भारतकोश
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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-तृतीय पाद ४२३

  • पूर्वभाग-तृतीय पाद * ४२३

आच्छादन कर लेता है और यही जीवात्माओंके लिये देहान्तरकी प्राप्तिमें कारण होता है। धर्म और अधर्मका नाम है कर्म, जो विचित्र फल-भोग प्रदान करनेवाला है। यह 'कर्म' प्रवाहरूपसे नित्य है। बीजांकुर-न्यायसे इसकी स्थिति अनादि मानी गयी है। इस प्रकार ये प्रथम दो (मलज और कर्मज) पाश बताये गये। ब्रह्मन्! अब 'मायेय' आदि पाशोंका वर्णन सुनो।

('विन्दुज पाश' अपरामुक्ति-स्वरूप है और शिव-स्वरूपकी प्राप्ति करानेवाला है, उसका स्वरूप यह है—) सत्, चित् और आनन्द जिनका स्वरूपभूत वैभव है, वे एकमात्र सर्वव्यापी सनातन परमात्मा ही सबके कारण तथा सम्पूर्ण जीवोंके पतिरूपसे विराज रहे हैं। जो मनमें तो आता है, किंतु प्रकट नहीं होता और संसारसे निवृत्ति (वैराग्य) प्रदान करता है; तथा दृक्-शक्ति और क्रियाशक्तिके रूपमें जो स्वयं ही विद्यमान है, वह उत्कृष्ट शैव तेज है। इसके सिवा, जिस शक्तिसे समर्थ होकर जीव परमात्माके समीप दिव्य भोगसे सम्पन्न होता और पशु-समुदायकी कोटिसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है, परमात्माकी उस एकान्तस्वरूपा आद्या शक्तिको चिद्रूपा कहते हैं। उस चिद्रूपा शक्तिसे उत्कर्षको प्राप्त हुआ 'विन्दु' दृक् (ज्ञान) और क्रिया-स्वरूप होकर शिव-नामसे प्रतिपादित होता है, उसीको सम्पूर्ण तत्त्वोंका कारण बताया गया है। वह सर्वत्र व्यापक तथा अविनाशी है। उसीमें संनिहित हुई इच्छा आदि सम्पूर्ण शक्तियाँ उसके सकाशसे अपना-अपना कार्य करती हैं। मुने! इसलिये यह सबपर अनुग्रह करनेवाला है। जड और चेतनपर अनुग्रह करनेके लिये विश्वकी सृष्टि करते समय इसका प्रथम उन्मेष नादके रूपमें हुआ है, जो शान्ति आदिसे युक्त तथा भुवन-स्वरूप है। विप्रवर! वह शक्ति-तत्त्व सावयव बताया गया है। इससे ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्तिका तथा उत्कर्ष और अपकर्षका प्रसार एवं अभाव होता है; अतः यह तत्त्व सदा शिवरूप है। जहाँ दृक्-शक्ति तिरोहित होती है और क्रियाशक्ति बढ़ जाती है, वह ईश्वर नामक तत्त्व कहा गया है; जो समस्त मनोरथोंका साधक है, जहाँ क्रियाशक्तिका तिरोभाव और ज्ञानशक्तिका उद्रेक


विज्ञानकल पशु (जीव)-के भी दो भेद हैं—'समास-कलुष' और 'असमास-कलुष'। (१) जीवात्मा जो कर्म करता है, उस प्रत्येक कर्मकी तह मलपर जमती रहती है। इसी कारण उस मलका परिपाक नहीं होने पाता, किंतु जब कर्मोंका त्याग हो जाता है, तब तह न जमनेके कारण मलका परिपाक हो जाता है और जीवात्माके सारे कलुष समास हो जाते हैं, इसीलिये वह 'समास-कलुष' कहलाता है। ऐसे जीवात्माओंको भगवान् आठ प्रकारके 'विद्येश्वर' पदपर पहुँचा देते हैं, उनके नाम ये हैं—

'अनन्तश्चैव सूक्ष्मश्च तथैव च शिवोत्तमः। एकनेत्रस्तथैवैकरुद्रश्चापि त्रिमूर्तिकः ॥
श्रीकण्ठश्च शिखण्डी च प्रोक्ता विद्येश्वरा इमे।'

(१) अनन्त, (२) सूक्ष्म, (३) शिवोत्तम, (४) एकनेत्र, (५) एकरुद्र, (६) त्रिमूर्ति, (७) श्रीकण्ठ और (८) शिखण्डी।

(२) 'असमास-कलुष' वे हैं, जिनकी कलुषराशि अभी समाप्त नहीं हुई है। ऐसे जीवात्माओंको परमेश्वर 'मन्त्र' स्वरूप दे देता है। कर्म तथा शरीरसे रहित किंतु मलरूपी पाशमें बँधे हुए जीवात्मा ही मन्त्र हैं और इनकी संख्या सात करोड़ है। ये सब अन्य जीवात्माओंपर अपनी कृपा करते रहते हैं। तत्त्व-प्रकाश नामक ग्रन्थमें उपर्युक्त विषयके संग्राहक श्लोक इस प्रकार हैं—

पशवस्त्रिविधाः प्रोक्ता विज्ञानप्रलयाकलौ सकलः। मलयुक्तस्तत्राद्यो मलकर्मयुतो द्वितीयः स्यात्।
मलमायाकर्मयुतः सकलस्तेषु द्विधा भवेदाद्यः । आद्यः समाप्तकलुषोऽसमाप्तकलुषो द्वितीयः स्यात्।
आद्याननुगृह्य शिवो विद्येशत्वे नियोजयत्यष्टौ । मन्त्रांश्च करोत्यपरान् ते चोक्ताः कोटयः सप्त ॥

'प्रलयाकल' भी दो प्रकारके होते हैं—'पक्वपाशद्वय' और 'अपक्वपाशद्वय'। (१) जिनके मल तथा कर्मरूपी

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होता है, वह विद्यातत्त्व कहलाता है। जो ज्ञानस्वरूप एवं प्रकाशक है। नाद, विन्दु और सकल—ये सत्-नामक तत्त्वके आश्रित हैं। आठ विद्येश्वरगण ईशतत्त्वके और सात करोड़ 'मन्त्र' गण विद्यातत्त्वके आश्रित हैं। ये सब तत्त्व शुद्धमार्गके नामसे कहे गये हैं। यहाँ ईश्वर साक्षात् निमित्त कारण हैं। वे ही बिन्दुरूपसे सुशोभित हो यहाँ उपादानकारण बनते हैं। पाँच प्रकारके जो पाश हैं, उनका कोई समय न होनेके कारण उनका कोई निश्चित क्रम नहीं है; उनका व्यापार देखकर ही उनकी कल्पना की जाती है। वास्तवमें विचित्र शक्तियोंसे युक्त एक ही शिव नामक तत्त्व विराजमान है। वह शक्तियुक्त होनेसे 'शाक्त' कहा गया है। अन्तःकरणकी वृत्तियोंके भेदसे ही अनेक प्रकारकी कल्पनाएँ की गयी हैं, प्रभु शिव जड-चेतनपर अनुग्रह करने लिये विविध रूप धारण करके अनादि मलसे आबद्ध जीवोंपर कृपा करते हैं। सबपर दया करनेवाले शिव सम्पूर्ण जीवोंको भोग और मोक्ष तथा जडवर्गको अपने व्यापारमें लगनेकी शक्ति-सामर्थ्य देते हैं। भगवान् शिवके समान रूपका हो जाना ही मोक्ष है, यही चेतन जीवोंपर ईश्वरका अनुग्रह है। कर्म अनादि होनेके कारण सदा वर्तमान रहते हैं; अतः उनका भोग किये बिना भी भगवत्कृपासे मोक्ष हो जाता है। इसीलिये भगवान् शङ्करको अनुग्राहक (कृपा करनेवाला) कहा गया है। अविनाशी प्रभु जीवोंके भोगके लिये सूक्ष्म करणोंद्वारा अनायास ही जगत्‌की उत्पत्ति करते हैं। कोई भी कर्ता किसी भी कार्यमें उपादान और करणोंके बिना नहीं देखा जाता।

(अब 'मायापाश'का प्रसङ्ग है—) यहाँ शक्तियाँ ही करण हैं। मायाको उपादान माना गया है। वह नित्य, एक और कल्याणमयी है। उसका न आदि है न अन्त; वह माया अपनी शक्तिद्वारा मनुष्यों और लोकोंकी उत्पत्तिका सामान्य कारण है। माया अपने कर्मोंद्वारा स्वभावतः मोहजनक होती है। उससे भिन्न 'परा माया' है, जो सूक्ष्म एवं व्यापक है। इन विकारयुक्त कार्योंसे वह सर्वथा परे मानी गयी है। विद्याके स्वामी भगवान् शिव जीवके कर्मोंको देखकर अपनी शक्तियोंसे मायाको क्षोभमें डालते और जीवोंके भोगके लिये मायाके द्वारा ही शरीर एवं इन्द्रियोंकी सृष्टि करते हैं। अनेक शक्तियोंसे सम्पन्न माया पहले कालतत्त्वकी दोनों पाशोंका परिपाक हो गया है, वे 'पक्वपाशद्वय' मोक्षको प्राप्त हो जाते हैं। (२) 'अपक्वपाशद्वय' जीव पृथक् देह धारण करके नाना प्रकारके कर्मोंको करते हुए नाना योनियोंमें घूमा करते हैं।

'सकल' जीवोंके भी दो भेद हैं—'पक्व-कलुष' और 'अपक्व-कलुष'। (१) जैसे-जैसे जीवात्माके मल, कर्म तथा माया—इन पाशोंका परिपाक बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे ये सब पाश शक्तिहीन होते जाते हैं। तब ये पक्व-कलुष जीवात्मा 'मन्त्रेश्वर' कहलाते हैं। सात करोड़ मन्त्ररूपी जीव-विशेषोंके, जिनका ऊपर वर्णन हो चुका है, अधिकारी ये ही ११८ मन्त्रेश्वर जीव हैं। (२) अपक्व-कलुष जीव भवकूपमें गिरते हैं।

पाश

नारदपुराणमें शैव-महातन्त्रकी मान्यताके अनुसार पाँच प्रकारके पाश बताये गये हैं—(१) मलज, (२) कर्मज, (३) मायेय (मायाजन्य), (४) तिरोधान-शक्ति और (५) बिन्दुज। आधुनिक शैवदर्शनमें चार प्रकारके पाशोंका उल्लेख है—मल, रोध, कर्म तथा माया। रोधशक्ति या तिरोधानशक्ति एक ही वस्तु है। 'विन्दु' मायास्वरूप है, वह 'शिव-तत्त्व' नामसे भी जानने योग्य है। यद्यपि शिवपदप्राप्तिरूप परम मोक्षकी अपेक्षासे वह भी पाश ही है, तथापि विद्येश्वरादि पदकी प्राप्तिमें परम हेतु होनेके कारण विन्दु-शक्तिको 'अपरा मुक्ति' कहा गया है, अतः उसे आधुनिक शैवदर्शनमें 'पाश' नाम नहीं दिया गया है। इसलिये यहाँ शेष चार पाशों (मल, कर्म, रोध और माया)-के ही स्वरूपका विचार किया जाता है—(१) जो आत्माकी स्वाभाविक ज्ञान तथा क्रिया-शक्तिको ढक ले, वह 'मल' (अर्थात् अज्ञान) कहलाता है। यह मल आत्मस्वरूपका केवल आच्छादन ही नहीं करता; किंतु जीवात्माको

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सृष्टि करती है। भूत, भविष्य और वर्तमान जगत्का संकलन तथा लय करती है। तदनन्तर माया नियमन-शक्तिस्वरूपा नियतिकी सृष्टि करती है। यह सबको नियममें रखती है; इसलिये नियति कही गयी है। तत्पश्चात् सम्पूर्ण विश्वको मोहमें डालनेवाली आदि-अन्तरहित नित्य माया 'कला'-तत्त्वको जन्म देती है; क्योंकि एक ओरसे मनुष्योंके मलकी कलना करके वह उनमें कर्तृत्व-शक्ति प्रकट करती है; इसीलिये इसका नाम कला है। यह कला ही 'काल' और 'नियति' के सहयोगसे पृथ्वीपर्यन्त अपना सारा व्यापार करती है। वही पुरुषको विषयोंका दर्शन अनुभव करानेके लिये प्रकाशस्वरूप 'विद्या' नामक तत्त्व उत्पन्न करती है। विद्या अपने कर्मसे ज्ञानशक्तिके आवरणका भेदन करके जीवात्माओंको विषयोंका दर्शन कराती है, इसलिये वह कारण मानी गयी है; क्योंकि वह विद्या भोग्य उत्पन्न करती है, जिससे पुरुष उद्बुद्धशक्ति होकर परम करणके द्वारा महत्-तत्त्वआदिको प्रेरित करके भोग्य, भोग और भोक्ताकी उद्भावना करता है। अतः वह विद्या परम करण है। भोक्ता पुरुषको भोग्य वस्तुकी प्रतीति करानेसे विद्याको 'करण' कहा गया है। बुद्धिके द्वारा जो चेतन-जीवको विषयका अनुभव होता है, उसीको 'भोग' कहते हैं। संक्षेपसे विषयाकारा बुद्धि ही सुख-दुःख आदिके रूपमें परिणत होती है। भोक्ताको भोग्य वस्तुका अनुभव अपने-आप ही होता है। विद्या उसमें सहायकमात्र होती है। यद्यपि बुद्धि सूर्यकी भाँति प्रकाशमात्र करनेवाली है, तथापि कर्मरूप होनेके कारण उसमें स्वयं कर्तृत्व नहीं है। वह करणान्तरोंकी अपेक्षासे ही पुरुषको विषयोंका अनुभव करानेमें समर्थ होती है। पुरुष स्वयं ही करण आदिसे सम्बन्ध स्थापित करता और भोगोंकी उत्कण्ठासे स्वयं ही बुद्धि आदिको प्रेरित करता है। साथ ही उन बुद्धि आदिकी शुभाशुभ चेष्टाओंसे प्राप्त होनेवाले फलका उसीको भोग करना पड़ता है। इसलिये पुरुषका कर्तृत्व सिद्ध होता है। यदि

बलपूर्वक दुष्कर्मोंमें प्रवृत्त करनेवाला पाश भी यही है। (२) प्रत्येक वस्तुमें जो सामर्थ्य है, उसे 'शिव-शक्ति' कहते हैं, जैसे अग्निमें दाहक-शक्ति। यह शक्ति जैसे पदार्थमें रहती है, वैसा ही भला, बुरा स्वरूप धारण कर लेती है; अतः पाशमें रहती हुई यह शक्ति जब आत्माके स्वरूपको ढक लेती है, तब यह 'रोध-शक्ति' या 'तिरोधान-पाश' कहलाती है। इस अवस्थामें जीव शरीरको आत्मा मानकर शरीरके पोषणमें लगा रहता है, आत्माके उद्धारका प्रयत्न नहीं करता। (३) फलकी इच्छासे किये हुए 'धर्माधर्म' रूप कर्मोंको ही 'कर्मपाश' कहते हैं। (४) जिस शक्तिमें प्रलयके समय सब कुछ लीन हो जाता है तथा सृष्टिके समय जिसमेंसे सब कुछ उत्पन्न हो जाता है, वह 'मायापाश' है। अतः इन पाशोंमें बँधा हुआ पशु जब तत्त्वज्ञानद्वारा इनका उच्छेद कर डालता है, तभी वह परम शिवतत्त्व अर्थात् पशुपतिपदको प्राप्त होता है।

दीक्षा

दीक्षा ही शिवत्व-प्राप्तिका साधन है। सर्वानुग्राहक परमेश्वर ही आचार्य-शरीरमें स्थित होकर दीक्षाकरणद्वारा जीवको परम शिवतत्त्वकी प्राप्ति कराते हैं; ऐसा ही कहा भी है— 'योजयति परे तत्त्वे स दीक्षायाऽऽचार्यमूर्त्तिस्थः।'

'अपक्व-पाशद्वय प्रलयाकल' जीव तथा 'अपक्व-कलुष सकल' जीव जिस पुर्यष्टक देहको धारण करते हैं, वह पञ्चभूत तथा मन, बुद्धि, अहंकार—इन आठ तत्त्वोंसे युक्त होनेके कारण पुर्यष्टक कहलाती है। पुर्यष्टक शरीर छत्तीस तत्त्वोंसे युक्त होता है। अन्तर्भोगके साधनभूत कला, काल, नियति, विद्या, राग, प्रकृति और गुण—ये सात तत्त्व, पञ्चभूत, पञ्चतन्मात्रा, दस इन्द्रियाँ, चार अन्तःकरण और पाँच शब्द आदि विषय—ये छत्तीस तत्त्व हैं। अपक्व पाशद्वय जीवोंमें जो अधिक पुण्यात्मा हैं, उन्हें परम दयालु भगवान् महेश्वर भुवनेश्वर या लोकपाल बना देते हैं।

नारदपुराणके इस अध्यायमें इन्हीं उपर्युक्त तत्त्वोंका क्रम या व्युत्क्रमसे विवेचन किया गया है। पाठकोंको मनोयोगपूर्वक इसे पढ़ना और हृदयङ्गम करना चाहिये।

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उसमें कर्तृत्व न स्वीकार किया जाय तो उसके भोक्तृत्वका कथन भी व्यर्थ होता है। इसके सिवा, प्रधान पुरुषके द्वारा आचरित सब कर्म निष्फल हो जाता। यदि पुरुष करण आदिका प्रेरक न हो और उसमें कर्तृत्वका अभाव हो तो उसके द्वारा भोग भी असम्भव ही है। इसलिये पुरुष ही यहाँ प्रवर्तक है। उसका करण आदिका प्रेरक होना विद्याके द्वारा ही सम्भव माना गया है।

तदनन्तर कला दृढ़ वज्रलेपके सदृश रागको उत्पन्न करती है, जिससे उस वज्रलेप-रागयुक्त पुरुषमें भोग्य वस्तुके लिये क्रियाप्रवृत्ति उत्पन्न होती है, इसलिये इसका नाम राग है। इन सब तत्त्वोंसे जब यह आत्मा भोक्तृत्व-दशाको पहुँचाया जाता है, तब वह पुरुष नाम धारण करता है। तत्पश्चात् कला ही अव्यक्त प्रकृतिको जन्म देती है। जो पुरुषके लिये भोग उपस्थित करती है, वह अव्यक्त ही गुणमय सप्तग्रन्थि*-विधानका कारण है। इसमें गुणोंका विभाग नहीं है; जैसे आधारमें पृथ्वी आदिके भागका विभाग नहीं होता। उनका जो आधार है, वह भी अव्यक्त ही कहलाता है। गुण तीन ही हैं। उनका अव्यक्तसे ही प्राकट्य होता है। उनके नाम हैं—सत्त्व, रज और तम। गुणोंसे ही बुद्धि इन्द्रिय-व्यापारका नियमन और विषयोंका निश्चय करती है। गुणसे त्रिविध कर्मोंके अनुसार बुद्धि भी सात्त्विक, राजस और तामस-भेदसे तीन प्रकारकी कही गयी है। महत्-तत्त्वसे अहंकार उत्पन्न होता है, जो अहम्भावकी वृत्तिसे युक्त होता है। इस अहंकारके ही सम्भेद (इन्द्रिय और देवता आदिके रूपमें परिणति)-से विषय व्यवहारमें आते हैं। अहंकार सत्त्वादि गुणोंके भेदसे तीन प्रकारका होता है। उन तीनोंके नाम हैं—तैजस, राजस और तामस अहंकार। उनमें तैजस अहंकारसे मनसहित ज्ञानेन्द्रियाँ प्रकट हुई हैं। जो सत्त्वगुणके प्रकाशसे युक्त होकर विषयोंका बोध कराती हैं। क्रियाके हेतुभूत राजस अहंकारसे कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। तामस अहंकारसे पाँच तन्मात्राएँ उत्पन्न होती हैं, जो पाँचों भूतोंकी उत्पत्तिमें कारण हैं। इनमें मन इच्छा और संकल्पके व्यापारवाला है। अतः वह दो विकारोंसे युक्त है। वह बाह्य इन्द्रियोंका रूप धारण करके, जो उसके लिये सर्वथा उचित है, सदा भोक्ताके लिये भोगका उत्पादक होता है। मन अपने संकल्पसे हृदयके भीतर स्थित रहकर इन्द्रियोंमें विषय-ग्रहणकी शक्ति उत्पन्न करता है; इसलिये उसे अन्तःकरण कहते हैं। मन, बुद्धि और अहंकार—ये अन्तःकरणके तीन भेद हैं। इच्छा, बोध और संरम्भ (गर्व या अहम्भाव)—ये क्रमशः इनकी तीन वृत्तियाँ हैं।

कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका—ये ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। मुने! शब्द आदि इनके ग्राह्य-विषय जानने चाहिये। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये शब्दादि विषय माने गये हैं। वाणी, हाथ, पैर, गुदा और लिङ्ग—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। ये बोलने, ग्रहण करने, चलने, मल-त्याग करने और मैथुनजनित आनन्दकी उपलब्धिकरूपी कर्मोंकी सिद्धिके करण हैं; क्योंकि कोई भी क्रिया करणोंके बिना नहीं हो सकती। कार्यमें लगाकर दस प्रकारके करणोंद्वारा चेष्टा की जाती है। व्यापक होनेके कारण कार्यका आश्रय लेकर सब इन्द्रियाँ चेष्टा करती हैं, इसलिये उनका नाम करण है। आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—ये पाँच तन्मात्राएँ हैं। इन तन्मात्राओंसे ही आकाश आदि पाँच भूत प्रकट होते हैं, जो एक-एक विशेष गुणके कारण प्रसिद्ध हैं। शब्द आकाशका मुख्य गुण है; किंतु यह पाँचों भूतोंमें सामान्य रूपसे उपलब्ध होता है। स्पर्श वायुका विशेष गुण है; किंतु वह वायु आदि चारों भूतोंमें


* कला, काल, नियति, विद्या, राग, प्रकृति और गुण—ये सात ग्रन्थियाँ हैं, यही आन्तरिक भोग-साधन कहे गये हैं।

\ पूर्वभाग-तृतीय पाद \

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विद्यमान है। रूप तेजका विशेष गुण है, जो तेज आदि तीनों भूतोंमें उपलब्ध है। रस जलका विशेष गुण है, जो जल और पृथ्वी दोनोंमें विद्यमान है तथा गन्ध नामक गुण केवल पृथ्वीमें ही उपलब्ध होता है। इन पाँचों भूतोंके कार्य क्रमशः इस प्रकार हैं—अवकाश, चेष्टा, पाक, संग्रह और धारण। वायुमें न शीत स्पर्श है न उष्ण, जलमें शीतल स्पर्श है, तेजमें उष्ण स्पर्श है, अग्निमें भास्वर शुक्लरूप है और जलमें अभास्वर शुक्ल। पृथ्वीमें शुक्ल आदि अनेक वर्ण हैं। रूप केवल तीन भूतोंमें है। जलमें केवल मधुर-रस है और पृथ्वीमें छः प्रकारका रस है। पृथ्वीमें दो प्रकारकी गन्ध कही गयी है—सुरभि तथा असुरभि। तन्मात्राओंमें उनके भूतोंके ही गुण हैं। करण और पोषण यह भूतसमुदायकी विशेषता है। परमात्मतत्त्व निर्विशेष है। ये पाँचों भूत सब ओर व्याप्त हैं। सम्पूर्ण चराचर जगत् पञ्चभूतमय है। शरीरमें जो इन पाँचों भूतोंका संनिवेश है, उसका निरूपण किया जाता है। देहके भीतर जो हड्डी, मांस, केश, त्वचा, नख और दाँत आदि हैं, वे पृथ्वीके अंश हैं। मूत्र, रक्त, कफ, स्वेद और शुक्र आदिमें जलकी स्थिति है। हृदयमें, नेत्रोंमें और पित्तमें तेजकी स्थिति है; क्योंकि वहाँ उसके उष्णत्व और प्रकाश आदि धर्मोंका दर्शन होता है। शरीरमें प्राण आदि वृत्तियोंके भेदसे वायुकी स्थिति मानी गयी है। सम्पूर्ण नाड़ियों तथा गर्भाशयमें आकाशतत्त्व व्याप्त है। कलासे लेकर पृथ्वीपर्यन्त यह तत्त्वसमुदाय सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका साधन है। प्रत्येक शरीरमें भी यह नियत है। भोग-भेदसे इसका निश्चय किया जाता है। इस प्रकार प्रत्येक पुरुषमें नियति-कला आदि तत्त्व कर्मवश प्राप्त हुए सम्पूर्ण शरीरोंमें विचरते हैं। यह ‘मायेय पाश’ कहलाता है। जिससे यह सम्पूर्ण जगत् आवृत्त है। पृथ्वीसे लेकर कलापर्यन्त सम्पूर्ण तत्त्व-समुदाय अशुद्धमार्ग माना गया है।

(अब ‘निरोध-शक्तिज’ पाशका वर्णन है—)

भूमण्डलमें वह स्थावर-जङ्गम रूपसे विद्यमान है। पर्वत और वृक्ष आदिको स्थावर कहते हैं। जङ्गमके तीन भेद हैं—स्वेदज, अण्डज और जरायुज। चराचर भूतोंमें चौरासी लाख योनियाँ हैं। उन सबमें भ्रमण करता हुआ जीव कभी कर्मवश मनुष्य-शरीर प्राप्त कर लेता है, जो सबसे उत्तम और सम्पूर्ण पुरुषार्थोंका साधक है। उसमें भी भारतवर्षमें ब्राह्मण आदि द्विजोंके कुलमें तो महान् पुण्यसे ही जन्म होता है। ऐसा जन्म अत्यन्त दुर्लभ है। जन्म इस प्रकार होता है। पहले स्त्री-पुरुषका संयोग होता है, फिर रज-वीर्यके योगसे एक विन्दु गर्भाशयमें प्रवेश करता है। यह विन्दु द्वयात्मक होता है—इसमें स्त्री और पुरुष—दोनोंके रज-वीर्यका सम्मिश्रण होता है। उस समय रजकी अधिकता होनेपर कन्याका जन्म होता है और वीर्यकी मात्रा अधिक होनेपर पुत्रकी उत्पत्ति होती है। उसमें मल, कर्म आदि पाशसे बँधा हुआ कोई आत्मा जीवभावको प्राप्त होता है, वह (मल, माया और कर्म त्रिविध पाशसे युक्त होनेके कारण) ‘सकल’ कहा गया है। गर्भमें माताके खाये हुए अन्न-पान आदिसे पोषित होकर उसका शरीर पक्ष-मास आदि कालसे बढ़ता रहता है। उसका शरीर जरायुसे ढका होता है और अनेक प्रकारके दुःख आदिसे उसे पीड़ा पहुँचती रहती है। इस प्रकार गर्भमें स्थित जीव अपने पूर्वजन्मके शुभाशुभ कर्मोंका स्मरण करके बार-बार दुःखमग्न एवं पीड़ित होता रहता है। फिर समयानुसार वह बालक स्वयं पीड़ित होकर माताको भी पीड़ा देता हुआ नीचे मुँह किये योनियन्त्रसे बाहर निकलता है। बाहर आकर वह क्षणभर निश्चेष्ट रहता है। फिर रोना चाहता है। तदनन्तर क्रमशः प्रतिदिन बढ़ता हुआ बाल, पौगण्ड आदि अवस्थाओंको पार करता हुआ युवावस्थामें जा पहुँचता है। इस लोकमें देहधारियोंके शरीरका इसी क्रमसे प्रादुर्भाव होता है। जो सम्पूर्ण लोकोंका उपकार करनेवाले

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दुर्लभ मानव-जीवनको पाकर अपने आत्माका उद्धार नहीं करता, उससे बढ़कर पापी यहाँ कौन है? आहार, निद्रा, भय और मैथुन—यह सम्पूर्ण पशु आदि जीवोंके लिये सामान्य कहा गया है। जो मूर्ख इन्हीं चार बातोंमें फँसा हुआ है, वह आत्महत्यारा है। अपने बन्धनका उच्छेद करना यह मनुष्योंका विशेष धर्म है।

बन्धनाशका उपाय

पाशबन्धनका विच्छेद दीक्षासे ही होता है, अतः बन्धनका विच्छेद करनेके लिये मन्त्रदीक्षा ग्रहण करनी चाहिये। दीक्षा एवं ज्ञान-शक्तिसे अपने बन्धनका नाश करके शुद्ध आत्मा नामसे स्थित हुआ पुरुष निर्वाणपद (मोक्ष)-को प्राप्त होता है। जो अपनी शक्तिस्वरूपा दृष्टिसे भगवान् शिवका ध्यान एवं दर्शन करता है और शिवमन्त्रोंसे उनकी आराधनामें तत्पर रहता है, वह अपना और दूसरोंका हितकारी है। शिवरूपी सूर्यकी शक्तिरूपी किरणसे समर्थ हुई चैतन्यदृष्टिके द्वारा पुरुष आवरणको अपनेमें लीन करके शक्ति आदिके साथ शिवका साक्षात्कार करता है। अन्तःकरणकी जो बोध नामक वृत्ति है, वह निगड (बेड़ी) आदिकी भाँति पाशरूप होनेके कारण महेश्वरको प्रकाशित करनेमें समर्थ नहीं होती। दीक्षा ही पाशका उच्छेद करनेमें सर्वोत्तम हेतु है, अतः शास्त्रोक्त विधिसे मन्त्रदीक्षाका आचरण करना चाहिये। दीक्षा लेकर अपने वर्णके अनुरूप सदाचारमें तत्पर रहकर नित्य-नैमित्तिक कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये। अपने वर्ण तथा आश्रम-सम्बन्धी आचारोंका मनसे भी लङ्घन न करे। जो मानव जिस आश्रममें दीक्षित होकर दीक्षा ले, वह उसीमें रहे और उसीके धर्मोंका निरन्तर पालन करे। इस प्रकार किये हुए कर्म भी बन्धनकारक नहीं होते। मन्त्रानुष्ठानजनित एक ही कर्म फलदायक होता है। दीक्षित पुरुष जिन-जिन लोकोंके भोगोंकी इच्छा करता है, मन्त्राराधनकी सामर्थ्यसे वह उन सबका उपभोग करके मोक्ष प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य दीक्षा ग्रहण करके नित्य और नैमित्तिक कर्मोंका पालन नहीं करता, उसे कुछ कालतक पिशाचयोनिमें रहना पड़ता है। अतः दीक्षित पुरुष नित्य-नैमित्तिक आदि कर्म अवश्य करे। नित्य-नैमित्तिक आचारका पालन करनेवाले मनुष्यको उसकी दीक्षामें त्रुटि न आनेके कारण तत्काल मोक्ष प्राप्त होता है। दीक्षाके द्वारा गुरुके स्वरूपमें स्थित होकर भगवान् शिव सबपर अनुग्रह करते हैं। जो लोक-परलोकके स्वार्थमें आसक्त होकर कृत्रिम गुरुभक्तिका प्रदर्शन करता है, वह सब कुछ करनेपर भी विफलताको ही प्राप्त होता है और उसे पग-पगपर प्रायश्चित्तका भागी होना पड़ता है। जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा गुरुभक्तिमें तत्पर है, उसे प्रायश्चित्त नहीं प्राप्त होता और पग-पगपर सिद्धि लाभ होता है। यदि शिष्य गुरुभक्तिसे सम्पन्न और सर्वस्व समर्पण करनेवाला हो तो उसके प्रति मिथ्या मन्त्रका प्रयोग करनेवाला गुरु प्रायश्चित्तका भागी होता है*। (पूर्व० ६३ अध्याय)


* इस 'तृतीय पाद' में अधिकांश सकाम अनुष्ठानोंका प्रसङ्ग है। इसमें देवताओंके तथा भगवान्‌के विभिन्न स्वरूपोंके ध्यान-पूजनका निरूपण है तथा आराधनाकी सुन्दर-सुन्दर विधियाँ बतलायी गयी हैं। उन विधियोंके अनुसार श्रद्धा-विश्वासपूर्वक अनुष्ठान करनेसे उल्लिखित फल अवश्य मिलता है। जैसे विविध तापोंकी निवृत्ति तथा इष्ट पदार्थोंकी प्राप्तिके लिये अन्यान्य आधिभौतिक साधन हैं, वैसे ही ये आधिदैविक साधन भी हैं एवं ये भौतिक साधनोंकी अपेक्षा अधिक निर्दोष तथा सहज हैं और प्रतिबन्धकका नाश करके नवीन प्रारब्धके निर्माणमें हेतु होनेके कारण ये उनकी अपेक्षा अधिक लाभप्रद हैं ही। और स्वयं भगवान्‌का तो सकाम आराधन करनेपर (यदि वे उचित समझें तो कामनाकी पूर्ति करके अथवा पूर्ति न करके भी) अन्तःकरणकी शुद्धिद्वारा अन्तमें अपनी प्राप्ति करा देते हैं, इस दृष्टिसे इस प्रसङ्गकी निश्चय ही बड़ी उपादेयता है।

  • पूर्वभाग-तृतीय पाद * | ४२९ ---|---

मन्त्रके सम्बन्धमें अनेक ज्ञातव्य बातें, मन्त्रके विविध दोष तथा उत्तम आचार्य एवं शिष्यके लक्षण

सनत्कुमारजी कहते हैं—अब मैं जीवोंके पाश-समुदायका उच्छेद करनेके लिये अभीष्ट सिद्धि प्रदान करनेवाली दीक्षा-विधिका वर्णन करूँगा, जो मन्त्रोंको शक्ति प्रदान करनेवाली है। दीक्षा दिव्यभावको देती है और पापोंका क्षय करती है। इसीलिये सम्पूर्ण आगमोंके विद्वानोंने उसे दीक्षा कहा है। मननका अर्थ है सर्वज्ञता और त्राणका अर्थ है संसारी जीवपर अनुग्रह करना। इस मनन और त्राणधर्मसे युक्त होनेके कारण मन्त्रका मन्त्र नाम सार्थक होता है।## मन्त्रोंके लिंगभेद<br>मन्त्र तीन प्रकारके होते हैं—स्त्री, पुरुष और नपुंसक। स्त्री-मन्त्र वे हैं जिनके अन्तमें दो 'ठ' अर्थात् 'स्वाहा' लगे हों। जिनके अन्तमें 'हुम्' और 'फट्' हैं वे पुरुष-मन्त्र कहे गये हैं। जिनके अन्तमें 'नमः' लगा होता है, वे मन्त्र नपुंसक हैं। इस प्रकार मन्त्रोंकी जातियाँ बतायी गयी हैं। सभी मन्त्रोंके देवता पुरुष हैं और सभी विद्याओंकी स्त्री देवता मानी गयी है। वे त्रिविध मन्त्र छः कर्मोंमें* प्रयुक्त होते हैं। जिसमें प्रणवान्त रेफ

तथापि अल्पायु मनुष्यके लिये यह विचारणीय है कि अपने जीवनको क्या सांसारिक भोगपदार्थोंकी प्राप्तिके प्रयत्न और उनके उपभोगमें लगाना ही इष्ट है? मनुष्य-जीवन क्षणभंगुर है और वह है केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही। संसारके भोग तो प्रत्येक योनिमें ही प्रारब्धानुसार प्राप्त होते हैं और उनका उपभोग भी जीव करता ही है। मनुष्य-जीवन भी यदि उन्हीं क्षणभंगुर, नाशवान्, दुःखयोनि और जीवको जन्म-मरणके चक्रमें डालनेवाले भोगपदार्थोंके लिये सकाम उपासनामें ही लगा दिया जाय तो यह बुद्धिमानीका कार्य नहीं है। जो कृपामय भगवान् परम दुर्लभ मोक्षको या स्वयं अपने-आपको देनेके लिये प्रस्तुत हैं, उनसे दुःखपरिणामी और अनित्य भोग माँगना भगवान्‌के तत्त्वको और भक्तिके महत्त्वको न समझना ही है। जो पुरुष किसी वस्तुको प्राप्त करनेकी इच्छासे भगवान्‌को भजता है, उसका ध्येय वह वस्तु है, भगवान् नहीं है। वह वस्तु साध्य है और भगवान् तथा उनकी भक्ति साधन है। यदि किसी मङ्गलकारी कारणवश ही उसके अभीष्टकी प्राप्तिमें देर होगी तो वह भगवान्‌की भक्तिको छोड़ दे सकता है। अतएव सकाम भावसे की हुई उपासना एक प्रकारसे काम्य वस्तुकी ही उपासना है, भगवान्‌की नहीं। इस बातको भलीभाँति समझ लेना चाहिये और अपनी रुचिके अनुसार भगवान्‌की उपासना इस प्रसङ्गमें आयी हुई पद्धतिके अनुकूल अवश्य करनी चाहिये, पर वह करनी चाहिये—निष्काम प्रेमभावसे केवल भगवान्‌की प्रसन्नताके लिये ही। इसीमें मनुष्य-जन्मकी सार्थकता है।

इसके अतिरिक्त यह बात भी है कि सकाम अनुष्ठानका फल प्रतिबन्धककी प्रबलता और सरलताके अनुसार विलम्बसे या शीघ्र होता है। एक आदमीको किसी अमुक वस्तुकी या स्थितिकी आवश्यकता है। वह उसके लिये सकाम उपासना करता है। यदि उस वस्तु या स्थितिकी प्राप्तिमें बाधक पूर्वजन्मका कर्म बहुत अधिक प्रबल होता है तो एक ही अनुष्ठानसे अभीष्ट फल नहीं मिलता। बार-बार अनुष्ठान करने पड़ते हैं। आजकलके सकामी पुरुषमें इतना धैर्य नहीं हो सकता और फलतः वह देवतामें ही अविश्वास कर बैठता है तथा उसकी अवज्ञा करने लगता है, इससे लाभके बदले उसकी उलटी हानि हो जाती है। फिर सकाम साधना वही सफल होती है जिसमें विधिका पूरा-पूरा साङ्गोपाङ्ग पालन हुआ हो तथा कर्म, देवता और फलमें पूर्ण श्रद्धा हो। विधि और श्रद्धाके अभावमें भी फल नहीं होता और आजके युगके मनुष्योंमें अधिकांश ऐसे हैं जो मनमाना फल तो तुरंत चाहते हैं, पर श्रद्धा और विधिकी आवश्यकता नहीं समझते। अतः उनको भी उक्त फल नहीं मिलता। इन सब दृष्टियोंसे भी सकामभावमें देवतामें, देवाराधनमें अश्रद्धासक्त होनेकी सम्भावना रहती है, फिर यदि कहीं कुछ फल मिलता भी है तो वह अनित्य, क्षणभंगुर और दुःख देनेवाला ही होता है। अतएव बुद्धिमान् पुरुषको सकाम भावका सर्वथा त्याग ही करना चाहिये। —सम्पादक


*शान्ति, वश्य, स्तम्भन, द्वेष, उच्चाटन और मारण—ये छः कर्म हैं। (मन्त्रमहोदधि)

४३० * संक्षिप्त नारदपुराण *


(रां) और स्वाहाका प्रयोग हो, वे मन्त्र आग्नेय (अग्निसम्बन्धी) कहे गये हैं। मुने! जो मन्त्र भृगुबीज (सं) और पीयूष-बीज (वं)-से युक्त हैं, वे सौम्य (सोमसम्बन्धी) कहे गये हैं। इस प्रकार मनीषी पुरुषोंको सभी मन्त्र अग्नीषोमात्मक जानने चाहिये। जब श्वास पिङ्गला नाड़ीमें स्थित हो अर्थात् दाहिनी साँस चलती हो तो आग्नेय मन्त्र जाग्रत् होते हैं और जब श्वास इडा नाड़ीमें स्थित हो अर्थात् बायीं साँस चलती हो तो सोम-सम्बन्धी मन्त्र जागरूक होते हैं। जब इडा और पिङ्गला दोनों नाड़ियोंमें साँस चलती हो अर्थात् बायाँ और दाहिना दोनों स्वर समानभावसे चलते हों तो सभी मन्त्र जाग्रत् होते हैं। यदि मन्त्रके सोते समय उसका जप किया जाय तो वह अनर्थरूप फल देनेवाला है। प्रत्येक मन्त्रका उच्चारण करते समय उनका श्वास रोककर उच्चारण न करे। अनुलोमक्रममें बिन्दु (अनुस्वार)-युक्त और विलोमक्रममें विसर्गसंयुक्त मन्त्रोंका उच्चारण करे। यदि जपा हुआ मन्त्र देवताको जाग्रत् कर सका तो वह शीघ्र सिद्धि देनेवाला होता है और उस मालासे जपा हुआ दुष्ट मन्त्र भी सिद्ध होता है। क्रूर कर्ममें आग्नेय मन्त्रका उपयोग होता है और सोमसम्बन्धी मन्त्र सौम्य फल देनेवाले होते हैं। शान्त, ज्ञान और अत्यन्त रौद्र—ये मन्त्रोंकी तीन जातियाँ हैं। शान्तिजातिसमन्वित शान्त मन्त्र भी 'हुं फट्' यह पल्लव जोड़नेसे रौद्र भाव धारण कर लेता है।

मन्त्रोंके दोष

छिन्नता आदि दोषोंसे युक्त मन्त्र साधककी रक्षा नहीं कर पाते। छिन्न, रुद्ध, शक्तिहीन, पराङ्मुख, कर्णहीन, नेत्रहीन, कीलित, स्तम्भित, दग्ध, त्रस्त, भीत, मलिन, तिरस्कृत, भेदित, सुषुप्त, मदोन्मत्त, मूर्च्छित, हतवीर्य, भ्रान्त, प्रध्वस्त, बालक, कुमार, युवा, प्रौढ़, वृद्ध, निस्त्रिंशक, निर्बीज, सिद्धिहीन, मन्द, कूट, निरंशक, सत्त्वहीन, केकर, बीजहीन, धूमित, आलिङ्गित, मोहित, क्षुधार्त्त, अतिदीप्त, अङ्गहीन, अतिक्रुद्ध, अतिक्रूर, व्रीडित (लज्जित), प्रशान्तमानस, स्थानभ्रष्ट, विकल, अतिवृद्ध, अतिनिःस्नेह तथा पीड़ित—ये (४९) मन्त्रके दोष बताये गये हैं। अब मैं इनके लक्षण बतलाता हूँ। जिस मन्त्रके आदि, मध्य और अन्तमें संयुक्त, वियुक्त या स्वरसहित तीन-चार अथवा पाँच बार अग्निबीज (रं)-का प्रयोग हो, वह मन्त्र 'छिन्न' कहलाता है। जिसके आदि, मध्य और अन्तमें दो बार भूमिबीज (लं)-का उच्चारण होता हो उस मन्त्रको 'रुद्ध' जानना चाहिये। वह बड़े क्लेशसे सिद्धिदायक होता है। प्रणव और कवच (हुं) ये तीन बार जिस मन्त्रमें आये हों वह लक्ष्मीयुक्त होता है। ऐसी लक्ष्मीसे हीन जो मन्त्र है उसे 'शक्तिहीन' जानना चाहिये। वह दीर्घकालके बाद फल देता है। जहाँ आदिमें कामबीज, (क्लीं), मध्यमें मायाबीज (ह्रीं) और अन्तमें अंकुश बीज (क्रों) हो, वह मन्त्र 'पराङ्मुख' जानना चाहिये। वह साधकोंको चिरकालमें सिद्धि देनेवाला होता है। यदि आदि, मध्य और अन्तमें सकार देखा जाय, तो वह मन्त्र 'बधिर' (कर्णहीन) कहा गया है। वह बहुत कष्ट उठानेपर थोड़ा फल देनेवाला है। यदि पञ्चाक्षर-मन्त्र हो, किंतु उसमें रेफ, मकार और अनुस्वार न हो तो उसे 'नेत्रहीन' जानना चाहिये। वह क्लेश उठानेपर भी सिद्धिदायक नहीं होता। आदि, मध्य और अन्तमें हंस (सं), प्रासाद तथा वाग्बीज (ऐं) हो अथवा हंस और चन्द्रबिन्दु या सकार, फकार अथवा हुं हो तथा जिसमें मा, प्रा और नमामि पद न हो वह मन्त्र 'कीलित' माना गया है। इसी प्रकार मध्यमें और अन्तमें भी वे दोनों पद न हों तथा जिसमें फट् और लकार न हों, वह मन्त्र 'स्तम्भित' माना गया है, जो सिद्धिमें रुकावट डालनेवाला है। जिस मन्त्रके अन्तमें अग्नि (रं) बीज वायु (य) बीजके साथ हो तथा जो सात अक्षरोंसे

पूर्वभाग-तृतीय पाद

पूर्वभाग-तृतीय पाद ४३१


युक्त* दिखायी देता हो वह 'दग्ध' संज्ञक मन्त्र है। जिसमें दो, तीन, छः या आठ अक्षरोंके साथ अस्त्र (फट्) दिखायी दे, उस मन्त्रको 'त्रस्त' जानना चाहिये। जिसके मुखभागमें प्रणवरहित हकार अथवा शक्ति हो, वही मन्त्र 'भीत' कहा गया है। जिसके आदि, मध्य और अन्तमें चार 'म' हों, वह मन्त्र 'मलिन' माना गया है। वह अत्यन्त क्लेशसे सिद्धिदायक होता है। जिस मन्त्रके मध्यभागमें द अक्षर और अन्तमें दो क्रोध (हुं हुं) बीज हों और उनके साथ अस्त्र (फट्) भी हो, तो वह मन्त्र 'तिरस्कृत' कहा गया है। जिसके अन्तमें 'म' और 'य' तथा 'हृदय' हो और मध्यमें वषट् एवं वौषट् हो वह मन्त्र 'भेदित' कहा गया है। उसे त्याग देना चाहिये; क्योंकि वह बड़े क्लेशसे फल देनेवाला होता है। जो तीन अक्षरसे युक्त तथा हंसहीन है, उस मन्त्रको 'सुषुप्त' कहा गया है। जो विद्या अथवा मन्त्र सतरह अक्षरोंसे युक्त हो तथा जिसके आदिमें पाँच बार फट्का प्रयोग हुआ हो उसे 'मदोन्मत्त' माना गया है। जिसके मध्य भागमें फट्का प्रयोग हो उस मन्त्रको 'मूर्च्छित' कहा गया है। जिसके विरामस्थानमें अस्त्र (फट्)-का प्रयोग हो वह 'हतवीर्य' कहा जाता है। मन्त्रके आदि, मध्य और अन्तमें चार अस्त्र (फट्)-का प्रयोग हो तो उसे 'भ्रान्त' जानना चाहिये। जो मन्त्र अठारह अथवा बीस अक्षरवाला होकर कामबीज (क्लीं)-से युक्त होकर साथ ही उसमें हृदय, लेख और अंकुशके भी बीज हों तो उसे 'प्रध्वस्त' कहा गया है। सात अक्षरवाला मन्त्र 'बालक', आठ अक्षरवाला 'कुमार', सोलह अक्षरोंवाला 'युवा', चौबीस अक्षरोंवाला 'प्रौढ' तथा बीस, चौसठ, सौ और चार सौ अक्षरोंका मन्त्र 'वृद्ध' कहा गया है। प्रणवसहित नवार्ण-मन्त्रको 'निस्त्रिंश' कहते हैं। जिसके अन्तमें हृदय (नमः) कहा गया हो, मध्यमें शिरोमन्त्र (स्वाहा)-का उच्चारण होता हो और अन्तमें शिखा (वषट्), वर्म (हुं), नेत्र (वौषट्) और अस्त्र (फट्) देखे जाते हों तथा जो शिव एवं शक्ति अक्षरोंसे हीन हो, उस मन्त्रको 'निर्बीज' माना गया है। जिसके आदि, मध्य और अन्तमें छः बार फट्का प्रयोग देखा जाता हो, वह मन्त्र 'सिद्धिहीन' होता है। पाँच अक्षरके मन्त्रको 'मन्द' और एकाक्षर मन्त्रको 'कूट' कहते हैं। उसीको 'निरंशक' भी कहा गया है। दो अक्षरका मन्त्र 'सत्त्वहीन', चार अक्षरका मन्त्र 'केकर' और छः या साढ़े सात अक्षरका मन्त्र 'बीजहीन' कहा गया है। साढ़े बारह अक्षरके मन्त्रको 'धूमित' माना गया है। वह निन्दित है। साढ़े तीन बीजसे युक्त बीस, तीस तथा इक्कीस अक्षरका मन्त्र 'आलिङ्गित' कहा गया है। जिसमें दन्तस्थानीय अक्षर हों वह मन्त्र 'मोहित' बताया गया है। चौबीस या सत्ताईस अक्षरके मन्त्रको 'क्षुधार्त्त' जानना चाहिये। वह मन्त्र सिद्धिसे रहित होता है। ग्यारह, पच्चीस, अथवा तेईस अक्षरका मन्त्र 'तृप्त' कहलाता है। छब्बीस, छत्तीस तथा उनतीस अक्षरके मन्त्रको 'हीनाङ्ग' माना गया है। अट्ठाईस और इकतीस अक्षरका मन्त्र 'अत्यन्त क्रूर' (और 'अतिक्रुद्ध') जानना चाहिये, वह सम्पूर्ण कर्मोंमें निन्दित माना गया है। चालीस अक्षरसे लेकर तिरसठ अक्षरोंतकका जो मन्त्र है, उसे 'व्रीडित' (लज्जित) समझना चाहिये। वह सब कार्योंकी सिद्धिमें समर्थ नहीं होता। पैंसठ अक्षरके मन्त्रोंको 'शान्तमानस' जानना चाहिये। मुनीश्वर ! पैंसठ अक्षरोंसे लेकर निन्यानबे अक्षरोंतकके जो मन्त्र हैं, उन्हें 'स्थानभ्रष्ट' जानना चाहिये। तेरह या पंद्रह अक्षरोंके जो मन्त्र हैं, उन्हें सर्वतन्त्र-विशारद विद्वानोंने 'विकल' कहा है। सौ, डेढ़ सौ, दो सौ, दो सौ इक्यानबे अथवा तीन सौ अक्षरोंके जो मन्त्र होते हैं, वे 'निःस्नेह' कहे गये हैं। ब्रह्मन् !


* 'ससार्णः' पाठ माननेपर यह अर्थ होगा—'जो 'स' अक्षरसे युक्त हो।'

४३२ * संक्षिप्त नारदपुराण *


चार सौसे लेकर एक हजार अक्षरतकके मन्त्र प्रयोगमें 'अत्यन्त वृद्ध' माने गये हैं। उन्हें शिथिल कहा गया है। जिनमें एक हजारसे भी अधिक अक्षर हों, उन मन्त्रोंको 'पीडित' बताया गया है। उनसे अधिक अक्षरवाले मन्त्रोंको स्तोत्ररूप माना गया है। इस प्रकारके मन्त्र दोषयुक्त कहे गये हैं।

अब मैं 'छिन्न' आदि दोषोंसे दूषित मन्त्रोंका साधन बताता हूँ। जो योनिमुद्रासनसे बैठकर एकाग्रचित्त हो जिस किसी भी मन्त्रका जप करता है, उसे सब प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। बायें पैरकी एड़ीको गुदाके सहारे रखकर दाहिने पैरकी एड़ीको ध्वज (लिङ्ग)-के ऊपर रखे तो इस प्रकार योनिमुद्राबन्ध नामक उत्तम आसन होता है।

आचार्य और शिष्यके लक्षण

जो कुलपरम्पराके क्रमसे प्राप्त हुआ हो, नित्य मन्त्र-जपके अनुष्ठानमें तत्पर हो, गुरुकी आज्ञाके पालनमें अनुरक्त हो तथा अभिषेकयुक्त हो; शान्त, कुलीन और जितेन्द्रिय हो, मन्त्र और तन्त्रके तात्त्विक अर्थका ज्ञाता तथा निग्रहानुग्रहमें समर्थ हो; किसीसे किसी वस्तुकी अपेक्षा न रखता हो, मननशील, इन्द्रियसंयमी, हितवचन बोलनेवाला, विद्वान्, तत्त्व निकालनेमें चतुर, विनयी हो; किसी-न-किसी आश्रमकी मर्यादामें स्थित, ध्यानपरायण, संशय-निवारण करनेवाला, परम बुद्धिमान् और नित्य सत्कर्मोंके अनुष्ठानमें संलग्न रहनेवाला हो, उसे ही 'आचार्य' कहा गया है। जो शान्त, विनयशील, शुद्धात्मा, सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे युक्त, शम आदि साधनोंसे सम्पन्न, श्रद्धालु, सुस्थिर विचार या हृदयवाला, खान-पानमें शारीरिक शुद्धिसे युक्त, धार्मिक, शुद्धचित्त, सुदृढ़ व्रत एवं सुस्थिर आचारसे युक्त, कृतज्ञ एवं पापसे डरनेवाला हो, गुरुकी सेवामें जिसका मन लगता हो, ऐसे शील-स्वभावका पुरुष आदर्श शिष्य हो सकता है; अन्यथा वह गुरुको दुःख देनेवाला होता है। (पूर्व० ६४ अध्याय)


मन्त्रशोधन, दीक्षाविधि, पञ्चदेवपूजा तथा जपपूर्वक इष्टदेव और आत्मचिन्तनका विधान

सनत्कुमारजी कहते हैं—गुरुको चाहिये कि वह शिष्यकी परीक्षा लेकर मन्त्रका शोधन करे। पूर्वसे पश्चिम और दक्षिणसे उत्तर (रंगमें डुबोये हुए) पाँच-पाँच सूत गिरावे (तात्पर्य यह है कि पाँच खड़ी रेखाएँ खींचकर उनके ऊपर पाँच पड़ी रेखाएँ खींचे)। इस प्रकार चार-चार कोष्ठोंके चार समुदाय बनेंगे। उनमेंसे पहले चौकेके प्रथम कोष्ठमें एक, दूसरेके प्रथममें दो, तीसरेके प्रथममें तीन और चौथेके प्रथममें चार लिखे। (इसी क्रमसे आगेकी संख्याएँ भी लिख ले।) प्रथम कोष्ठमें 'अ' लिखकर उसके आग्नेय कोणमें उससे पाँचवाँ अक्षर लिखे। इस प्रकार सभी कोष्ठोंमें क्रमशः अक्षरोंको लिखकर बुद्धिमान् पुरुष मन्त्रका संशोधन करे। साधकके नामका आदि-अक्षर जिस कोष्ठमें हो, वहाँसे लेकर जहाँ मन्त्रका आदि अक्षर हो उस कोष्ठतक प्रदक्षिणक्रमसे गिनना चाहिये। यदि उसी चौकमें मन्त्रका आदि अक्षर हो, जिसमें नामका आदि-अक्षर है तो वह 'सिद्ध चौक' कहा जायगा। उससे प्रदक्षिणक्रमसे गिननेपर यदि द्वितीय चौकमें मन्त्रका आदि अक्षर हो तो वह 'साध्य' कहा गया है। इसी प्रकार तीसरा चौक 'सुसिद्ध' और चौथा चौक 'अरि' नामसे प्रसिद्ध है। यदि साधकके नामसम्बन्धी और मन्त्रसम्बन्धी आदि अक्षर प्रथम चौकके पहले ही कोष्ठमें पड़े हों तो वह मन्त्र 'सिद्धसिद्ध' माना गया है। यदि मन्त्रवर्ण प्रथम चौकके द्वितीय कोष्ठमें पड़ा हो तो वह 'सिद्धसाध्य' कहा गया है। प्रथमके तृतीय कोष्ठमें हो तो 'सिद्धसुसिद्ध' होगा और चौथेमें हो

पूर्वभाग-तृतीय पाद ४३३

  • पूर्वभाग-तृतीय पाद * ४३३

तो 'सिद्धारि' कहलायेगा। नामाक्षरयुक्त चौकसे दूसरे चौकमें यदि मन्त्रका अक्षर हो, तो पहले जहाँ नामका अक्षर था वहाँके उस कोष्ठसे आरम्भ करके क्रमशः पूर्ववत् गणना करे। द्वितीय चौकके प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ कोष्ठमें मन्त्राक्षर होनेपर उसकी क्रमशः 'साध्यसिद्ध', 'साध्यसाध्य', 'साध्यसुसिध्य' तथा 'साध्य-अरि' संज्ञा होगी। तीसरे चौकमें मन्त्रका अक्षर हो तो मनीषी पुरुषोंको पूर्वोक्त रीतिसे गणना करनी चाहिये। तृतीय चौकके प्रथम आदि कोष्ठोंके अनुसार क्रमशः उस मन्त्रकी 'सुसिद्धसिद्ध', 'सुसिद्ध-साध्य', 'सुसिद्धसुसिद्ध' तथा 'सुसिद्ध-अरि' संज्ञा होगी। यदि चौथे चौकमें मन्त्राक्षर हो तो भी विद्वान् पुरुष इसी प्रकार गणना करे। चतुर्थ चौकके प्रथम आदि कोष्ठोंके अनुसार उस यन्त्रकी 'अरिसिद्ध', 'अरिसाध्य', 'अरिसुसिद्ध' तथा 'अरि-अरि' यह संज्ञा होगी। सिद्धसिद्ध मन्त्र शास्त्रोक्त विधिसे उतनी ही संख्यामें जप करनेपर सिद्ध हो जायगा। परंतु सिद्धसाध्य मन्त्र दूनी संख्यामें जप करनेसे सिद्ध होगा। सिद्धसुसिद्ध मन्त्र शास्त्रोक्त संख्यासे आधा जप करनेपर ही सिद्ध हो जायगा। परंतु सिद्धारि मन्त्र कुटुम्बीजनोंका नाश करता है। साध्यसिद्ध मन्त्र दूनी संख्यामें जप करनेसे सिद्ध होता है। साध्यसाध्य मन्त्र बहुत विलम्बसे सिद्ध होता है। साध्यसुसिद्ध भी द्विगुण जपसे सिद्ध होता है; किंतु साध्यारि मन्त्र बन्धु-बान्धवोंका हनन करता है। सुसिद्धसिद्ध आधे ही जपसे सिद्ध हो जाता है। सुसिद्धसाध्य द्विगुण जपसे सिद्ध होता है। सुसिद्धसिद्ध मन्त्र प्राप्त होते ही सिद्ध हो जाता है और सुसिद्धारि मन्त्र सारे कुटुम्बका नाश करता है। अरिसिद्ध पुत्रनाशक है तथा अरिसाध्य कन्याका नाश करनेवाला होता है। अरिसुसिद्ध स्त्रीका नाश करता है और अरि-अरि मन्त्र साधकका ही नाश करनेवाला माना गया है। मुने! यहाँ मन्त्रशोधनके और भी बहुत-से प्रकार हैं, किंतु यह अकथह नामक चक्र सबमें प्रधान है; इसलिये यही तुम्हें बताया गया है*।

इस प्रकार मन्त्रका भलीभाँति शोधन करके शुद्ध समय और पवित्र स्थानमें गुरु शिष्यको दीक्षा दे। अब दीक्षाका विधान बताया जाता है। प्रातःकाल नित्यकर्म करके पहले गुरुचरणोंकी पादुकाको प्रणाम करे। तत्पश्चात् आदरपूर्वक वस्त्र आदिके द्वारा भक्तिभावसे सद्गुरुकी पूजा


* मूलमें बतायी हुई रीतिसे कोष्ठक बनाकर उनमें अक्षरोंको लिखनेपर प्रथम कोष्ठकमें 'अ क थ ह' अक्षर आते हैं। इन्हींके नामपर इस चक्रको 'अकथह-चक्र' कहते हैं। इसका रेखाचित्र नीचे दिया जाता है—

अकथह-चक्र

<br>अ क<br>थ ह<br><br>ङ प<br><br>ख द<br><br>च फ
<br><br>ड ब<br><br>झ म<br><br>ढ श<br><br>ञ य
<br><br>घ न१०<br><br>ज भ११<br><br>ग ध१२<br><br>छ व
१३<br>अः<br>त स१४<br><br>ठ ल१५<br>अं<br>ण ष१६<br><br>ट र

४३४

  • संक्षिप्त नारदपुराण *

करके उनसे अभीष्ट मन्त्रके लिये प्रार्थना करे। तदनन्तर गुरु संतुष्टचित्त हो स्वस्तिवाचनपूर्वक मण्डल आदि विधान करके शिष्यके साथ पवित्र हो यज्ञमण्डपमें प्रवेश करें। फिर सामान्य अर्घ्य जलसे द्वारका अभिषेक करके अस्त्र-मन्त्रोंसे दिव्य विघ्नोंका निवारण करे; इसके बाद आकाशमें स्थित विघ्नोंका जलसे पूजन करके निराकरण करे। भूमिसम्बन्धी विघ्नोंको तीन बार ताली बजाकर हटावे, तत्पश्चात् कार्य प्रारम्भ करे। भिन्न-भिन्न रंगोंद्वारा शास्त्रोक्तविधिसे सर्वतोभद्र-मण्डलकी रचना करके उसमें वह्निमण्डल और उसकी कलाओंका पूजन करे। तत्पश्चात् अस्त्र-मन्त्रका उच्चारण करके धोये हुए यथाशक्तिनिर्मित कलशकी वहाँ विधिपूर्वक स्थापना करके सूर्यकी कलाका यजन करे। विलोममातृकाके मूलका उच्चारण करते हुए शुद्ध जलसे कलशको भरे और उसके भीतर सोमकी कलाओंका विधिपूर्वक पूजन करे। धूम्रा, अर्चि, ऊष्मा, ज्वलिनी, ज्वालिनी, विस्फुलिङ्गिनी, सुश्री, सुरूपा, कपिला तथा हव्य-कव्यवाहा—ये अग्निकी दस कलाएँ कही गयी हैं। अब सूर्यकी बारह कलाएँ बतायी जाती हैं—तपिनी, तापिनी, धूम्रा, मरीचि ज्वालिनी, रुचि, सुषम्णा, भोगदा, विश्वा, बोधिनी, धारिणी तथा क्षमा। चन्द्रमाकी कलाओंके नाम इस प्रकार जानने चाहिये—अमृता, मानदा, पूषा, तुष्टि, पुष्टि, रति, धृति, शशिनी, चन्द्रिका, कान्ति, ज्योत्स्ना, श्री, प्रीति, अङ्गदा, पूर्णा और पूर्णामृता—ये सोलह चन्द्रमाकी कलाएँ कही गयी हैं।

कलशको दो वस्त्रोंसे लपेट करके उसके भीतर सर्वौषधि डाले। फिर नौ रत्न छोड़कर पञ्चपल्लव डाले। कटहल, आम, बड़, पीपल और वकुल—इन पाँच वृक्षोंके पल्लवोंको यहाँ पञ्चपल्लव माना गया है। मोती, माणिक्य, वैदूर्य, गोमेद, वज्र, विद्रुम (मूँगा), पद्मराग, मरकत तथा नीलमणि— इन नौ रत्नोंको क्रमशः कलशमें छोड़कर उसमें इष्ट देवताका आवाहन करे और मन्त्रवेत्ता आचार्य विधिपूर्वक देवपूजाका कार्य सम्पन्न करके वस्त्राभूषणोंसे विभूषित शिष्यको वेदीपर बिठावे और प्रोक्षणीके जलसे उसका अभिषेक करे। फिर उसके शरीरमें विधिपूर्वक भूतशुद्धि आदि करके न्यासोंके द्वारा शरीरशुद्धि करे और मस्तकमें पल्लव मन्त्रोंका न्यास करके एक सौ आठ मूलमन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित जलसे प्रिय शिष्यका अभिषेक करे। उस समय मन-ही-मन मूलमन्त्रका जप करते रहना चाहिये। अवशिष्ट जलसे आचमन करके शिष्य दूसरा वस्त्र धारण करे और गुरुको विधिपूर्वक प्रणाम करके पवित्र हो उनके सामने बैठे। तदनन्तर गुरु शिष्यके मस्तकपर हाथ देकर जिस मन्त्रकी दीक्षा देनी हो, उसका विधिपूर्वक एक सौ आठ बार जप करे। 'समः अस्तु' (शिष्य मेरे समान हो) इस भावसे शिष्यको अक्षर-दान करे। तब शिष्य गुरुकी पूजा करे। इसके बाद गुरु शिष्यके मस्तकपर चन्दनयुक्त हाथ रखकर एकाग्रचित्त हो, उसके कानमें आठ बार मन्त्र कहे। इस प्रकार मन्त्रका उपदेश पाकर शिष्य भी गुरुके चरणोंमें गिर जाय। उस समय गुरु इस प्रकार कहे, 'बेटा! उठो। तुम बन्धनमुक्त हो गये। विधिपूर्वक सदाचारी बनो। तुम्हें सदा कीर्ति, श्री, कान्ति, पुत्र, आयु, बल और आरोग्य प्राप्त हो।' तब शिष्य उठकर गन्ध आदिके द्वारा गुरुकी पूजा करे और उनके लिये दक्षिणा दे। इस प्रकार गुरुमन्त्र पाकर शिष्य उसी समयसे गुरुसेवामें लग जाय। बीचमें अपने इष्टदेवका पूजन करे और उन्हें पुष्पाञ्जलि देकर अग्नि, निर्ऋति और वागीशका क्रमशः पूजन करे। जब मध्यमें भगवान् विष्णुका पूजन करे तो उनके चारों ओर क्रमशः गणेश, सूर्य, देवी तथा शिवकी पूजा करे और जब मध्यमें भगवान् शङ्करकी पूजा करे तो उनके पूर्वादि दिशाओंमें क्रमशः सूर्य, गणेश, देवी तथा विष्णुका पूजन

  • पूर्वभाग-तृतीय पाद * | ४३५ ---|---

करे। जब मध्यमें देवीकी पूजा करे तो उनके चारों ओर शिव, गणेश, सूर्य और विष्णुकी पूजा करे। जब मध्यमें गणेशकी पूजा करे तो उनके चारों ओर क्रमशः शिव, देवी, सूर्य और विष्णुकी पूजा करे और जब मध्यभागमें सूर्यकी पूजा करे तो पूर्वाद दिशाओंमें क्रमशः गणेश, विष्णु, देवी और शिवकी पूजा करे। इस प्रकार प्रतिदिन आदरपूर्वक पञ्चदेवोंका पूजन करना चाहिये।

विद्वान् पुरुषको चाहिये कि ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर लघुशंका आदि आवश्यक कार्य कर ले और यदि लघुशंका आदि न लगी हो तो शय्यापर बैठे-बैठे ही अपने गुरुदेवको नमस्कार करे—तदनन्तर पादुकामन्त्रका दस बार जप और समर्पण करके गुरुदेवको पुनः प्रणाम और उनका स्तवन करे।

फिर मूलाधारसे ब्रह्मरन्ध्रतक मूलविद्याका चिन्तन करे। मूलाधारसे निम्नभागमें गोलाकार वायुमण्डल है, उसमें वायुका बीज 'या' कार स्थित है। उस बीजसे वायु प्रवाहित हो रही है। उससे ऊपर अग्निका त्रिकोणमण्डल है। उसमें जो अग्निका बीज 'र' कार है, उससे आग प्रकट हो रही है। उक्त वायु तथा अग्निके साथ मूलाधारमें स्थित शरीरवाली कुलकुण्डलिनीका ध्यान करे, जो सोये हुए सर्पके समान आकारवाली है। वह स्वयं भूलिङ्गको आवेष्टित करके सो रही है। देखनेमें वह कमलकी नालके समान जान पड़ती है। वह अत्यन्त पतली है और उसके अङ्गोंसे करोड़ों विद्युतोंकी-सी प्रभा छिटक रही है। इस प्रकार कुलकुण्डलिनीका ध्यान करके भावनात्मक कूर्च (कूँची)-के द्वारा उसे जगाकर उठाये और सुषुम्णा नाड़ीके मार्गसे क्रमशः छः चक्रोंका भेदन करनेवाली उस कुण्डलिनीको गुरुकी बतायी हुई विधिके अनुसार विद्वान् पुरुष ब्रह्मरन्ध्रतक ले जाय और वहाँके अमृतमें निमग्न करके आत्माका चिन्तन करे। मानो आत्मा उसके प्रभापुञ्जसे व्याप्त है। वह निर्मल, चिन्मय तथा देह आदिसे परे है। फिर उस कुण्डलिनीको अपने स्थानपर पहुँचाकर हृदयमें इष्टदेवका चिन्तन करे और मानसिक उपचारोंसे उनका पूजन करके निम्नाङ्कित मन्त्रसे प्रार्थना करे—

त्रैलोक्यचैतन्यमयादिदेव श्रीनाथ विष्णो भवदाज्ञयैव।
प्रातः समुत्थाय तव प्रियार्थं संसारयात्रामनुवर्तयिष्ये ॥

‘आदिदेव! लक्ष्मीकान्त! विष्णो! त्रिलोकीका चैतन्य आपका स्वरूप है। आपकी आज्ञासे ही प्रातःकाल उठकर आपका प्रिय कार्य करनेके लिये मैं संसारयात्राका अनुसरण करूँगा।'

ब्रह्मन्! यदि इष्टदेव कोई दूसरा देवता हो तो पूर्वोक्त मन्त्रमें 'विष्णो' आदिके स्थानमें ऊहाद्वारा उसके वाचक शब्द या नामका प्रयोग कर लेना चाहिये। तत्पश्चात् सम्पूर्ण सिद्धिके लिये अजपा जप निवेदन करे। दिन-रातमें जीव 'इक्कीस हजार छः सौ' बार सदा अजपा नामक गायत्रीका जप करता है। इस अजपा मन्त्रके ऋषि हंस हैं, अव्यक्त गायत्री छन्द कहा गया है। परमहंस देवता हैं। आदि (हं) बीज और अन्त (सः) शक्ति है, तत्पश्चात् षडङ्गन्यास करे। सूर्य, सोम, निरञ्जन, निराभास, धर्म और ज्ञान—ये छः अङ्ग हैं। क्रमशः इनके पूर्वमें 'हंसः' और अन्तमें 'आत्मने' पद जोड़कर श्रेष्ठ साधक इनका छः अङ्गोंमें न्यास करे*। हकार सूर्यके समान तेजस्वी होकर शरीरसे बाहर निकलता है और सकार वैसे ही तेजस्वी रूपसे प्रवेश करता है। इस प्रकार हकार और सकारका ध्यान कहा गया है, इस तरह ध्यान करके बुद्धिमान् पुरुष वह्नि और अर्कमण्डलमें


* हंसः सूर्यात्मने हृदयाय नमः। हंस सोमात्मने शिरसे स्वाहा। हंसो निरञ्जनात्मने शिखायै वषट्। हंसो निराभासात्मने कवचाय हुम्। हंसो धर्मात्मने नेत्राभ्यां वौषट्। हंसो ज्ञानात्मने अस्त्राय फट्।

विभागपूर्वक जप अर्पण करे।

४३६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


विभागपूर्वक जप अर्पण करे।

मूलाधारचक्रमें चार दलका कमल है, जो बन्धूकपुष्पके समान लाल है। उसके चारों दलोंमें क्रमशः 'व श ष स'—ये अक्षर अङ्कित हैं। उसमें अपनी शक्तिके साथ गणेशजी विराजमान हैं। वे अपने चारों हाथोंमें क्रमशः पाश, अंकुश, सुधापात्र तथा मोदक लेकर उल्लसित हैं। ऐसे वाक्पति गणेशजीको छः सौ जप अर्पण करे। स्वाधिष्ठान-चक्रमें छः दलोंका कमल है। वह चक्र मूँगेके समान रंगका है। उसके छः दलोंमें क्रमशः 'ब भ म य र ल' ये अक्षर अङ्कित हैं। उसमें कमलजन्मा ब्रह्माजी हंसारूढ़ होकर विराजमान हैं। उनके वामाङ्ग-भागमें उनकी ब्राह्मीशक्ति सुशोभित हैं। वे विद्याके अधिपति हैं। स्रुवा और अक्षमाला उनके हाथोंकी शोभा बढ़ाती हैं। ऐसे ब्रह्माजीको छः हजार जप निवेदन करे। मणिपूर चक्रमें दशदल कमल विद्यमान है। उसके प्रत्येक दलपर क्रमशः 'ड ढ ण त थ द ध न प फ' ये अक्षर अङ्कित हैं। उसकी प्रभा विद्युद्वल्लिसित मेघके समान है। उसमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण करनेवाले भगवान् विष्णु लक्ष्मीसहित विराजमान हैं। उन्हें छः हजार जप अर्पण करे। अनाहत चक्रमें द्वादशदल कमल विद्यमान है। इसके प्रत्येक दलपर क्रमशः 'क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ' ये अक्षर अङ्कित हैं। उसका वर्ण शुक्ल है। उसमें शूल, अभय, वर और अमृतकलश धारण करनेवाले वृषभारूढ भगवान् रुद्र विराज रहे हैं। उनके वामाङ्ग-भागमें उनकी शक्ति पार्वतीदेवी विद्यमान हैं। वे विद्याके अधिपति हैं। विद्वान् पुरुष उन रुद्रदेवको छः हजार जप निवेदन करे। विशुद्ध चक्र षोडशदल कमलसे युक्त है। उसके प्रत्येक दलपर क्रमशः स्वरवर्ण (अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऐ ओ औ अं अः) अङ्कित हैं। वह चक्र शुक्ल वर्णका है। उसमें महाज्योतिसे प्रकाशित होनेवाले इन्द्रियाधिपति ईश्वर विराजमान हैं, जो प्राणशक्तिसे युक्त हैं। उन्हें एक सहस्र जप अर्पण करे। आज्ञाचक्रमें दो दलोंवाला कमल है, उसके दलोंमें क्रमशः 'ह' और 'क्ष' अङ्कित हैं; उसमें पराशक्तिसे युक्त जगद्गुरु सदाशिव विराजमान हैं; उन्हें एक सहस्र जप अर्पण करे। सहस्रार-चक्रमें सहस्र दलोंसे युक्त महाकमल विद्यमान है, उसमें नाद-बिन्दुसहित समस्त मातृकावर्ण विराजमान हैं। उसमें स्थित वर और अभययुक्त हाथोंवाले परम आदिगुरुको एक सहस्र जप निवेदन करे। फिर चुल्लूमें जल लेकर इस प्रकार कहे— 'स्वभावतः होते रहनेवाले इक्कीस हजार छः सौ अजपा जपका पूर्वोक्तरूपसे विभागपूर्वक संकल्प करनेके कारण मोक्षदाता भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों।' इस अजपा गायत्रीके संकल्पमात्रसे मनुष्य बड़े-बड़े पापोंसे मुक्त हो जाता है। 'मैं ब्रह्म ही हूँ, संसारी जीव नहीं हूँ। नित्यमुक्त हूँ, शोक मेरा स्पर्श नहीं कर सकता। मैं सच्चिदानन्द-स्वरूप हूँ।' इस प्रकार अपने-आपके विषयमें चिन्तन करे। तदनन्तर दैहिक कृत्य और देवार्चन करे। उसका विधान और सदाचारका लक्षण मैं बताऊँगा। (पूर्व० ६५ अध्याय)


शौचाचार, स्नान, संध्या-तर्पण, पूजागृहमें देवताओंका पूजन, केशव-कीर्त्यादि मातृकान्यास, श्रीकण्ठमातृका, गणेशमातृका, कलामातृका आदि न्यासोंका वर्णन

सनत्कुमारजी कहते हैं— तदनन्तर बायीं या दाहिनी जिस ओरकी साँस चलती हो, उसी ओरका बायाँ अथवा दाहिना पैर पृथ्वीपर उतारे और इस प्रकार प्रार्थना करे—

समुद्रमेखले देवि पर्वतस्तनमण्डले।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे॥६६।१-२

  • पूर्वभाग-तृतीय पाद * | ४३७ ---|---

'पृथ्वी देवि! समुद्र तुम्हारी मेखला (कटिबन्ध) और पर्वत स्तनमण्डल हैं। विष्णुपत्नि! तुम्हें नमस्कार है, मैंने जो तुम्हें चरणोंसे स्पर्श किया है, मेरे इस अपराधको क्षमा करो।'

इस प्रकार भूदेवीसे क्षमा-प्रार्थना करके विधिपूर्वक विचरण करे। तदनन्तर गाँवसे नैर्ऋत्य कोणमें जाकर इस मन्त्रका उच्चारण करे—

गच्छन्तु ऋषयो देवाः पिशाचा ये च गुह्यकाः।
पितृभूतगणाः सर्वे करिष्ये मलमोचनम्॥३-४

'यहाँ जो ऋषि, देवता, पिशाच, गुह्यक, पितर तथा भूतगण हों, वे चले जायें, मैं यहाँ मल-त्याग करूँगा।'

ऐसा कहकर तीन बार ताली बजावे और सिरको वस्त्रसे आच्छादित करके मल-त्याग करे। रात हो तो दक्षिणकी ओर मुँह करके बैठे और दिनमें उत्तरकी ओर मुँह करके मलत्याग करे। तत्पश्चात् मिट्टी और जलसे शुद्धि करे। लिङ्गमें एक बार, गुदामें तीन बार, बायें हाथमें दस बार, फिर दोनों हाथोंमें सात बार तथा पैरोंमें तीन बार मिट्टी लगावे। इस प्रकार शौच-सम्पादन करके बारह बार जलसे कुल्ला करे। उसके बाद दाँतुनके लिये निम्नाङ्कित मन्त्रसे वनस्पतिकी प्रार्थना करे—

आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च।
श्रियं प्रज्ञां च मेधां च त्वं नो देहि वनस्पते॥८

'वनस्पते! तुम हमें आयु, बल, यश, तेज, संतान, पशु, धन, लक्ष्मी, प्रज्ञा (ज्ञानशक्ति) तथा मेधा (धारणशक्ति) दो।'

इस प्रकार प्रार्थना करके मन्त्रका साधक बारह अंगुलकी दाँतुन लेकर एकाग्रचित्त हो उससे दाँत और मुखकी शुद्धि करे। तत्पश्चात् नदी आदिमें नहानेके लिये जाय, उस समय देवताके गुणोंका कीर्तन करता रहे। जलाशयमें जाकर उसको नमस्कार करके स्नानोपयोगी वस्तु वस्त्र आदिको तटपर रखकर मूल* (इष्ट) मन्त्रसे अभिमन्त्रित मिट्टी लेकर उसे कटिसे पैरतकके अङ्गोंमें लगावे और फिर जलाशयके जलसे उसे धो डाले। तदनन्तर पाँच बार जलसे पैरोंको धोकर जलके भीतर प्रवेश करे और नाभितकके जलमें पहुँचकर खड़ा हो जाय। उसके बाद जलाशयकी मिट्टी लेकर बायें हाथकी कलाई, हथेली और उसके अग्रभागमें लगावे और अंगुलीसे जलाशयकी मिट्टी लेकर मन्त्रज्ञ विद्वान् अस्त्र (फट्)-के उच्चारणद्वारा उसे अपने ऊपर घुमाकर छोड़ दे। फिर हथेलीकी मिट्टीको छः अङ्गोंमें उनके मन्त्रोंद्वारा लगावे। तदनन्तर डुबकी लगाकर भलीभाँति उन अङ्गोंको धो डाले। यह जल-स्नान बताया गया है। इसके बाद सम्पूर्ण जगत्को अपने इष्टदेवका स्वरूप मानकर आन्तरिक स्नान करे। अनन्त सूर्यके समान तेजस्वी तथा अपने आभूषण और आयुधोंसे सम्पन्न मन्त्रमूर्ति भगवान्‌का चिन्तन करके यह भावना करे कि उनके चरणोदकसे प्रकट हुई दिव्य धारा ब्रह्मरन्ध्रसे मेरे शरीरमें प्रवेश कर रही है। फिर उस धारासे शरीरके भीतरका सारा मल भावनाद्वारा ही धो डाले। ऐसा करनेसे मन्त्रका साधक तत्काल रजोगुणसे रहित हो स्वच्छ स्फटिकके समान शुद्ध हो जाता है। तत्पश्चात् मन्त्रसाधक शास्त्रोक्तविधिसे स्नान करके एकाग्रचित्त हो मन्त्र-स्नान करे। उसका विधान बताया जाता है। पहले देश-कालका नाम लेकर संकल्प करे, फिर प्राणायाम और षडङ्ग-न्यास करके दोनों हाथोंसे मुष्टिकी मुद्रा बनाकर सूर्यमण्डलसे आते हुए तीर्थोंका आवाहन करे—

ब्रह्माण्डोदरतीर्थानि करैः स्पृष्टानि ते रवे।
तेन सत्येन मे देव देहि तीर्थं दिवाकर॥
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धुकावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु॥
(ना० पूर्व० ६६। २५-२७)

'सूर्यदेव! ब्रह्माण्डके भीतर जितने तीर्थ हैं, उन सबका आपकी किरणें स्पर्श करती हैं। दिवाकर!


* अपने इष्टदेवके अभीष्ट मन्त्रको ही यहाँ मूलमन्त्र कहा है।

४३८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

इस सत्यके अनुसार मेरे लिये यहीं सब तीर्थ प्रदान कीजिये। गङ्गे, यमुने, गोदावरि, सरस्वति, नर्मदे, सिन्धु, कावेरि! आप इस जलमें निवास करें।'

इस प्रकार जलमें सब तीर्थोंका आवाहन करके उन्हें सुधाबीज (वं)–से युक्त करे। फिर गोमुद्रासे उनका अमृतीकरण करके उन्हें कवचसे अवगुण्ठित करे। फिर अस्त्रमुद्राद्वारा संरक्षण करके चक्रमुद्राका प्रदर्शन करे। तत्पश्चात् उस जलमें विद्वान् पुरुष अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाके मण्डलोंका चिन्तन करे। फिर सूर्यमन्त्र और अमृतबीजके द्वारा उस जलको अभिमन्त्रित करे। तदनन्तर मूल-मन्त्रसे ग्यारह बार अभिमन्त्रित करके उसके मध्यभागमें पूजा-यन्त्रकी भावना करे और हृदयसे देवताका आवाहन करके स्नान कराकर मानसिक उपचारसे उनकी पूजा करे। इष्टदेव सिंहासनपर विराजमान हैं, इस भावनासे उन्हें नमस्कार करके विद्वान् पुरुष उस जलको प्रणाम करे—

आधारः सर्वभूतानां विष्णोरतुलतेजसः।
तद्रूपाश्च ततो जाता आपस्ताः प्रणमाम्यहम्॥
(३२। ३३)

'जल सम्पूर्ण भूतोंका और अतुल तेजस्वी भगवान् विष्णुका आधार है। अतः वह विष्णुस्वरूप है; इसलिये मैं उसे प्रणाम करता हूँ।'

इस प्रकार नमस्कार करके साधक अपने शरीरके सात छिद्रोंको बंद करके जलमें डुबकी लगावे और उसमें मूलमन्त्रका इष्टदेवके स्वरूपमें ध्यान करे। तीन बार डुबकी लगावे और ऊपर आवे। तत्पश्चात् दोनों हाथोंको घड़ेकी मुद्रामें रखकर उसके द्वारा सिरको सींचे।

फिर श्रीशालग्रामशिलाका जल (भगवच्चरणामृत) पान करे। कभी इसके विरुद्ध आचरण न करे। यह शास्त्रका नियत विधान है। तदनन्तर मन्त्रका साधक अपने इष्टदेवका सूर्यमण्डलमें विसर्जन करके तटपर आवे और यत्नपूर्वक वस्त्र धोकर दो शुद्ध वस्त्र (धोती और अँगोछा) धारण करके विद्वान् पुरुष संध्या आदि करे। रोगादिके कारण स्नानादिमें असमर्थ हो, वह वहाँ जलसे स्नान न करके अघमर्षण करे अथवा अशक्त मनुष्य भस्म या धूलसे स्नान करे। तदनन्तर शुभ आसनपर बैठकर संध्यादि कर्म करे। 'ॐ केशवाय नमः', 'ॐ नारायणाय नमः', 'ॐ माधवाय नमः' इन मन्त्रोंसे तीन बार जलका आचमन करके 'ॐ गोविन्दाय नमः', 'ॐ विष्णवे नमः'—इन मन्त्रोंका उच्चारण करके दोनों हाथ धो ले। फिर 'ॐ मधुसूदनाय नमः', 'ॐ त्रिविक्रमाय नमः' से दोनों ओष्ठोंका मार्जन करे। तत्पश्चात् 'ॐ वामनाय नमः', 'ॐ श्रीधराय नमः' से मुख और दोनों हाथोंका स्पर्श करे। 'ॐ हृषीकेशाय नमः', 'ॐ पद्मनाभाय नमः' से दोनों चरणोंका स्पर्श करे। 'ॐ दामोदराय नमः' से मूर्धा (मस्तक) का, 'ॐ संकर्षणाय नमः' से मुखका, 'ॐ वासुदेवाय नमः', 'ॐ प्रद्युम्नाय नमः' से क्रमशः दायीं-बायीं नासिकाका स्पर्श करे। 'ॐ अनिरुद्धाय नमः', 'ॐ पुरुषोत्तमाय नमः' से पूर्ववत् दोनों नेत्रोंका तथा 'ॐ अधोक्षजाय नमः', 'ॐ नृसिंहाय नमः' से दोनों कानोंका स्पर्श करे। 'ॐ अच्युताय नमः' से नाभिका, 'ॐ जनार्दनाय नमः' से वक्षःस्थलका तथा 'ॐ हरये नमः', 'ॐ विष्णवे नमः' से दोनों कंधोंका स्पर्श करे। यह वैष्णव आचमनकी विधि है। आदिमें प्रणव और अन्तमें चतुर्थीका एकवचन तथा नमः पद जोड़कर पूर्वोक्त केशव आदि नामोंद्वारा मुख आदिका स्पर्श करना चाहिये। मुख और नासिकाका स्पर्श तर्जनी अंगुलिसे करे। नेत्रों तथा कानोंका स्पर्श अनामिकाद्वारा करे तथा नाभिदेशका स्पर्श कनिष्ठा अंगुलिसे करे। अङ्गुष्ठका स्पर्श सभी अङ्गोंमें करना चाहिये। 'स्वाहा' पद अन्तमें जोड़कर चतुर्थ्यन्त आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्वका उच्चारण करके जो आचमन किया जाता है, उसे शैव आचमन कहा गया है। आदिमें क्रमशः दीर्घत्रय, अनुस्वार और ह अर्थात्—हां हीं हूं जोड़कर स्वाहान्त आत्मतत्त्व विद्यातत्त्व

पूर्वभाग-तृतीय पाद

  • पूर्वभाग-तृतीय पाद * ४३१

और शिवतत्त्व शब्दोंके उच्चारणपूर्वक किये हुए आचमनको तो शैव^१ कहते हैं और आदिमें क्रमशः 'ऐं, ह्रीं, श्रीं' इस बीजके साथ स्वाहान्त उक्त नामोंका उच्चारण करके किये हुए आचमनको शाक्त^२ आचमन कहा गया है। ब्रह्मन्! वाग्बीज (ऐं), लज्जाबीज (ह्रीं) और श्रीबीज (श्रीं)-का प्रारम्भमें प्रयोग करनेसे वह आचमन अभीष्ट अर्थको देनेवाला होता है।

तदनन्तर ललाटमें सुन्दर गदाकी-सी आकृतिवाला तिलक लगावे। हृदयमें नन्दक नामक खड्गकी और दोनों बाँहोंपर क्रमशः शङ्ख और चक्रकी आकृति बनावे। उत्तम बुद्धिवाला वैष्णव पुरुष क्रमशः मस्तक, कर्णमूल, पार्श्वभाग, पीठ, नाभि तथा ककुद्में भी शार्ङ्ग नामक धनुष तथा बाणका न्यास करे। इस प्रकार वैष्णव पुरुष तीर्थजनित मृत्तिका (गोपीचन्दन) आदिसे तिलक करे। अथवा शैवजन त्र्यम्बकमन्त्रसे अग्निहोत्रका भस्म लेकर 'अग्निरिति भस्म' इत्यादि मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके तत्पुरुष, अघोर, सद्योजात, वामदेव और ईशान—इन नामोंद्वारा क्रमशः ललाट, कंधे, उदर, भुजा और हृदयमें पाँच जगह त्रिपुण्ड्र लगावे। शक्तिके उपासकको त्रिकोणकी आकृतिका अथवा स्त्रियाँ जैसे बेंदी लगाती हैं, उस तरहका तिलक करना चाहिये। वैदिकी संध्या करनेके बाद मन्त्रका साधक विधिवत् आचमन करके तान्त्रिकी संध्या करे। पूर्ववत् जलमें तीर्थोंका आवाहन कर ले। तत्पश्चात् कुशासे तीन बार पृथ्वीपर जल छिड़के। फिर उसी जलसे सात बार अपने मस्तकपर अभिषेक करे। फिर प्राणायाम और षडङ्गन्यास करके बायें हाथमें जल लेकर उसे दाहिने हाथसे ढक ले। और मन्त्रज्ञ पुरुष आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वीके बीजमन्त्रोंद्वारा^३ उसे अभिमन्त्रित करके तत्त्वमुद्रापूर्वक हाथसे चूते हुए जलविन्दुओंद्वारा मूलमन्त्रसे अपने मस्तकको सात बार सींचे, फिर शेष जलको मन्त्रका साधक बीजाक्षरोंसे अभिमन्त्रित करके नासिकाके समीप ले आवे। उस तेजोमय जलको भावनाद्वारा इडा नाडीसे भीतर खींचकर उसके अन्तरके सारे मलोंको धो डाले, फिर कृष्णवर्णमें परिणत हुए उस जलको पिङ्गला नाड़ीसे बाहर निकाले और अपने आगे वज्रमय प्रस्तरकी कल्पना करके अस्त्रमन्त्र (फट्) का उच्चारण करते हुए उस जलको उसीपर दे मारे। वह सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला अघमर्षण कहा गया है। फिर मन्त्रवेत्ता पुरुष हाथ-पैर धोकर पूर्ववत् आचमन करके खड़ा हो ताँबेके पात्रमें पुष्प-चन्दन आदि डालकर मूलान्त मन्त्रका उच्चारण करते हुए सूर्यमण्डलमें विराजमान इष्टदेवको अर्घ्य दे। इस प्रकार तीन बार अर्घ्य देकर रविमण्डलमें स्थित आराध्यदेवका ध्यान करे। तत्पश्चात् अपने-अपने कल्पमें बतायी हुई गायत्रीका एक सौ आठ या अट्ठाईस बार जप करे। जपके अन्तमें 'गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं' इत्यादि मन्त्रसे वह जप समर्पित करे, तदनन्तर गायत्रीका ध्यान करे।

फिर विधिज्ञ पुरुष देवताओं, ऋषियों तथा अपने पितरोंका तर्पण करके कल्पोक्त पद्धतिसे अपने इष्टदेवका भी तर्पण करे। तत्पश्चात् गुरुपङ्क्तिका तर्पण करके अङ्गों, आयुधों और आवरणोंसहित विनतानन्दन गरुड़का 'साङ्गं सावरणं सायुधं वैनतेयं तर्पयामि' ऐसा कहकर तर्पण करे। इसके बाद नारद, पर्वत, जिष्णु, निशठ, उद्धव, दारुक, विष्वक्सेन तथा शैलेयका वैष्णव पुरुष तर्पण करे। विप्रेन्द्र! इस प्रकार तर्पण करके विवस्वान् सूर्यको अर्घ्य दे पूजाघरमें आकर हाथ-पैर धोकर आचमन


१. हां आत्मतत्त्वाय स्वाहा। हीं विद्यातत्त्वाय स्वाहा। हूं शिवतत्त्वाय स्वाहा। ये शैव आचमन-मन्त्र हैं।
२. ऐं आत्मतत्त्वाय स्वाहा। ह्रीं विद्यातत्त्वाय स्वाहा। श्रीं शिवतत्त्वाय स्वाहा। ये शाक्त आचमन-मन्त्र हैं।
३. हं यं रं वं लं—ये क्रमशः आकाश आदि तत्त्वोंके बीज हैं।

४४०

  • संक्षिप्त नारदपुराण *

करे। फिर अग्निहोत्रमें स्थित गार्हपत्य आदि अग्नियोंकी तृप्तिके लिये हवन करके यत्नपूर्वक उनकी उपासना करके पूजाके स्थानमें आकर द्वारपूजा प्रारम्भ करे। द्वारकी ऊपरी शाखामें गणेशजीकी, दक्षिण भागमें महालक्ष्मीकी, वाम भागमें सरस्वतीकी, दक्षिणमें पुनः विघ्नराज गणेशकी, वाम भागमें क्षेत्रपालकी, दक्षिणमें गङ्गाकी, वाम भागमें यमुनाकी, दक्षिणमें धाताकी, वाम भागमें विधाताकी, दक्षिणमें शङ्खनिधिकी तथा वामभागमें पद्मनिधिकी पूजा करे। तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष तत्तत्कल्पोक्त, द्वारपालोंकी पूजा करे। नन्द, सुनन्द, चण्ड, प्रचण्ड, प्रचल, बल, भद्र तथा सुभद्र ये वैष्णव द्वारपाल हैं। नन्दी, भृङ्गी, रिटि, स्कन्द, गणेश, उमामहेश्वर, नन्दीवृषभ तथा महाकाल—ये शैव द्वारपाल हैं। ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी आदि जो आठ मातृका शक्तियाँ हैं, वे स्वयं ही द्वारपालिका हैं। इन सबके नामके आदि-अक्षरमें अनुस्वार लगाकर उसे नामके पहले बोलना चाहिये। नामके चतुर्थी विभक्त्यन्त रूपके बाद नमः लगाना चाहिये। यथा—'नं नन्दाय नमः' इत्यादि। इन्हीं नाममन्त्रोंसे इन सबकी पूजा करनी चाहिये।

वैष्णव-मातृका-न्यास

इसके बाद बुद्धिमान् पुरुष पवित्र हो मन और इन्द्रियोंके संयमपूर्वक आसनपर बैठकर आचमन करे और यत्नपूर्वक स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा पृथ्वीके विघ्नोंका निवारण करनेके अनन्तर श्रेष्ठ वैष्णव पुरुष केशव-कीर्त्यादि मातृका-न्यास करे। कीर्तिसहित केशव, कान्तिसहित नारायण, तुष्टिके साथ माधव, पुष्टिके साथ गोविन्द, धृतिके साथ विष्णु, शान्तिके साथ मधुसूदन, क्रियाके साथ त्रिविक्रम, दयाके साथ वामन, मेधाके साथ श्रीधर, हर्षके साथ हृषीकेश, पद्मनाभके साथ श्रद्धा, दामोदरके साथ लज्जा, लक्ष्मीसहित वासुदेव, सरस्वतीसहित संकर्षण, प्रीतिके साथ प्रद्युम्न, रतिके साथ अनिरुद्ध, जयाके साथ चक्री, दुर्गाके साथ गदी, प्रभाके साथ शाङ्गी, सत्याके साथ खङ्गी, चण्डाके साथ शङ्खी, वाणीके साथ हली, विलासिनीके साथ मुसली, विजयाके साथ शूली, विरजाके साथ पाशी, विश्वाके साथ अंकुशी, विनदाके साथ मुकुन्द, सुनन्दाके साथ नन्दज, स्मृतिके साथ नन्दी, वृद्धिके साथ नर, समृद्धिके साथ नरकजित्, शुद्धिके साथ हरि, बुद्धिके साथ कृष्ण, भुक्तिके साथ सत्य, मुक्तिके साथ सात्वत, क्षमासहित शौरि, रमासहित सूर, उमासहित जनार्दन (शिव), क्लेदिनीसहित भूधर, क्लिन्नाके साथ विश्वमूर्ति, वसुधाके साथ वैकुण्ठ, वसुदाके साथ पुरुषोत्तम, पराके साथ बली, परायणाके साथ बलानुज, सूक्ष्माके साथ बाल, संध्याके साथ वृषहन्ता, प्रज्ञाके साथ वृष, प्रभाके साथ हंस, निशाके साथ वराह, धाराके साथ विमल तथा विद्युतके साथ नृसिंहका न्यास करे। इस केशवादि मातृका-न्यासके नारायण ऋषि, अमृताद्या गायत्री छन्द और विष्णु देवता हैं। भगवान् विष्णु चक्र आदि आयुधोंसे सुशोभित हैं, उन्होंने हाथोंमें कलश और दर्पण ले रखा है, वे श्रीहरि श्रीलक्ष्मीजीके साथ शोभा पा रहे हैं, उनकी अङ्गकान्ति विद्युत्के समान प्रकाशमान है और वे अनेक प्रकारके दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं; ऐसे भगवान् विष्णुका मैं भजन करता हूँ। इस प्रकार ध्यान करके शक्ति (ह्रीं), श्री (श्रीं) तथा काम (क्लीं) बीजसे सम्पुटित 'अ' आदि एक-एक अक्षरका ललाट आदिमें न्यास करे। उसके साथ आदिमें प्रणव लगाकर श्रीविष्णु और उनकी शक्तिके चतुर्थ्यन्त नाम बोलकर अन्तमें 'नमः' पद जोड़कर बोले।*

एक अक्षर 'अ' का ललाटमें, फिर एक


* उदाहरणके लिये एक वाक्ययोजना दी जाती है—'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अं क्लीं श्रीं ह्रीं केशवकीर्तिभ्यां नमः (ललाटे)' ऐसा कहकर ललाटका स्पर्श करे। इसी प्रकार 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं आं क्लीं श्रीं ह्रीं नारायणकान्तिभ्यां नमः (मुखे)' ऐसा कहकर मुखका स्पर्श करे। ललाट, मुख आदि जिन-जिन अङ्गोंमें मातृका वर्णोंका न्यास करना है,

  • पूर्वभाग-तृतीय पाद * | ४४१ ---|---

अक्षर ‘आ’ का मुखमें, दो अक्षर ‘इ’ और ‘ई’ का क्रमशः दाहिने और बाँयें नेत्रमें और दो अक्षर ‘उ’, ‘ऊ’ का क्रमशः दाहिने-बायें कानमें न्यास करे। दो अक्षर ‘ऋ’, ‘ॠ’ का दायीं-बायीं नासिकामें, दो अक्षर ‘ऌ’, ‘ॡ’ का दायें-बायें कपोलमें, दो अक्षर ‘ए’, ‘ऐ’ का ऊपर-नीचेके ओष्ठमें, दो अक्षर ‘ओ’, ‘औ’ का ऊपर-नीचेकी दन्तपंक्तिमें, एक अक्षर ‘अं’ का जिह्वामूलमें तथा एक अक्षर ‘अः’ का ग्रीवामें न्यास करे। दाहिनी बाँहमें कवर्गका और बायीं बाँहमें चवर्गका न्यास करे। टवर्ग और तवर्गका दोनों पैरोंमें तथा ‘प’ और ‘फ’ का दोनों कुक्षियोंमें न्यास करे। पृष्ठवंशमें ‘ब’ का, नाभिमें ‘भ’ का और हृदयमें ‘म’ का न्यास करे। ‘य’ आदि सात अक्षरोंका शरीरकी सात धातुओंमें, ‘ह’ का प्राणमें तथा ‘ळ’ का आत्मामें न्यास करे। ‘क्ष’ का क्रोधमें न्यास करना चाहिये। इस प्रकार क्रमसे मातृका वर्णोंका न्यास करके मनुष्य भगवान् विष्णुकी पूजामें समर्थ होता है।

शैव-मातृका-न्यास

[ भगवान् शिवके उपासकको केशव-कीर्त्यादि मातृका-न्यासकी भाँति श्रीकण्ठेशादि मातृका-न्यास करना चाहिये।] पूर्णोदरीके साथ श्रीकण्ठेशका, विरजाके साथ अनन्तेशका, शाल्मलीके साथ सूक्ष्मेशका, लोलाक्षीके साथ त्रिमूर्तीशका, वर्तुलाक्षीके साथ महेशका और दीर्घघोणाके साथ अर्धीशका न्यास करे*। दीर्घमुखीके साथ भारभूतीशका, गोमुखीके साथ तिथीशका, दीर्घजिह्वाके साथ स्थाण्वीशका, कुण्डोदरीके साथ हरेशका, ऊर्ध्वकेशीके साथ झिण्टीशका, विकृतास्याके साथ भौतिकेशका, ज्वालामुखीके साथ सद्योजातेशका, उल्कामुखीके साथ अनुग्रहेशका, आस्थाके साथ अक्रूरका, विद्याके साथ महासेनका, महाकालीके साथ क्रोधीशका, सरस्वतीके साथ चण्डेशका, सिद्धगौरीके साथ पञ्चान्तकेशका, त्रैलोक्यविद्याके साथ शिवोत्तमेशका, मन्त्र-शक्तिके साथ एकरुद्रेशका, कमठीके साथ कूर्मेशका, भूतमाताके साथ एकनेत्रेशका, लम्बोदरीके साथ चतुर्वक्त्रेशका, द्राविणीके साथ अजेशका, नागरीके साथ सर्वेशका, खेचरीके साथ सोमेशका, मर्यादाके साथ लाङ्गलीशका, दारुकेशके साथ रूपिणीका तथा वीरिणीके साथ अर्धनारीशका न्यास करना चाहिये। काकोदरीके साथ उमाकान्त (उमेश)-का और पूतनाके साथ आषाढीशका न्यास करे। भद्रकालीके साथ दण्डीशका, योगिनीके साथ अत्रीशका, शङ्खिनीके साथ मीनेशका, तर्जनीके साथ मेषेशका, कालरात्रिके साथ लोहितेशका, कुब्जनीके साथ शिखीशका, कपर्दिनीके साथ छलगण्डेशका, वज्राके साथ द्विरण्डेशका, जयाके साथ महाबलेशका, सुमुखेश्वरीके साथ बलीशका, रेवतीके साथ भुजङ्गेशका, माध्वीके साथ पिनाकीशका, वारुणीके साथ खड्गीशका, वायवीके साथ वकेशका, विदारणीके साथ श्वेतोत्केशका, सहजाके साथ भृग्वीशका, लक्ष्मीके साथ लकुलीशका, व्यापिनीके साथ शिवेशका तथा महामायाके साथ संवर्तकेशका न्यास करे। यह श्रीकण्ठमातृका कही गयी है। जहाँ ‘ईश’ पद न कहा गया हो, वहाँ सर्वत्र उसकी योजना कर लेनी चाहिये। इस श्रीकण्ठमातृका-न्यासके दक्षिणामूर्ति ऋषि और गायत्री छन्द कहा गया है। अर्धनारीश्वर देवता है और सम्पूर्ण मनोरथोंकी प्राप्तिके लिये इसका विनियोग कहा गया है।


उनका निर्देश मूलमें किया जा रहा है। उन सबके लिये उपर्युक्त रीतिसे वाक्ययोजना करनी चाहिये। तन्त्रमें द्विवचन-विभक्ति तथा शक्तियोंका अन्तमें प्रयोग देखा जानेके कारण द्वन्द्वसमास करके भी स्त्री-लिङ्गका पूर्वनिपात नहीं किया गया।
* उदाहरणके लिये वाक्यप्रयोग इस प्रकार है—ह्र् सौं अं श्रीकण्ठेशपूर्णोदरीभ्यां नमः (ललाटे)। ह्र् सौं आं अनन्तेशविरजाभ्यां नमः (मुखवृत्ते) इत्यादि।

४४२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

इसके हल् बीज और स्वर शक्तियाँ हैं। भृगु (स)-में स्थित आकाश (ह)-की छः दीर्घोंसे युक्त करके उसके द्वारा अङ्गन्यास करें¹। इसके बाद भगवान् शङ्करका इस प्रकार ध्यान करे। उनका श्रीविग्रह बन्धूकपुष्प एवं सुवर्णके समान है। वे अपने हाथोंमें वर, अक्षमाला, अंकुश और पाश धारण करते हैं। उनके मस्तकपर अर्धचन्द्रका मुकुट सुशोभित है। उनके तीन नेत्र हैं तथा सम्पूर्ण देवता उनके चरणोंकी वन्दना करते हैं।

गाणपत्य-मातृका-न्यास

इस प्रकार शिवशक्तिका ध्यान करके अन्तमें चतुर्थी विभक्ति और नमः पद जोड़कर तथा आदिमें गणेशजीका अपना बीज लगाकर मातृकास्थलमें एक-एक मातृका वर्णके साथ शक्तिसहित गणेशजीका न्यास करे। ह्रीके साथ विघ्नेश तथा श्रीके साथ विघ्नराजका न्यास करे²। पुष्टिके साथ विनायक, शान्तिके साथ शिवोत्तम, स्वस्तिसहित विघ्नकृत्, सरस्वतीसहित विघ्नहर्ता, स्वाहासहित गणनाथ, सुमेधासहित एकदन्त, कान्तिसहित द्विदन्त, कामिनीसहित गजमुख, मोहिनीसहित निरञ्जन, नटीसहित कपर्दी, पार्वतीसहित दीर्घजिह्व, ज्वालिनीसहित शङ्कुकर्ण, नन्दासहित वृषध्वज, सुरेशीसहित गणनायक, कामरूपिणीके साथ गजेन्द्र, उमाके साथ शूर्पकर्ण, तेजोवतीके साथ विरोचन, सतीके साथ लम्बोदर, विघ्नेशीके साथ महानन्द, सुरूपिणीसहित चतुर्मूर्ति, कामदासहित सदाशिव, मदजिह्वासहित आमोद, भूतिसहित दुर्मुख, भौतिकीके साथ सुमुख, सिताके साथ प्रमोद, रमाके साथ एकपाद, महिषीके साथ द्विजिह्व, जम्भिनीके साथ शूर, विकर्णाके साथ वीर, भ्रुकुटीसहित षण्मुख, लज्जाके साथ वरद, दीर्घघोणाके साथ वामदेवेश, धनुर्धरीके साथ वक्रतुण्ड, यामिनीके साथ द्विरण्ड, रात्रिसहित सेनानी, ग्रामणीसहित कामान्ध, शशिप्रभाके साथ मत्त, लोलनेत्राके साथ विमत्त, चञ्चलाके साथ मत्तवाह, दीप्तिके साथ जटी, सुभगाके साथ मुण्डी, दुर्भगाके साथ खड्गी, शिवाके साथ वरेण्य, भगाके साथ वृषकेतन, भगिनीके साथ भक्त-प्रिय, भोगिनीके साथ गणेश, सुभगाके साथ मेघनाद, कालरात्रिसहित व्यापी तथा कालिकाके साथ गणेशाका अपने अङ्गोंमें न्यास करना चाहिये। इस प्रकार विघ्नेश-मातृकाका वर्णन किया गया है। गणेशमातृकाके गण ऋषि कहे गये हैं। निचृद् गायत्री छन्द है तथा शक्तिसहित गणेश्वर देवता हैं। छः दीर्घ स्वरोंसे युक्त गणेशबीज (गां गीं गूं गैं गों गः) के द्वारा अङ्गन्यास करके उनका इस प्रकार ध्यान करे—गणेशजी अपने चारों भुजाओंमें क्रमशः पाश, अंकुर, अभय और वर धारण किये हुए हैं, उनकी पत्नी सिद्धि हाथमें कमल ले उनसे सटकर बैठी हैं, उनका शरीर रक्तवर्णका है तथा उनके तीन नेत्र हैं, ऐसे गणपतिका मैं भजन करता हूँ। इस प्रकार ध्यान करके स्वकीय बीजको पूर्वाक्षरके रूपमें रखकर उक्त मातृका-न्यास करना चाहिये।

कला-मातृका-न्यास

(अब कला-मातृका-न्यास बताया जाता है—) निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ति, इन्धिका, दीपिका, रोचिका, मोचिका, परा, सूक्ष्मा, असूक्ष्मा, अमृता, ज्ञानामृता, आप्यायिनी, व्यापिनी, व्योमरूपा, अनन्ता, सृष्टि, समृद्धिका, स्मृति, मेधा, क्रान्ति, लक्ष्मी, धृति, स्थिरा, स्थिति, सिद्धि, जरा, पालिनी, क्षान्ति, ईश्वरी, रति, कामिका, वरदा, ह्लादिनी, प्रीति, दीर्घा, तीक्ष्णा, रौद्रा, निद्रा, तन्द्रा, क्षुधा,


१. ह् सां हृदयाय नमः। ह् सीं शिरसे स्वाहा। ह् सूं शिखायै वषट्। ह् सैं कवचाय हुम्। ह् सौं नेत्रत्रयाय वौषट्। ह्स्ः अस्त्राय फट्।
२. गं अं विघ्नेशह्रीभ्यां नमः (ललाटे), गं आं विघ्नराजश्रीभ्यां नमः (मुखवृत्ते) इत्यादि रूपसे वाक्ययोजना कर लेनी चाहिये।