संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished770 पृष्ठ
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| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ४३- मुक्तिप्रद योगका वर्णन | १८७ | व्यासजीके पास आकर भागवतशास्त्र पढ़ना | ४१७ |
| ४४- राजा भरतका मृगशरीरमें आसक्तिके कारण मृग होना, फिर ज्ञानसम्पन्न ब्राह्मण होकर जड-वृत्तिसे रहना, जडभरत और सौवीरनरेशका संवाद | १९२ | <br>तृतीय पाद<br>५८- शैवदर्शनके अनुसार पति, पशु एवं पाश आदिका वर्णन तथा दीक्षाकी महत्ता | ४२१ |
| ४५- जडभरत और सौवीरनरेशका संवाद—परमार्थका निरूपण तथा ऋभुका निदाघको अद्वैतज्ञानका उपदेश | १९७ | ५९- मन्त्रके सम्बन्धमें अनेक ज्ञातव्य बातें, मन्त्रके विविध दोष तथा उत्तम आचार्य एवं शिष्यके लक्षण | ४२९ |
| ४६- शिक्षा-निरूपण | २०१ | ६०- मन्त्र-शोधन, दीक्षाविधि, पञ्चदेवपूजा तथा जपपूर्वक इष्टदेव और आत्मचिन्तनका विधान | ४३२ |
| ४७- वेदके द्वितीय अङ्ग कल्पका वर्णन—गणेश-पूजन, ग्रहशान्ति तथा श्राद्धका निरूपण | २१६ | ६१- शौचाचार, स्नान, संध्या-तर्पण, पूजागृहमें देवताओंका पूजन, केशव-कीर्त्यादि मातृका-न्यास, श्रीकण्ठमातृका, गणेशमातृका, कला-मातृका आदि न्यासोंका वर्णन | ४३६ |
| ४८- व्याकरण-शास्त्रका वर्ण | २२५ | ६२- देवपूजनकी विधि | ४४३ |
| ४९- निरुक्त-वर्णन | २५५ | ६३- श्रीमन्महाविष्णु-सम्बन्धी अष्टाक्षर, द्वादशाक्षर आदि विविध मन्त्रोंके अनुष्ठानकी विधि | ४५२ |
| ५०- त्रिस्कन्ध ज्योतिषके वर्णन-प्रसङ्गमें गणित-विषयका प्रतिपादन | २६२ | ६४- भगवान् श्रीराम, सीता, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न-सम्बन्धी विविध मन्त्रोंके अनुष्ठानकी संक्षिप्त विधि | ४५६ |
| ५१- त्रिस्कन्ध ज्योतिषका जातकस्कन्ध | ३०१ | ६५- विविध मन्त्रोंद्वारा श्रीहनुमान्जीकी उपासना, दीपदानविधि और कामनानाशक भूतविद्रावण-मन्त्रोंका वर्णन | ४६४ |
| ५२- त्रिस्कन्ध ज्योतिषका संहिताप्रकरण (विविध उपयोगी विषयोंका वर्णन) | ३३९ | ६६- भगवान् श्रीकृष्ण-सम्बन्धी मन्त्रोंकी अनुष्ठान-विधि तथा विविध प्रयोग | ४७४ |
| ५३- छन्दःशास्त्रका संक्षिप्त परिचय | ३९४ | ६७- श्रीकृष्ण-सम्बन्धी विविध मन्त्रों तथा व्यास-सम्बन्धी मन्त्रकी अनुष्ठानविधि | ४९० |
| ५४- शुकदेवजीका मिथिलागमन, राजभवनमें युवतियोंद्वारा उनकी सेवा, राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका सत्कार और शुकदेवजीके साथ उनका मोक्षविषयक संवाद | ४०७ | ६८- श्रीनारदजीको भगवान् शङ्करसे प्राप्त हुए युगल-शरणागति-मन्त्र तथा राधाकृष्ण-युगलसहस्र-नाम-स्तोत्रका वर्णन | ५०१ |
| ५५- व्यासजीका शुकदेवको अनध्यायका कारण बताते हुए 'प्रवह' आदि सात वायुओंका परिचय देना तथा सनत्कुमारका शुकको ज्ञानोपदेश | ४११ | ||
| ५६- शुकदेवजीको सनत्कुमारका उपदेश | ४१५ | ||
| ५७- श्रीशुकदेवजीकी ऊर्ध्वगति, श्वेतद्वीप तथा वैकुण्ठधाममें जाकर शुकदेवजीके द्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति और भगवान्की आज्ञासे शुकदेवजीका |