संगममें डेढ़ लाख तीर्थोंका निवास बताया गया है। व्यासद्वीपमें अट्ठासी हजार एक सौ तीर्थ हैं। करञ्जासंगममें दस हजार आठ तीर्थ हैं। एरण्डीसंगममें एक सौ आठ तीर्थ हैं। धूतपाप-तीर्थमें अड़सठ और कोकिलमें डेढ़ करोड़ तीर्थ हैं। नरेश्वरि! रोमकेशमें सहस्र, द्वादशार्कमें सहस्र तथा शुक्ल-तीर्थमें आठ लाख दो हजार तीर्थ हैं। सभी संगमोंमें एक सौ आठ तीर्थोंकी स्थिति मानी गयी है। कावेरी-संगम या नन्द-तीर्थमें पाँच सौ अवान्तर तीर्थ हैं। भृगुक्षेत्रमें एक करोड़ और भारभूतमें एक सौ आठ तीर्थ विद्यमान हैं। अक्रूरेश्वरमें डेढ़ सौ और विमलेश्वरमें एक लाख तीर्थ हैं। शुभानने! सूर्यके दस, कपिलके नौ, चन्द्रमाके आठ और नन्दीके एक करोड़ आठ तीर्थ हैं। स्तवकोंमें दो सौ चौदह तीर्थ हैं। ये सब