नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 240, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंमृत्यु पर ही सिर मुंडवाया जाता था और इसे अप्रिय घटना ही माना जाता था। आज भी निष्ठावान् व्यक्तियों में यह प्रथा प्रचलित है।) 2. राजा द्वारा ऐसे नीच ब्राह्मण को अपने राज्य से निर्वासित कर देना। 3. उसके मस्तक पर कुक्कुट, भग आदि का स्थायी चिह्न गोद देना (जिससे वह लोगों के सामने जाने में अपने को अपमानित अनुभव करे और यदि विवेकशील है, तो आत्महत्या कर ले।) तथा 4. उसे गधे पर बिठाकर नगर में घुमाना। टिप्पणी—वस्तुतः ये चारों दण्ड ब्राह्मण को जीने के योग्य न रहने देने वाले हैं। कोई सर्वथा निर्लज्ज एवं मूर्ख ब्राह्मण ही सार्वजनिक रूप से इस प्रकार अपमानित होकर जीने की कामना करेगा। दूसरी ओर, इस उग्रता की इस रूप में सार्थकता है कि प्रचण्ड दण्ड के भय से कोई ब्राह्मण साहस करने का विचार ही नहीं करेगा। इस सन्दर्भ में यह भी विचारणीय हो जाता है कि समाज के पथ-प्रदर्शक ब्राह्मण से ऐसी अपेक्षा—दुष्कर्म में प्रवृत्त होना—करनी भी नहीं चाहिए। ब्राह्मण को तो सर्वाधिक एवं सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमान् तथा विवेकशील माना जाता है। अतः उसे पतन से बचाने के लिए किसी भी कठोर दण्ड का विधान सर्वथा समुचित ही माना जायेगा। स्यातां संव्यवहार्यौ तौ धृतदण्डौ तु पूर्वयोः। धृतदण्डोऽप्यसम्भाष्यो ज्ञेय उत्तमसाहसे ॥ 11 ॥ प्रथम और मध्यम स्तर के साहस में तो व्यक्ति दण्ड भुगतने और प्रायश्चित्त करने के उपरान्त लोक-व्यवहार करने योग्य हो जाता है, परन्तु उत्तम साहस में दण्डित होने के उपरान्त सम्भाषण करने योग्य, अर्थात् समाज में मुंह दिखाने योग्य नहीं रहता। ऐसे भयंकर एवं आततायी व्यक्ति से दूर रहने में ही लोग अपना हित समझते हैं। तस्यैव भेदः स्तेयं स्याद्विशेषस्तत्र दृश्यते। आधिः साहसमाक्रम्य स्तेयमाधिश्चलेन तु ॥ 12 ॥ उत्तम साहस का ही एक भेद स्तेय है, जिसके दो रूप हैं—स्तेय और आधि। छल कपट से अथवा लुक छिपकर, गुप्त रूप से दूसरे के द्रव्य-वैभव आदि का हरण 'स्तेय' है और बलपूर्वक दूसरे से उसकी सम्पत्ति—स्वर्ण, नक़दी, वस्तु अथवा अचल सम्पत्ति—भवन, खेत, भूखण्ड आदि को छीनना, व्यक्ति पर आक्रमण करके उसके स्वत्व पर अपना अधिकार जमा लेना 'आधि' कहलाता है। इसे आज की भाषा में 'डाका डालना' कहा जाता है। वस्तुतः यह आधि ही साहस है, स्तेय तो छल कपट से की गयी कायरतापूर्ण धूर्तता है। तदपि त्रिविधं प्रोक्तं द्रव्यापेक्षं मनीषिभिः। क्षुद्रमध्योत्तमानां तु द्रव्याणामपकर्षणात् ॥ 13 ॥ 238 / नारदस्मृति