भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

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पृष्ठ 153
  1. सम्भूयसमुत्थान प्रकरण वणिक्प्रभृतयो यत्र कर्म सम्भूय कुर्वते। तत्सम्भूयसमुत्थानं व्यवहारपदं स्मृतम्॥ 1 ॥ जहां वणिक आदि एक साथ मिलकर व्यापार-धन्धा करते हैं, शास्त्रों में उस व्यावसायिक स्थल का नाम 'सम्भूयसमुत्थान' कहलाता है। फलहेतोरुपायेन कर्म सम्भूय कुर्वताम्। आधारभूतः प्रक्षेपस्तेनोत्तिष्ठेयुरंशतः ॥ 2 ॥ मिलकर साझा व्यापार-धन्धा करने वालों का एकमात्र उद्देश्य लाभ अर्जित करना होता है। अर्जित लाभ का कितना अंश किसको मिलना है, इस मूलतत्त्व के निर्धारण के लिए उनके द्वारा निवेशित धनराशि के अंश दान को ही आधार बनाया जाता है। जिस भागीदार ने जितना धन लगाया है, उसे उतने ही भाग में लाभ पाने का अधिकार है। उदाहरणार्थ, चार सहयोगियों ने मिलकर एक लाख रुपयों की मूलराशि से किसी उद्यम का प्रारम्भ किया। इसमें एक ने पचास हज़ार रुपयों का तथा दूसरे और तीसरे ने बीस बीस हज़ार रुपयों का और चतुर्थ ने केवल दस हज़ार रुपयों का योग दिया है। उनके इसी योगदान के आधार पर प्रथम का पचास प्रतिशत, द्वितीय-तृतीय का बीस-बीस प्रतिशत व चतुर्थ का दस प्रतिशत भाग माना जायेगा। समोऽतिरिक्तो हीनो वा तत्रांशो यस्य यादृशः। क्षयव्ययौ तदा वृद्धिस्तत्र तस्य तथाविधाः ॥ 3 ॥ भागीदारों का जैसा-बराबर बराबर अथवा न्यूनाधिक-भाग निर्धारित रहता है, ख़र्च तथा हानि आदि में उनसे उतनी ही कटौती की जाती है तथा लाभ में उन्हें उतना ही भुगतान किया जाता है। भाण्डपिण्डव्ययोद्धारभारसारान्ववेक्षणम् । कुर्युस्तेऽव्यभिचारेण समये स्वे व्यवस्थिताः ॥ 4 ॥ उद्यम से सम्बद्ध सामान की देखभाल के लिए, उसे विक्रय की दृष्टि से आकर्षक बनाने के लिए तथा उसके लिए गुणों को प्रचारित करने के लिए निम्नोक्त ख़र्च निर्विवाद रूप से देय होते हैं- नारदस्मृति / 151