नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 140, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंजल में स्थित अभियुक्त को साधारण धनुष से तीन छोड़े गये बाणों से बींधा जाता है। इससे उसका जल में डूबने लगना न लगना ही उसके सच्चा-झूठा होने का निर्णायक तत्त्व है। क्रूरं धनुः सप्तशतं मध्यमं षट्शतं स्मृतम्। मन्दं पञ्चशतं ज्ञेयमेष ज्ञेयो धनुर्विधिः ॥ 307 ॥ सात सौ, छह सौ और पांच सौ अंगुल लम्बे धनुषों को क्रमशः क्रूर, मध्यम और मन्द (साधारण) माना गया है। नाभिमात्रे जले स्थाप्यः पुरुषः स्तम्भवद्बली। तस्योरू सम्प्रगृह्याय निमज्जेदभिशस्तवन् ॥ 308 ॥ एक बलवान् पुरुष को नाभि तक गहरे पानी में स्तम्भ की भांति ठहरा दिया जाता है। अभिशस्त व्यक्ति बलवान् व्यक्ति के घुटने को पकड़कर डुबकी लगाता है। शरप्रक्षेपणस्थानाद्युवा जवसमन्वितः। गच्छेत् परमया शक्त्या यत्र स्यान्मध्यमः शरः ॥ 309 ॥ एक युवक अपनी पूरी शक्ति को लगाकर भारी वेग से दौड़ता हुआ शर के प्रक्षेपण स्थल से शर-स्थान की ओर जाता है। मध्यमं तु शरं गृह्य पुरुषोऽन्यस्तथाविधिः। प्रत्यागच्छेत वेगेन यतः स पुरुषो गतः ॥ 310 ॥ दूसरा पुरुष मध्यम शर को लेकर ठीक उसी स्थान पर आ जाता है, जहां पहला व्यक्ति ठहरा हुआ है। आगतश्च शरग्राही न पश्यति यदा जले। अन्तर्जलं यदा सम्यक् तदा शुद्धिं विनिर्दिशेत् ॥ 311 ॥ अभिशस्त पुरुष द्वारा शर को लाने वाले पुरुष को न देख पाना, अर्थात् इस अवधि में जल में डूबे रहना अभिशस्त की शुद्धि का प्रमाण माना जाता है। अन्यथा न विशुद्धः स्यादेकाङ्गस्यापि दर्शनात्। स्थानाद्वान्यत्र गमनाद्यस्मिन् पूर्वं निवेशितः ॥ 312 ॥ इसके विपरीत अभिशस्त व्यक्ति के समग्र शरोर के अथवा कुछ अंगों के दीख जाने पर अथवा उसके बहकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर चले जाने पर उसे निर्दोष घोषित नहीं किया जा सकता। ऐसे व्यक्ति को अपराधी मानकर दण्ड देना ही उचित है। न मज्जनीयं स्त्रीबालं धर्मशास्त्रविशारदैः। रोगिणश्चापि वृद्धाश्च पुमांसो ये च दुर्बलाः ॥ 313 ॥ धर्मशास्त्रकारों के अनुसार-स्त्रियों, बालकों, वृद्धों तथा रोगियों को जल दिव्य-अपनी निर्दोषिता को सिद्ध करने के लिए जल में डुबोना-की अनुमति कदापि नहीं देनी चाहिए। 138 / नारदस्मृति