नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
जल में स्थित अभियुक्त को साधारण धनुष से तीन छोड़े गये बाणों से बींधा जाता है। इससे उसका जल में डूबने लगना न लगना ही उसके सच्चा-झूठा होने का निर्णायक तत्त्व है। क्रूरं धनुः सप्तशतं मध्यमं षट्शतं स्मृतम्। मन्दं पञ्चशतं ज्ञेयमेष ज्ञेयो धनुर्विधिः ॥ 307 ॥ सात सौ, छह सौ और पांच सौ अंगुल लम्बे धनुषों को क्रमशः क्रूर, मध्यम और मन्द (साधारण) माना गया है। नाभिमात्रे जले स्थाप्यः पुरुषः स्तम्भवद्बली। तस्योरू सम्प्रगृह्याय निमज्जेदभिशस्तवन् ॥ 308 ॥ एक बलवान् पुरुष को नाभि तक गहरे पानी में स्तम्भ की भांति ठहरा दिया जाता है। अभिशस्त व्यक्ति बलवान् व्यक्ति के घुटने को पकड़कर डुबकी लगाता है। शरप्रक्षेपणस्थानाद्युवा जवसमन्वितः। गच्छेत् परमया शक्त्या यत्र स्यान्मध्यमः शरः ॥ 309 ॥ एक युवक अपनी पूरी शक्ति को लगाकर भारी वेग से दौड़ता हुआ शर के प्रक्षेपण स्थल से शर-स्थान की ओर जाता है। मध्यमं तु शरं गृह्य पुरुषोऽन्यस्तथाविधिः। प्रत्यागच्छेत वेगेन यतः स पुरुषो गतः ॥ 310 ॥ दूसरा पुरुष मध्यम शर को लेकर ठीक उसी स्थान पर आ जाता है, जहां पहला व्यक्ति ठहरा हुआ है। आगतश्च शरग्राही न पश्यति यदा जले। अन्तर्जलं यदा सम्यक् तदा शुद्धिं विनिर्दिशेत् ॥ 311 ॥ अभिशस्त पुरुष द्वारा शर को लाने वाले पुरुष को न देख पाना, अर्थात् इस अवधि में जल में डूबे रहना अभिशस्त की शुद्धि का प्रमाण माना जाता है। अन्यथा न विशुद्धः स्यादेकाङ्गस्यापि दर्शनात्। स्थानाद्वान्यत्र गमनाद्यस्मिन् पूर्वं निवेशितः ॥ 312 ॥ इसके विपरीत अभिशस्त व्यक्ति के समग्र शरोर के अथवा कुछ अंगों के दीख जाने पर अथवा उसके बहकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर चले जाने पर उसे निर्दोष घोषित नहीं किया जा सकता। ऐसे व्यक्ति को अपराधी मानकर दण्ड देना ही उचित है। न मज्जनीयं स्त्रीबालं धर्मशास्त्रविशारदैः। रोगिणश्चापि वृद्धाश्च पुमांसो ये च दुर्बलाः ॥ 313 ॥ धर्मशास्त्रकारों के अनुसार-स्त्रियों, बालकों, वृद्धों तथा रोगियों को जल दिव्य-अपनी निर्दोषिता को सिद्ध करने के लिए जल में डुबोना-की अनुमति कदापि नहीं देनी चाहिए। 138 / नारदस्मृति
निरुत्साहान् रुजा क्लिष्यन्तार्ताँश्च न निमज्जयेत्। सद्यो म्रियन्ते मजन्तः स्वल्पप्राणा हि ते स्मृताः ॥ 314 ॥ उत्साहहीन लोगों, रोग-पीड़ितों तथा दुःख-शोक-सन्तप्तों को भी जल दिव्य की अनुमति नहीं देनी चाहिए; क्योंकि ये लोग अपने मनोबल के क्षीण होने के कारण तत्काल घबरा जाते हैं और तनावग्रस्त होकर पानी में स्थिर नहीं रह पाते, अपितु डूबकर शीघ्र ही मर जाते हैं। साहसेनागतानेतानैव तोये निमज्जयेत्। न चापि साधयेदग्निं न विषेण विशोधयेत् ॥ 315 ॥ जल दिव्य के लिए साहस जुटाकर सहमत होने पर भी जल में उतरने से बिदक जाने वालों की निर्दोषिता की सिद्धि के लिए अग्नि दिव्य तथा विष दिव्य आदि साधनों-उपायों को कदापि नहीं अपनाना चाहिए। सत्यानृताविभागस्य तोयाग्नी स्पष्टकृत्तमौ। अद्भ्यश्चाग्निरभूद्यस्मात्तस्मात्तोये विशेषतः ॥ 316 ॥ वस्तुतः किसी भी अभियुक्त के सच्चा-झूठा होने के निर्णय के लिए अग्नि और जल आदि स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष प्रमाणों के समान कोई दूसरा साधन नहीं है। अग्नि की उत्पत्ति जल से हुई है, अतः जल की विशिष्टता-महत्ता तो असन्दिग्ध एवं निर्विवाद भी है। क्रियते धर्मतत्त्वज्ञैर्दूषितानां विशोधनम्। तस्मात् सत्येन भगवज्जलेश त्रातुमर्हसि ॥ 317 ॥ अतः धर्म-तत्त्वज्ञ सिद्ध-पुरुष तथाकथित दोषियों को अपनी निर्दोषिता को प्रमाणित करने के लिए जल दिव्य को अपनाने का परामर्श देते हैं। उनके अनुसार अभिशस्त व्यक्ति को जल देवता से प्रार्थना करनी चाहिए कि हे वरुणदेव! मैं आपकी शरण में आया हूं, आप तो सर्वज्ञ हैं, आप मेरी वास्तविकता से भी परिचित हैं। अतः आप ही मुझ पर लगे मिथ्या आरोप के कलंक से मुझे मुक्त एवं शुद्ध कर सकते हैं। आप मुझे अपनी कृपा से वञ्चित न करें। अतः परं प्रवक्ष्यामि विषस्य विधिमुत्तमम्। यस्मिन् काले यथा प्रोक्तं यादृशं परिकीर्तितम् ॥ 318 ॥ अब हम सही ढंग से विष विधि का परिचय देंगे और यह बतायेंगे कि कब, कैसे और किस रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। यावन्मात्रं समुद्दिष्टं धर्मतत्त्वार्थदर्शिभिः। तुलयित्वा शरत्काले देयमेतद्धिमागमे ॥ 319 ॥ नारदस्मृति / 139
विष दिव्य के अन्तर्गत धर्मशास्त्रियों ने विष के जितने परिमाण के सेवन का उल्लेख किया है, हेमन्त ऋतु में विष का उतना वज़न तुला में तोलकर रख देना चाहिए और शरद ऋतु के आने पर उसका उपयोग करना चाहिए। नापराह्ने न सन्ध्यायां न मध्याह्ने तु धर्मवित्। शरदग्रीष्मवसन्तेषु वर्षासु च विवर्जयेत् ॥ ३२०॥ धर्मशास्त्रियों के मतानुसार विष दिव्य के प्रयोग के उपयुक्त समय हैं— अपराह्न, सन्ध्याकाल, मध्याह्न, शरद ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, वसन्त ऋतु तथा वर्षा ऋतु। अभिप्राय यह है कि शरद, वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतुओं में मध्याह्न, अपराह्न तथा सन्ध्याकाल में विष दिव्य का प्रयोग करना उचित है। भग्नं च चारितं चैव धूपितं मिश्रितं तथा। कालकूटमलाबुं च विषं यत्नेन वर्जयेत् ॥ ३२१॥ सभी शास्त्रकारों ने एक मत से तिल-घी से चुपड़े-लिथड़े, गरम-तप्त किसी सुगन्धित पदार्थ में मिले घुले तथा कालकूट और अलाबु से बनने वाले विष के प्रयोग का निषेध किया है। वस्तुतः ऐसे विष व्यक्ति के शरीर पर घाव, खुजली, पीड़ा आदि के अतिरिक्त चमड़ी को झुलसाने वाले होते हैं। मानवीय आधार पर भी इनका प्रयोग सर्वथा अवाञ्छनीय होता है। शार्ङ्गं हैमवतं शस्तं वर्णगन्धरसान्वितम्। अभिन्नं तत् . प्रदातव्यं क्षत्रविट्शूद्रयोनिषु ॥ ३२२॥ उत्तम वर्ण, गन्ध व रस वाला विष हिमालय के शृंग (शिखर) पर उत्पन्न होता है, जो 'शार्ङ्ग' नाम से जाना जाता है। यह प्राकृतिक विष है, इसमें किसी प्रकार की कोई कृत्रिमता नहीं है। क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के अभियुक्त-अभिशस्त होने पर उन्हें विष दिव्य के अन्तर्गत इसी प्राकृतिक विष का सेवन कराना चाहिए। विषस्य पलषड्भागाद्भागो विंशतिमस्तु यः। तमष्टभागहीनं तु शोध्ये दद्यात् घृतप्लुतम् ॥ ३२३ ॥ विष दिव्य के अन्तर्गत कितने वज़न में और किस रूप में विष देना चाहिए— इस सम्बन्ध में आचार्यों का मत है कि सात जौ के परिमाण भर विष ही पर्याप्त है। इसे शास्त्रीय भाषा में इस प्रकार कहा गया है—एक सौ साठ यवों का एक पल होता है। इस पल के छठे भाग लगभग 27 यवों में से बीस यव निकाल देने चाहिए। अब बचे सात यवों में से भी आठवां भाग निकाल देना चाहिए, इस प्रकार 6 7 यवों के भार बराबर विष में घी मिलाकर सेवन कराना चाहिए। रूखा विष कभी नहीं देना चाहिए। वर्षासु षड्यवा मात्रा ग्रीष्मे पञ्च यवाः स्मृताः। हेमन्ते सप्त चाष्टौ वा शरद्यस्यापि नेष्यते ॥ ३२४॥ 140 / नारदस्मृति
वर्षा ऋतु में छह यव, ग्रीष्म ऋतु में पांच यव और हेमन्त ऋतु में सात अथवा आठ यव परिमाण जितने विष का सेवन कराना चाहिए, शरद् ऋतु में विष का सेवन सर्वथा वर्जित है। त्वं विषं ब्रह्मणः पुत्रः सत्यधर्मव्यवस्थितः। शोधयेत्तं नरं पापात् सत्येनास्यामृतो भव॥ 325 ॥ विष सेवन कराने से पूर्व विष को हाथ में लेकर इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए—हे विष! आप ब्रह्माजी की सन्तान होने से सत्स्वरूप हैं। धर्म और सत्य की व्यवस्था का भार आपके सिर पर है। अमुक अभियुक्त आपकी शरण में आया है, आप उसके लिए अमृत बनकर उसकी सत्यता को प्रकाशित करके व उसकी निष्पापता को सार्वजनिक करके उसे कृतकृत्य कर दें। छायानिवेशितो रक्ष्यो दिनशेषमभोजनः। विषवेगकलमातीतः शुद्धोऽसौ मनुरब्रवीत् ॥ 326 ॥ मनु महाराज के अनुसार विष सेवन करने वाले अभियुक्त को दिन के समय एक तो शीतल स्थान पर—वृक्ष की छाया, भवन के भीतर—रखना चाहिए तथा दूसरे, उसे खाने के लिए कुछ नहीं देना चाहिए, अर्थात् उपवास कराना चाहिए। विष के प्रभाव से अभियुक्त के मुख की कान्ति के मलिन न पड़ने, अर्थात् पूर्ववत् तेजोमय बने रहने तथा व्यक्ति के स्वास्थ्य में विकार न आने, अर्थात् पूर्ववत् स्फूर्त बने रहने पर उसे शुद्ध एवं निर्दोष प्रमाणित मानना चाहिए। अतः परं प्रवक्ष्यामि कोशस्य विधिमुत्तमम्। शास्त्रविद्भिर्र्यथा प्रोक्तं सर्वकालाविरोधि यत्॥ 327 ॥ अब हम सर्वोत्तम दिव्य कोश की विधि का वर्णन करेंगे। यहां इतना समझना चाहिए कि सभी देशों और कालों के सभी आचार्यों ने इस विधि को एकमत से सर्वश्रेष्ठ दिव्य घोषित किया है। इसका प्रयोग सर्वत्र समान रूप से मान्य एवं प्रचलित है। पूर्वाह्ने सोपवासस्य स्नातस्यार्द्रपटस्य च। सशूकस्याव्यसनिनः कोशपानं विधीयते॥ 328 ॥ उल्लेखनीय यह है कि इस दिव्य का अधिकार केवल आस्तिक और व्यसनमुक्त व्यक्ति को है। वेदों और ईश्वर पर आस्था न रखने वाले तथा किसी दुर्व्यसन का शिकार बने व्यक्ति को तो इस दिव्य के सम्बन्ध में सोचना ही नहीं चाहिए। यद्भक्तः सोऽभियुक्तः स्यात्तद्दैवतं तु पापयेत्। अभ्यर्च्य देवतां स्नाप्य जलस्य प्रसृतित्रयम्॥ 329 ॥ किसी भक्त के अभियुक्त होने पर उसके स्नान-ध्यान आदि से निवृत्त होने पर उसे उसके आराध्य देव का पाद्य अर्घ्य तथा आचमनीय आदि के उपरान्त धूप नारदस्मृति / 141
दीप, नैवेद्य आदि से अर्चन-पूजन करने के लिए कहना चाहिए। इस पूजन से निवृत्त हुए भक्त को तीन बार उसके आराध्य देव के चरणोदक का आचमन कराना चाहिए। सप्ताहाभ्यन्तरे यस्य द्विसप्ताहेन वाशुभम्। प्रत्यात्मिकं तु दृश्येत सैव तस्य विभावना ॥ 330 ॥ कोश दिव्य के प्रति समर्पित अभियुक्त व्यक्ति की स्वयं की अथवा उसके किसी आत्मीय व्यक्ति की एक सप्ताह अथवा दो सप्ताहों के भीतर हानि होने अथवा क्षति पहुंचने पर उसे झूठा और दोषी समझना चाहिए, अन्यथा उसे सर्वथा शुद्ध, निर्दोष और सच्चा प्रमाणित मानना चाहिए। ऊर्ध्वं यस्य द्विसप्ताहान्महदप्यशुभं भवेत्। नाभियोज्यः स केनापि कृतकालव्यतिक्रमात् ॥ 331 ॥ दो सप्ताहों के उपरान्त अभियुक्त के साथ घटने वाली किसी अशुभ घटना का सम्बन्ध कोश दिव्य के साथ नहीं जोड़ना चाहिए; क्योंकि परीक्षा के लिए निर्धारित समय बीत चुका होता है और एक बार निर्दोष घोषित व्यक्ति को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। अभियुक्त समय-सीमा के लिए प्रतिबद्ध होता है, न कि जीवन-भर के लिए उत्तरदायी होता है। महापराधे निर्धर्मे कृतघ्ने क्लीवकुत्सिते। नास्तिकव्रात्यदासेषु कोशपानं विवर्जयेत् ॥ 332 ॥ कोशपान सामान्य अपराधों के लिए है, किसी बहुत बड़े अपराध, यथा ब्रह्महत्या, गोवध व गुरुपत्नी-गमन आदि के हो जाने पर इस दिव्य का प्रयोग वर्जित है। किसी धर्मरहित स्थल—द्यूतशाला तथा वेश्यागृह आदि—में हुए पाप में भी इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, कृतघ्न, क्लीव, कुत्सित, नास्तिक, व्रात्य (आचार-भ्रष्ट तथा अतिच्युत) और दासों के लिए भी यह प्रयोग निषिद्ध है। केवल धर्मनिष्ठ एवं आचार-परायण द्विजों के लिए ही यह प्रयोग है। संक्षेपतः धर्मभीरु पुरुषों पर लगे साधारण अपराधों के आरोप की सत्यता- असत्यता के निर्णय के लिए कोशपान का विधान है। यथोक्तेन विधानेन पञ्चदिव्यानि धर्मवित्। दत्त्वा राजाभिशस्तानां प्रेत्य चेह च नन्दति ॥ 333 ॥ राजा उपर्युक्त विधि के अनुसार पांच दिव्यों—घट दिव्य, अग्नि दिव्य, जल दिव्य, विष दिव्य तथा कोश दिव्य—से अभियुक्तों को अपनी निर्दोषिता को सिद्ध करने का अवसर देने के रूप में न्याय की रक्षा करने के पुण्य के फलस्वरूप इस लोक में तथा परलोक में सुख भोगता है और यश अर्जित करता है। 142 / नारदस्मृति
ग्रीष्मे तु सलिलं प्रोक्तं विषं काले सुशीतले। ब्राह्मणस्य घटो देयः क्षत्रियस्याग्निरुच्यते ॥ 334 ॥ जल दिव्य का प्रयोग केवल ग्रीष्मकाल में और विष दिव्य का प्रयोग केवल शीतकाल में ही करना चाहिए। ब्राह्मण के लिए घट दिव्य का तथा क्षत्रिय के लिए अग्नि दिव्य का प्रयोग शास्त्र-सम्मत है। वैश्यं तु सलिलं देयं विषं शूद्रे प्रदापयेत्। न ब्राह्मणं विषं दद्यान्न लोहं क्षत्रियो हरेत् ॥ 335 ॥ ब्राह्मण को विष दिव्य और क्षत्रिय को लौह दिव्य कभी नहीं देना चाहिए। वैश्य को जल दिव्य और शूद्र को विष दिव्य दिया जाता है। कोशान्तानि तुलादीनि गुरुष्वर्थेषु दापयेत्। शतार्धं दापयेच्छुद्धावशुद्धो दण्डभागभवेत् ॥ 336 ॥ बड़े पापों के मामलों में भी अभियुक्त द्वारा तुला दिव्य से कोश दिव्य तक किसी दिव्य को अपनाने—अपने को उस दिव्य द्वारा निर्दोष सिद्ध करने का अवसर प्रदान करने—का आग्रह करने पर उसे अवसर तो देना चाहिए, परन्तु यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि उसके शुद्ध-निर्दोष सिद्ध होने पर भी उसे वादी को एक सौ पचास पणों का भुगतान करना पड़ेगा। तण्डुलानां प्रवक्ष्यामि विधिं भक्षणचोदितम्। चौर्ये तु तण्डुला देया नान्यत्रेति विनिश्चयः ॥ 337 ॥ अब हम तण्डुलों के सेवन से सम्बन्धित दिव्य विधि की जानकारी प्रस्तुत कर रहे हैं। तण्डुल एकान्त में चोरी से दिये जाते हैं। तण्डुलों के आदान-प्रदान को सार्वजनिक नहीं किया जाता है। तण्डुलान् कारयेच्छुक्लाञ्छालेर्नान्यस्य कस्यचित्। मृण्मये भाजने कृत्वा भास्करस्याग्रतः शुचिः ॥ 338 ॥ चावलों को भूसी से अलग और साफ़ सुथरा करके मिट्टी के पात्र में भर देना चाहिए और उस पात्र को सूर्यदेव के सामने रख देना चाहिए। स्नानोदकेन सम्पृक्तान् रात्रौ तत्रैव वासयेत्। प्रभातायां रजन्यां तु त्रिः कृत्वा प्राङ्मुखाय च ॥ 339 ॥ रात्रि में स्नान करके व चावलों को शुद्ध करके जल में भिगोकर रख देना चाहिए। प्रातःकाल उठकर पूर्वाभिमुख होकर उन्हें शुद्ध जल से तीन बार भली प्रकार धोकर साफ़ करना चाहिए। स्नानाय सोपवासाय दद्याद्देवार्चकः स्वयम्। स्वयं कार्यं समुद्दिश्य सत्यासत्यपरीक्षणे ॥ 340 ॥ तण्डुल दिव्य करने वाले को स्नान आदि से शुद्ध होकर व उपवास रखकर नारदस्मृति / 143
देव-पूजा के लिए नियुक्त व्यक्ति पुजारी के हाथ से तण्डुल ग्रहण करने चाहिए। तण्डुलान् भक्षयित्वा तु पत्रे निष्ठीवयेत्ततः। अश्वत्थपत्राभावे तु भूर्जपत्रे ततः स्मृतम्॥ 341॥ चावलों को खाकर खाने वाले को किसी एक पत्ते पर थूकना होता है। स्मृति के अनुसार इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त तो पीपल का पत्ता है। पीपल के पत्ते के उपलब्ध न होने पर भोजपत्र को लेना चाहिए। दृश्येत शोणितं यस्य दन्तजालं च सीदति। गात्रं च कम्पते यस्य तमशुद्धं विनिर्दिशेत् ॥ 342 ॥ उस थूक में रक्त का दिखाई देना अथवा अभियुक्त का दन्तपीड़ा से व्यथित होना अथवा उसके देह में कम्पन का होना आदि को अभियुक्त के पापी होने के सूचक लक्षण समझने चाहिए। अतः परं प्रवक्ष्यामि तप्तमाषकलक्षणम्। शुभाशुभपरीक्षार्थं ब्रह्मणाभिहितं स्वयम्॥ 343॥ अब हम ब्रह्माजी द्वारा निर्दिष्ट दोषी अथवा निर्दोष के सूचक तप्त भाव के लक्षणों का परिचय देंगे। यह अभियुक्त के शुद्ध-अशुद्ध होने वाली परीक्षा की उत्तम विधि है। सौवर्णे रजते पात्रे आयसे मृण्मयेऽपि वा। क्षिप्रं घृतमुपादाय तदग्नौ स्थापयेच्छुचिः ॥ 344 ॥ स्वर्ण अथवा रजत अथवा लौह अथवा मिट्टी के पात्र में घृत डालकर शुद्ध भाव से उसे अग्नि पर तपाना चाहिए। सौवर्णीं राजसीं ताम्रीमायसीं वा सुशोभिताम्। सलिलेनासकृद्धौतां निक्षिपेत्तत्र मुद्रिकाम्॥ 345 ॥ सोने अथवा चांदी, तांबे अथवा लौह से बनी सुन्दर मुद्रिका (अंगूठी) को कई बार जल से धोकर तपे हुए घी वाले बरतन में डाल देना चाहिए। भ्रमत् पतितायामन्तः स नः स्पर्शसुभीषणः। ततस्त्वनेन मन्त्रेण घृतं तदभिमन्त्रयेत् ॥ 346 ॥ अब घी के पात्र में पड़ी इधर उधर लुढ़कती अंगूठी के साथ घी को इतना अधिक तपाना चाहिए कि अंगूठी आग का गोला बन जाये और इतनी अधिक भीषण एवं प्रज्वलित हो जाये कि उसका स्पर्श भयोत्पादक एवं दाहक बन जाये। अब उस घृत को मन्त्रों से अभिमन्त्रित करना चाहिए। परं पवित्रममृतं घृतं त्वं यज्ञकर्मसु। दहाग्ने यद्ययं पापो हिमशीतं शुचौ भव ॥ 347 ॥ इसके उपरान्त प्रार्थना करनी चाहिए—हे घृत ! आप देवों को यज्ञ में आहुति 144 / नारदस्मृति
देने का आधार अमृत रूप हैं। आपसे प्रार्थना है कि यदि अभियुक्त सचमुच पापी है, तो उसे दग्ध कर दें और यदि वह निर्दोष है, तो आप जल के समान शीतल हो जायें। प्रदेशिन्यक्षता यस्य संस्पृष्टायां परीक्षणे। यदि विस्फोटका न स्युः शुद्धोऽसावन्यथा न हि ॥ 348 ॥ अब अभियुक्त को अपनी तर्जनी अंगुली से मुद्रिका को उठाने को कहना चाहिए। तर्जनी के जलने अथवा क्षतिग्रस्त होने पर व्यक्ति को दोषी तथा तर्जनी के अक्षत (अप्रभावित) रहने पर उसे निर्दोष-शुद्ध समझना चाहिए। ॥ चतुर्थ अध्याय का प्रथम प्रकरण समाप्त ॥
नारदस्मृति / 145
2. निक्षेप प्रकरण
- निक्षेप प्रकरण स्वं द्रव्यं यत्र विश्रम्भात्निक्षिपत्यविशङ्कितः। निक्षेपो नाम तत्प्रोक्तं व्यवहारपदं बुधैः ॥ 1 ॥ 'निक्षेप' भी एक प्रकार का व्यवहार—लेन-देन से सम्बन्धित विषय—है। अपनी किसी मूल्यवान् चल-अचल सम्पत्ति को किसी शंका, संशय अथवा सन्देह के बिना, पूर्ण विश्वास के साथ किसी के पास रख देने का नाम ही 'निक्षेप' है। टिप्पणी—नारदभाष्य के अनुसार निक्षेप शब्द का अर्थ है—‘“निःशंकम् निक्षिप्यते स्थाप्यते इति निक्षेपः।’” अर्थात् निःशंक होकर (पूर्ण विश्वास रखकर) अपनी कोई वस्तु किसी दूसरे को सौंपना अथवा उसके पास रखना ही निक्षेप है। 'व्यवहार प्रकाश' के अनुसार—निक्षेप एव ग्राहकस्यासमक्षं समर्पितो न्यासः। अर्थात् बिना किसी साक्ष्य के अपनी सम्पत्ति किसी के पास रखने का नाम निक्षेप है और इसी का दूसरा नाम न्यास है। असहाय भाष्यकार के अनुसार—स्वं द्रव्यं यो निक्षिपति यच्च मतिवि- स्त्रम्भादविशंकितो निक्षिपति। अनेनोक्तेनैतदुक्तं भवति किल यत्र अविश्वासात् शंका भवति तत्र साक्षिलिखितग्रहणविरहितं कोऽपि वराटिकापि न ददाति। यत्र पुनर्विश्वासात्निशंकः पुरुषो भवति तत्र साक्षिलिखितग्रहणवर्जितमेव सुवर्ण सहस्त्रादिकमपि निक्षिपति। अर्थात् जहां विश्वास नहीं होता, वहां व्यक्ति बिना लिखा-पढ़ी और गवाह के किसी को एक कौड़ी भी देने को उद्यत नहीं होता। इसके विपरीत जहां विश्वास होता है, वहां किसी को कानों-कान सूचना दिये बिना ही हज़ारों रुपये और स्वर्णादि मूल्यवान् पदार्थ दे दिये जाते हैं। इस प्रकार निक्षेप का आधार है— व्यक्ति-विशेष के प्रति मन में विश्वास का दृढ़ होना। कुलजे वृत्तसम्पन्ने धर्मज्ञे सत्यवादिनि। महापक्षे धनिन्यार्ये निक्षेपं निक्षिपेद्बुधः ॥ 2 ॥ निम्नोक्त सात गुणों से सम्पन्न व्यक्ति के पास ही निक्षेप का व्यवहार करना चाहिए—1. कुलीन—श्रेष्ठ, निष्कलंक कुल में उत्पन्न व्यक्ति, 2. शुद्ध—पवित्र चरित्रवान्, 3. धर्मात्मा, अर्थात् धर्म-विरुद्ध आचरण से भय खाने वाला, 4. सत्यवादी, 146 / नारदस्मृति
- उदार-हृदय, 6. धनसमृद्ध तथा 7. लोक में सम्मानित एवं प्रतिष्ठित। उपर्युक्त सात गुणों से युक्त पुरुष के पास निक्षिप्त सम्पत्ति समय बीतने पर भी सुरक्षित रहती है। उसे किसी प्रकार की कोई क्षति नहीं पहुंचती। निक्षेप्ता को चिन्ता नहीं करनी पड़ती। यो यथा निक्षिपेद्धस्ते यमर्थं यस्य मानवः। स तथैव ग्रहीतव्यो यथा दायस्तथा ग्रहः॥ ३॥ जिस व्यक्ति को, जिस स्थिति में और जिस प्रकार जो वस्तु निक्षेप के रूप में सौंपी जाती है, निक्षेप रखने वाले का कर्तव्य हो जाता है कि वह उस व्यक्ति को उस स्थिति में और उसी प्रकार से गृहीत वस्तु लौटा दे। दाय के अनुरूप ही ग्रहण का होना धर्म और न्याय है। न चेद्दद्यात्तु निक्षेप्तुस्तद् द्रव्यं तु यथाविधि। उपसंगृह्य दाप्योऽसौ दिव्यादिभिर्व्यवस्थितः ॥ ४॥ निक्षेप्ता से गृहीत वस्तु को ग्रहीता द्वारा यथावत् लौटाने से इनकार करने पर धर्माधिकारी द्वारा दिव्य उपायों के प्रयोग से ग्रहीता से सत्य उगलवाना चाहिए और निक्षेप्ता को उसकी वस्तु दिलवानी चाहिए। टिप्पणी—इस सम्बन्ध में मनु की व्यवस्था इस प्रकार है— अथ निक्षेपग्राही लोभं गच्छति, निक्षेप्तुस्तद् द्रव्यं न प्रयच्छति, तदावेदितो राज्ञा उपसंगृह्य दिव्यादिप्रमाणसाधितो द्विगुणदण्डाकोदितः कृतो दाप्यः। अर्थात् यदि निक्षेप रखने वाला धनिक लोभवश निक्षेप्ता की सम्पत्ति को हड़पना चाहता है और वस्तु के निक्षेप रखे जाने से मुकर जाता है और फिर पीडित व्यक्ति राजा से न्याय की गुहार करता है, तो राजा को दिव्य अथवा अदिव्य उपायों से सत्य का पता लगाना चाहिए। धनिक के दोषी पाये जाने पर न केवल उससे निक्षेप्ता की सम्पत्ति लेकर सम्बद्ध पक्ष को दिलानी चाहिए, अपितु व्यक्ति की धूर्तता के लिए दण्ड-रूप में उससे वस्तु के मूल्य से दुगुनी धनराशि भी वसूल करनी चाहिए। अन्यद्रव्यव्यवहितं द्रव्यमव्याहृतं च यत्। निक्षिप्यते परगृहे तदौपनिधिकं स्मृतम्॥ ५॥ तालाबन्द बक्सा, पेटी, गठरी अथवा पैकेट—भीतर रखे सामान के विषय में जानकारी दिये बिना सोना है अथवा मिट्टी है—कुछ भी बताये बिना—निक्षेप के रूप में दूसरे के घर में रखे जाने को उपनिधि अथवा औपनिधिक निक्षेप नाम दिया जाता है। स पुनर्द्विविधः प्रोक्तः साक्षिमानितरस्तथा। प्रतिदानं तथैवास्य प्रत्ययः स्याद्विपर्यये॥ ६॥ निक्षेप दो प्रकार से किया जाता है। प्रथम, साक्षी की उपस्थिति में तथा नारदस्मृति / 147
द्वितीय, किसी साक्षी को बीच में लाये बिना। उल्लेखनीय यह है कि जिस भी रूप में निक्षेप किया जाता है, उसी रूप में उसकी वापसी होनी चाहिए, अर्थात् यदि साक्षी को बीच में डाला गया है, तो वापसी के समय भी उसकी उपस्थिति अनिवार्य समझनी चाहिए। याच्यमानस्तु यो दात्रा निक्षेपं न प्रयच्छति। दण्ड्यः स राज्ञा दुष्टात्मा नष्टे दाप्यश्च तत्समम्॥ 7 ॥ निक्षेप्ता (निक्षेप रखने वाला) द्वारा अपना सामान वापस मांगने पर इनकार करने वाले ग्रहीता को दुरात्मा एवं धूर्त मानकर राजा के द्वारा दण्डित किया जाना चाहिए। राजा का यह भी कर्तव्य है कि निक्षेप में रखे सामान के नष्ट हो जाने पर अथवा गुम हो जाने पर निक्षेप ग्रहण करने वाले से निक्षेप्ता को क्षतिपूर्ति के रूप में सामान के बराबर मूल्य दिलाया जाये। यं चार्थं साधयेत्तेन निक्षेप्तुरननुज्ञया। तत्रापि दण्ड्यः स भवेद्दाप्यस्तच्चापि सोदयम्॥ 8 ॥ निक्षेप्ता की अनुमति के बिना अपने पास निक्षिप्त वस्तु से लाभ कमाने वाले ग्रहीता से न केवल अर्जित धन और उस पर बनने वाले ब्याज की राशि वसूल करनी चाहिए, अपितु ऐसे धूर्त ग्रहीता को यथोचित दण्ड से अनुशासित भी करना चाहिए। ग्रहीतुः सह योऽर्थेन नष्टो नष्टः स दायिनः। दैवराजकृते तद्वत् चेत्तज्जिह्मकारितम्॥ 9 ॥ ग्रहीता के अपने धन के साथ निक्षिप्त वस्तु के भी नष्ट हो जाने की स्थिति में अथवा दैवी आपत्ति—घर को आग लग जाना, चोरी हो जाना आदि—की स्थिति में अथवा राजा द्वारा ले लिये जाने या छापा पड़ने पर अन्य सामान के साथ निक्षिप्त वस्तु के भी अधिगृहीत हो जाने आदि की स्थिति में वह हानि निक्षेप्ता की होती है। निक्षेप्ता ग्रहीता को क्षतिपूर्ति के लिए विवश नहीं कर सकता। हां, यहां यह अवश्य निश्चित करना चाहिए कि ग्रहीता द्वारा निर्दिष्ट कारण वास्तविक है या नहीं। कहीं वह छल-कपट अथवा कुटिलता को तो नहीं अपना रहा। सच्चाई और ईमानदारी मिलने पर निक्षेप्ता को निक्षिप्त वस्तु की हानि को अपने भाग्य का दोष मानना चाहिए; क्योंकि उस हानि में ग्रहीता का तो कोई योग नहीं। उसने जान बूझकर तो कुछ नहीं किया। जब स्थिति उसके वश में नहीं थी, तो वह क्या कर सकता था ? स्वयमेव तु यो दद्यान्मृतस्य प्रत्यनन्तरे। न स राज्ञाभियोक्तव्यो न निक्षेप्तुश्च बन्धुभिः ॥ 10 ॥ यदि अपने किसी निकट सम्बन्धी के पास अपने सामान को निक्षेप करने वाले के अचानक मर जाने पर ग्रहीता मृतक के परिवारजनों को स्वयं निक्षिप्त 148 / नारदस्मृति
सामान को लौटाता है, तो परिवारजनों को उसका सौजन्य मानकर उसके प्रति आभार प्रकट करना चाहिए। उसके प्रति कुछ रख लेने का किसी प्रकार का कोई सन्देह भी नहीं लाना चाहिए, अपितु उस पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए। उस पर किसी प्रकार का न तो कोई आरोप लगाया जा सकता है और न ही उसके विरुद्ध अभियोग चलाया जा सकता है। अच्छलेनैव चान्विच्छेत्तमर्थं प्रीतिपूर्वकम्। विचार्य तस्य वा वृत्तं साम्नैव परिशोधयेत् ॥ 11 ॥ निक्षेप्ता के निक्षेप की वस्तु को वापस लिये बिना अचानक मर जाने पर और गृहीता द्वारा लौटाने से इनकार करने पर मृतक के उत्तराधिकारियों को बिना किसी छल कपट का सहारा लिये प्रेम-पूर्वक उसे समझाने-बुझाने का प्रयास करना चाहिए अथवा ग्रहीता के आचरण के अनुरूप साम-दान आदि किसी भी उपयुक्त लगने वाले उपाय का यथेष्ट प्रयोग करना चाहिए। उत्तराधिकारियों को यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि उनके पास निक्षेप का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं होता। जानकारी के निश्चित होने पर भी प्रमाण के अभाव में ग्रहीता को न्यायालय में तो नहीं घसीटा जा सकता। अतः प्रेम से कार्य निकालने में ही बुद्धिमत्ता होती है। चौरैर्हृतं जले मग्नमग्निना दग्धमेव च। न दद्यात् यदि तस्मात् स न संहरति किञ्चन ॥ 12 ॥ निक्षेप्ता की निक्षिप्त वस्तु के साथ ही अन्य छल-कपट का सहारा न लेने वाले ग्रहीता के घर से सामान चोरी हो जाने पर, बाढ़ से बह जाने पर, आग लगने से जल जाने पर निक्षेप्ता को अपनी निक्षिप्त वस्तु की मांग नहीं करनी चाहिए। हां, यह अवश्य निश्चित करना चाहिए कि निक्षेप्ता का सामान सचमुच नष्ट हो गया है अथवा उस सामान के बच जाने पर ग्रहीता की नीयत बिगड़ गयी है। ग्रहीता दुर्घटना की आड़ में कहीं निक्षेप्ता के सामान को हड़पने तो नहीं जा रहा है। यो निक्षेपं नार्पयति यश्चानिक्षिप्य याचते। तावुभौ चौरवच्छास्यौ दण्डं दाप्यौ च तत्समम् ॥ 13 ॥ दोनों-निक्षेप को न लौटाने वाले तथा निक्षेप न रखकर भी उसकी मांग करने वाले, अर्थात् झूठ बोलकर दूसरे को लूटने को प्रयत्नशील-को चोर समझना चाहिए और दोनों को चोर के लिए निर्धारित दण्ड देकर उन्हें अनुशासित करना चाहिए। एष एव विधिर्दृष्टो याचितान्वाहितादिषु। शिल्पे चोपनिधौ न्यासे प्रतिन्यासे तथैव च ॥ 14 ॥ निम्नोक्त सामान के सम्बन्ध में भी निक्षेप के विषय में निर्दिष्ट नियम लागू होते हैं- नारदस्मृति / 149
याचित — काम चलाने के लिए आभूषण, वस्त्र, शस्त्र आदि मांगकर ले जाना और फिर लौटाने का नाम न लेना। अन्वाहित — किसी को देने के लिए लिया गया सामान, सम्बद्ध स्थान पर सम्बद्ध व्यक्ति को न पहुंचाकर, अपने पास रख लेना। शिल्प — कारीगर, लोहार, सोनार आदि द्वारा धन अथवा स्वर्ण आदि लेकर मूर्ति, चित्र, आभूषण आदि बनाकर न देना। उपनिधि — स्वर्णकार आदि शिल्पियों को नमूने की नक़ल के लिए दिये गये सामान को उनके द्वारा हड़प लेना। न्यास — किसी को थोड़े समय के लिए सामान की सुरक्षा का दायित्व सौंपना और उस व्यक्ति का सामान को लेकर चलते बनना तथा प्रतिन्यास — आदान-प्रदान के आधार पर किसी की वस्तु की रक्षा के बदले अपनी वस्तु की रक्षा का दायित्व सौंपना और उस व्यक्ति द्वारा अपनी वस्तु को सुरक्षित पाकर दूसरे की वस्तु के प्रति उपेक्षा दिखाना। प्रतिगृह्णाति पोगण्डं यश्च सप्रधनं नरः। तस्याप्येष भवेद्धर्मः षडेते विधयः समा॥ 15 ॥ इसी प्रकार जब किसी अनाथ बालक को फुसलाकर ग्रहीता उसका सामान अपने पास रखवा तो लेता है, परन्तु उसके द्वारा मांग करने पर लौटाने से इनकार करता है, तो ऐसे व्यक्ति को भी निक्षेप हड़पने के लिए निर्दिष्ट दण्ड देना चाहिए। ॥ चतुर्थ अध्याय का द्वितीय प्रकरण समाप्त ॥ 150 / नारदस्मृति
3. सम्भूयसमुत्थान प्रकरण
- सम्भूयसमुत्थान प्रकरण वणिक्प्रभृतयो यत्र कर्म सम्भूय कुर्वते। तत्सम्भूयसमुत्थानं व्यवहारपदं स्मृतम्॥ 1 ॥ जहां वणिक आदि एक साथ मिलकर व्यापार-धन्धा करते हैं, शास्त्रों में उस व्यावसायिक स्थल का नाम 'सम्भूयसमुत्थान' कहलाता है। फलहेतोरुपायेन कर्म सम्भूय कुर्वताम्। आधारभूतः प्रक्षेपस्तेनोत्तिष्ठेयुरंशतः ॥ 2 ॥ मिलकर साझा व्यापार-धन्धा करने वालों का एकमात्र उद्देश्य लाभ अर्जित करना होता है। अर्जित लाभ का कितना अंश किसको मिलना है, इस मूलतत्त्व के निर्धारण के लिए उनके द्वारा निवेशित धनराशि के अंश दान को ही आधार बनाया जाता है। जिस भागीदार ने जितना धन लगाया है, उसे उतने ही भाग में लाभ पाने का अधिकार है। उदाहरणार्थ, चार सहयोगियों ने मिलकर एक लाख रुपयों की मूलराशि से किसी उद्यम का प्रारम्भ किया। इसमें एक ने पचास हज़ार रुपयों का तथा दूसरे और तीसरे ने बीस बीस हज़ार रुपयों का और चतुर्थ ने केवल दस हज़ार रुपयों का योग दिया है। उनके इसी योगदान के आधार पर प्रथम का पचास प्रतिशत, द्वितीय-तृतीय का बीस-बीस प्रतिशत व चतुर्थ का दस प्रतिशत भाग माना जायेगा। समोऽतिरिक्तो हीनो वा तत्रांशो यस्य यादृशः। क्षयव्ययौ तदा वृद्धिस्तत्र तस्य तथाविधाः ॥ 3 ॥ भागीदारों का जैसा-बराबर बराबर अथवा न्यूनाधिक-भाग निर्धारित रहता है, ख़र्च तथा हानि आदि में उनसे उतनी ही कटौती की जाती है तथा लाभ में उन्हें उतना ही भुगतान किया जाता है। भाण्डपिण्डव्ययोद्धारभारसारान्ववेक्षणम् । कुर्युस्तेऽव्यभिचारेण समये स्वे व्यवस्थिताः ॥ 4 ॥ उद्यम से सम्बद्ध सामान की देखभाल के लिए, उसे विक्रय की दृष्टि से आकर्षक बनाने के लिए तथा उसके लिए गुणों को प्रचारित करने के लिए निम्नोक्त ख़र्च निर्विवाद रूप से देय होते हैं- नारदस्मृति / 151
भण्डारण — खरीदे गये माल को सुरक्षित रखने के लिए गोदाम की व्यवस्था करना। पाथेय — क्रय-विक्रय के लिए अपने ही नगर के विभिन्न क्षेत्रों में अथवा अन्य नगरों में आने जाने पर सवारी, खान पान तथा होटल आदि पर होने वाला ख़र्च, अर्थात् यात्रा-भत्ता। व्यय — कर्मचारियों का वेतन, दुकान गोदाम आदि का किराया, मरम्मत, बैंक आदि से लिये ऋण अथवा ब्याज आदि का भुगतान, काग़ज़ स्याही आदि की ख़रीद तथा बाहर के व्यापारियों के ठहराने और खान-पान पर होने वाले विभिन्न प्रकार के ख़र्च। उद्धार — अपने सामान की खपत को बढ़ाने के लिए किये जाने वाले प्रयासों—विज्ञापन, प्रचार, उपहार-योजना तथा खुदरा व्यापारियों को लुभाने व अंशदान (कमीशन)—पर आने वाला ख़र्च। भार — अपने सामान की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए, अर्थात् रंग- रूप, वज़न तथा माप आदि कम न होने देने के लिए किये जाने वाले कृत्रिम उपायों पर होने वाला ख़र्च। (उदाहरणार्थ, सेब आदि फलों को कोल्ड-स्टोर में रखना, गोदाम को चूहों-कीड़ों के प्रवेश से बचाने की व्यवस्था करना अथवा वर्षा आदि के कारण बिगड़े सामान पर रंग-रोगन कराना, चमकाना आदि।) सार — (मूल्यवान्) वस्तुओं—चन्दन, केसर, कस्तूरी, हीरा, मोती आदि— की सुरक्षा की अतिरिक्त व्यवस्था करना—बैंक के लॉकर में रखवाना तथा बीमा करवाना आदि। प्रमादान्नाशितं दाप्यः प्रतिषिद्धकृतं च यत्। असन्दिष्टश्च यत् कुर्यात् सर्वसम्भूयकारिभिः ॥ ५ ॥ सभी भागीदारों की सहमति प्राप्त किये बिना किसी सामान को नष्ट कर देने, भागीदारों के मना करने पर भी किसी सामान का क्रय-विक्रय करने तथा अपनी ही गलती से किसी सामान को गंवा बैठने से होने वाली हानि का दायित्व दूसरे भागीदारों का कदापि नहीं होता, अपितु हानि की भरपायी एकमात्र कर्ता को ही करनी होती है। दैवतस्करराजभ्यो व्यसने समुपस्थिते। यस्तत्स्वशक्त्या रक्षेत् तस्यांशो दशमः स्मृतः ॥ ६ ॥ आग लगने जैसी दैवी आपत्ति से, चोर डाकुओं के गिरोह से तथा राजकर्मियों के अनुचित व्यवहार (छापा-ज़ब्त करना आदि) से अकेला जूझकर एवं अपने प्राणों को संकट में डालकर साझी सम्पत्ति को बचाने वाले भागीदार को बचायी गयी सम्पत्ति का दसवां भाग पुरस्कार के रूप में देना चाहिए। 152 / नारदस्मृति
किसी एक सहभागी के मर जाने अथवा विदेश जाने पर उसके द्रव्य की व्यवस्था सम्बन्धी नियम— एकस्य चेत् स्याद् व्यसनं दायादोऽस्य तदाप्नुयात्। अन्यो वासति दायादे शक्ताश्चेत् सर्व एव वा॥ 7॥ दैवी उपद्रव, डाकुओं के उत्पात तथा प्रशासन की उग्रता से जूझने वाले तथा साझी सम्पत्ति को बचाने में अपने प्राण गंवाने वाले भागीदार के दायाद - पैतृक सम्पत्ति लेने वाले—को उसका स्थानापन्न मानकर उसके भाग का लाभांश उसे देते रहना चाहिए। यह शेष भागीदारों का नैतिक कर्तव्य बनता है। मृतक के पुत्र के होने पर उसके निकट सम्बन्धी को अथवा उसका दाहकर्म करने वाले को अथवा अपने को उसका उत्तराधिकारी को उसका लाभांश देते रहना चाहिए। ऋत्विनां व्यसनेऽप्येवमन्यस्तत्कर्म निस्तरेत्। लभेत दक्षिणाभागं स तस्मात् सम्प्रकल्पितम्॥ 8॥ यज्ञ-यागादि कराने वाले ऋत्विज के सम्बन्ध में भी उपर्युक्त व्यवस्था लागू होती है, अर्थात् यजमान से दान दक्षिणा आदि लिये बिना प्राण त्यागने वाले पुरोहित को देय दान-दक्षिणा को पाने का अधिकारी उसका पुत्र, उसके अभाव में उसका निकट सम्बन्धी अथवा उसका दाहकर्म करने वाला अथवा अपने को उसका उत्तराधिकारी सिद्ध करने वाला व्यक्ति ही होता है। ऋत्विग्याज्यमदुष्टं यस्त्यजेदनुपकारिणम्। अदुष्टर्त्विजे भाज्यो विनेयौ तावुभावपि॥ 9॥ किसी प्रकार की दुष्टता अथवा उपकार न करने वाले यजमान को यज्ञ- यागादि कराने की स्वीकृति देकर क्रोध-लोभ आदि के कारण उसे छोड़ने वाला पुरोहित तथा एक बार वरण करके उसमें किसी दोष के न मिलने पर भी अकारण ऋत्विज को छोड़ने वाला यजमान, दोनों ही दण्डनीय हैं। इन दोनों को कठोर दण्ड देकर अनुशासित करना चाहिए। ऋत्विक् तु त्रिविधो दृष्टः पूर्वजुष्टः स्वयं कृतः। यदृच्छया च यः कुर्यादार्त्विज्यं प्रीतिपूर्वकम्॥ 10॥ ऋत्विक् तीन प्रकार के होते हैं— पूर्वजुष्ट—कुल-परम्परा से चला आने वाला। स्वयं कृत—यजमान द्वारा पुरोहित के पास जाकर ऋत्विक् बनाने का अनुरोध करने तथा यादृच्छिक—यजमान द्वारा किसी भी विप्र पर अनुरक्त होकर उसका वरण करना। नारदस्मृति / 153
क्रमागतेष्वेष धर्मो वृत्तेष्वृत्विक्षु च स्वयं। यादृच्छिकेषु याज्यस्य तत्तयागे नास्ति किल्विषम्॥ 11 ॥ प्रथम दो—पूर्वजुष्ट तथा स्वयंकृत—के लिए यजमान का परित्याग और यजमान द्वारा इनका परित्याग दण्डनीय अपराध है। यादृच्छिक इस नियम के अन्तर्गत नहीं आता। यजमान ने किसी के गुणों पर मुग्ध होकर अथवा अकारण ही उसका वरण कर लिया, परन्तु कुछ समय पश्चात् यजमान को पुरोहित साधारण प्रतीत होने लगा अथवा उससे अधिक गुणी उसे मिल गया अथवा वह पूर्वजुष्ट के क्रोध से डर गया, तो इस स्थिति में यादृच्छिक के परित्याग में कोई दोष नहीं। शुल्कस्थानं वणिक् प्राप्तः शुल्कं दद्यात् यथोदितम्। न तद्व्यतिहरेद्राजो बलिरेष प्रकीर्तितः॥ 12 ॥ प्रशासन को चुंगीघर पर मांगे गये शुल्क का भुगतान करने वाले व्यापारी के माल को रोकने अथवा ज़ब्त करने का कोई अधिकार नहीं। शुल्कस्थानं परिहरन्नकाले क्रयविक्रयो। मिथ्योक्त्वा च परीमाणं दाप्योऽष्टगुणमत्ययम्॥ 13 ॥ चुंगीघर से लुक-छिपकर सामान ले जाने वाले, शुल्क चुकाने से पूर्व सामान का क्रय-विक्रय करने वाले, शुल्क-अधिकारी को सामान का पूरा परिमाण न बताने वाले अथवा सही जानकारी न देने वाले, अर्थात् अधिक शुल्क लगने वाला सामान बताने वाले व्यापारी से छिपाये गये सामान पर लगने वाले शुल्क का आठ गुना वसूल करना चाहिए। सद्य श्रोत्रियवर्ज्याणि शुल्कान्याहुः प्रजानता। गृहोपयोगि यच्चैषां न तु वाणिज्यकर्मणि॥ 14 ॥ धर्मशास्त्रकारों के अनुसार अपने घर के उपयोग में आने वाले सामान पर श्रोत्रिय ब्राह्मणों से कर नहीं वसूल करना चाहिए। हां, यदि उनके द्वारा लाया गया, सामान व्यापार के लिए है, तो शुल्क देय होता है। प्रतिग्रहो द्विजातीनां धनं रङ्गोपजीविनाम्। स्कन्धवाह्यं च यद् द्रव्यं न तद्युक्तं प्रदापयेद्॥ 15 ॥ दान दक्षिणा से प्राप्त ब्राह्मणों के धन के प्रचुर होने पर भी, नृत्य-गीत वाद्य आदि से आजीविका चलाने वालों के धन के मात्रा में अधिक होने पर भी तथा अपने कन्धों पर भार ढोने वाले श्रमिकों की आय के पर्याप्त होने पर भी उनसे कर नहीं वसूल करना चाहिए। कश्चिच्चेत् सञ्चरन्देशान् प्रेयादभ्यागतो वणिक्। राजास्य भाण्डं रक्षेत् यावद्दायाददर्शनम्॥ 16 ॥ व्यापार के लिए विदेश गये व्यापारी के अचानक परलोक सिधार जाने पर 154 / नारदस्मृति
उसके उत्तराधिकारी के उस देश में पहुंचने तक व्यापारी के माल की सुरक्षा का दायित्व उस देश के राजा का होता है। दायादेऽसति बन्धुभ्यो जातिभ्यो वा समर्पयेत्। तदभावे सुगुप्तं तद्धारयेद्दशतीः समाः ॥ 17 ॥ मृत व्यापारी के पुत्र के न आने पर मृतक का सामान उसके भागीदारों, जाति- बन्धुओं अथवा अधिकार सिद्ध करने वाले इष्टमित्रों को सौंपना चाहिए। मृतक के किसी भी उत्तराधिकारी द्वारा उसके सामान को लेने के लिए न आने पर राजा को दस वर्षों तक सामान को सुरक्षित रखने का दायित्व निभाना चाहिए। अस्वामिकमदायादं दशवर्षस्थितं ततः। राजा तदात्मसात् कुर्यादेवं धर्मो न हीयते ॥ 18 ॥ यदि मृतक के सामान का कोई भी दावेदार दस वर्षों के भीतर आकर अपना दावा प्रस्तुत नहीं करता, तो राजा को यह मान लेना चाहिए कि मृतक का कोई उत्तराधिकारी नहीं है। इस स्थिति में प्रशासन को वह सामान बेचकर प्राप्त धन राजकोष में जमा करा देना चाहिए। दस वर्षों के पश्चात् किसी दावेदार के आ जाने पर उस धन को लौटाना-न लौटाना राजा की इच्छा पर निर्भर करता है। निर्धारित अवधि के उपरान्त दावेदार केवल दया की याचना ही कर सकता है; क्योंकि समय-सीमा के बीत जाने के साथ उसका विधिसम्मत अधिकार भी समाप्त हो चुका होता है। ॥ चतुर्थ अध्याय का तृतीय प्रकरण समाप्त ॥ नारदस्मृति / 155
4. दत्ताप्रदानिकं प्रकरण
- दत्ताप्रदानिकं प्रकरण दत्त्वा द्रव्यमसम्प्यग् यः पुनरादातुमिच्छति। दत्ताप्रदानिकं नाम तद्विवादपदं स्मृतम्॥ 1 ॥ किसी अयोग्य व्यक्ति को योग्य समझकर दिये गये धन को उसकी अयोग्यता एवं अपात्रता के प्रकट हो जाने पर क्रोधावेश में वापस लेने का प्रयास 'दत्ताप्रदानिक' कहलाता है। इसे भी एक विवाद स्थल समझना चाहिए। अदेयमथ देयं च दत्तं चादत्तमेव च। व्यवहारेषु विज्ञेयो दानमार्गश्चतुर्विधः॥ 2 ॥ देना चार प्रकार होता है-अदेय, देय, दत्त और अदत्त। निषिद्ध वस्तु का देना अदेय, देने योग्य वस्तु का दान देय, देकर पुनः न लौटाना दत्त तथा एक बार देकर वापस मिल गया अदत्त कहलाता है। तत्रेहाष्टावदेयानि देयमेकविधं स्मृतम्। दत्तं सप्तविधं ज्ञेयमदत्तं षोडशात्मकम्॥ 3 ॥ स्मृतिकारों ने अदेय के आठ, देय का एक, दत्त के सात और अदत्त के सोलह प्रकार बताये हैं। अन्वाहितं याचितकमाधिः साधारणं च यत्। निक्षेपः पुत्रदारं च सर्वस्वं चान्वये सति॥ 4 ॥ परिवार रखने वाले, अर्थात् गृहस्थ के लिए अदेय होते हैं-1. अन्वाहिता- कठिनाई से जुटाया गया धन, 2. याचित, 3. आधि-धरोहर की वस्तु, 4. साधारण द्रव्य-खाने-पीने के काम में आने वाला, 5.निक्षेप, 6. स्त्री, 7. पुत्र तथा 8. सर्वस्व -घर के बरतन, वस्त्र आदि। आपत्स्वपि हि कृष्ट्रासु वर्त्तमानेन देहिना। अदेयान्याह्राचार्या यच्चान्यस्मै प्रतिश्रुतम्॥ 5 ॥ आचार्यों के अनुसार उपर्युक्त आठ प्रकार के धन घोर संकट के उपस्थित होने पर तथा देने का वचन देकर भी कभी नहीं देने चाहिए। कुटुम्बभरणाद् द्रव्यं यत्किञ्चिदतिरिच्यते। तद्देयमपहृत्यान्यत् कुटुम्बी दोषमाप्नुयात्॥ 6 ॥ परिवार का भरण पोषण करना परिवार के मुखिया का कर्तव्य कर्म है। 156 / नारदस्मृति
अतः परिवारजनों की आवश्यकता से अतिरिक्त अवशिष्ट धन ही देय होता है। परिवार के लोगों की आवश्यकता की उपेक्षा करके दिया गया दान 'अपहरण' कहलाता है और इसके लिए दानकर्ता पुण्य के स्थान पर पाप का भागी बनता है। यस्य त्रैवार्षिकं वित्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये। अधिकं वापि विद्येत स सोमं पातुमर्हति ॥ 7 ॥ तीन वर्षों तक अथवा उससे भी अधिक समय तक परिवार के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त धन रखने वाले गृहस्थ को ही यज्ञ-यागादि करने का अधिकार है। अभिप्राय यह है कि सोमपान करने व यज्ञ-यागादि के लिए प्रस्तुत होने से पूर्व गृहस्थ के लिए यह विचारणीय होता है कि क्या उसके पास तीन वर्षों तक परिवारजनों की सभी प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त धन विद्यमान है। यदि ऐसा नहीं, तो व्यक्ति को किसी बड़े यज्ञ को सम्पन्न करने के विषय में सोचने तक का अधिकार नहीं। परिवारजनों की उपेक्षा करके पुण्य कर्म करना सर्वथा अनुचित है। टिप्पणी- लगता है कि सोमपान किये जाने वाले बृहत् यज्ञ-यागादि की तैयारी में तथा उसे सम्पन्न करने में दो-तीन वर्ष लग जाते होंगे। इस अवधि में व्यक्ति इस प्रकार व्यस्त हो जाता होगा कि उसके लिए व्यापार-धन्धा करना और धन कमाना सम्भव ही नहीं रहता होगा। इसीलिए तीन वर्षों तक परिवार के भरण- पोषण की पूर्व-व्यवस्था करने का निर्देश दिया गया है। पण्यमूल्यं भृतिस्तुष्ट्यानां स्नेहात् प्रत्युपकारतः । स्त्रीभक्त्यानुग्रहार्थं च दत्तं सप्तविधं स्मृतम् ॥ 8 ॥ दत्त धन के निम्नोक्त सात प्रकार-भेद हैं- 1. पण्यमूल्य - ख़रीदे सामान का दाम चुकाना, 2. भृति-वेतन अथवा भत्ता, 3. तोष - किसी के कार्य पर प्रसन्न होकर उसे पुरस्कृत करना, 4. स्नेहसूचन - मित्र, बन्धु, प्रियजन के प्रति स्नेह- प्रदर्शन के रूप में उपहार देना, 5. प्रत्युपकार - किसी के उपकार के भार को हलका करने के लिए उसे भेंट के रूप में समर्पित करना, 6. विवाह आदि में शगुन के रूप में कन्या, भगिनी आदि को स्त्रीशुल्क के रूप में सौंपना तथा 7. अनुग्रह - किसी अभावग्रस्त की सहायता करना। इस प्रकार आज की भाषा में दान के निम्नोक्त सात प्रकार हैं- विनिमय, वेतन, पुरस्कार, उपहार, प्रत्युपकार, शुल्क तथा सहायता। अदत्तं तु भयक्रोधद्वेषशोककरुगन्वितैः । तथोत्कोचपरीहासव्यत्यासच्छलयोगतः ॥ 9 ॥ बालमूढास्वतन्त्रार्तमत्तोन्मत्तापवर्जितम् । कर्त्ता ममायं कर्मेति प्रतिलाभेच्छया च यत् ॥ 10 ॥ नारदस्मृति / 157