निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
साहिब बन्दगी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)
निराले सद्गुरु 33
तो यह है कि आपको कई बार कुछ ख़बर ही नहीं होती है। आपको बताना पड़ता है कि आपने नाश्ता नहीं किया है।
आप शरीर की थकान को मंजूर नहीं करते हैं। एक वो भी समय था, जब आप छः-छः महीने तक सोते नहीं थे। पर तब आप इतना कठिन परिश्रम नहीं कर रहे थे। अब जब आपकी संगत दिनो दिन बढ़ रही है तो कई बार आपको 10-10, 12-12 दिन तक सोने का अवसर नहीं मिल पाता है। कभी आप बीच में दिन को आराम करने की सोचते हैं तो वो भी नहीं हो पाता है। ऐसे में आपका शरीर अत्यंत ही थका हुआ लगता है। पर आपके वजूद को कभी थका हुआ नहीं पाया जा सकता है। आपकी वाणी की वही लय रहती है। आपके सफ़रनामे को सुनकर हर कोई हैरान रह जायेगा। उसे मंजूर करना ही पड़ेगा कि आप इंसान नहीं हैं। यदि वो ऐसा नहीं कर रहा है तो यह उसकी भूल है। जैसा काम आप कर रहे हैं, कोई इंसान के बस की बात नहीं है। कोई भूत भी इतना काम नहीं कर सकता है। वो भी थक जायेगा, पर आप थकने वालों में से नहीं हैं। आपका शरीर भी तौबा करता होगा कि किसके पल्ले पड़ गया हूँ। जितना परिश्रम आप करते हैं, कोई नहीं कर सकता है। कई-कई बार आपको भोजन करने का समय भी नहीं मिलता है। जो कठिन परिश्रम आप करते हैं, आज के महात्मा तो आपके साथ दो दिन रहकर ही तौबा कर देगा। क्योंकि अपने हक़ की कमाई से खाने की बात तो सुनने को मिलती है, परिश्रम करने की बात भी मिलती है, पर जितना परिश्रम आप करते हैं, इतना परिश्रम करने की बात किसी संत के बारे में पढ़ने-सुनने को नहीं मिलती है। फिर उस बीच आपकी चाल भी इतनी तेज़ रहती है कि जो काम एक घण्टे में करने वाला होता है, आप आधे घण्टे में कर लेते हैं। फिर आपका अपनी संगत पर होल्ड भी बड़ा प्यारा है। एक सच्चे कमाण्डर की तरह आप सबको चलाते हैं। फिर खुद भी उस काम में जुट जाते हैं। जितने भी आश्रम हैं, उनके जितने भी काम हैं, उन सबकी ख़बर आपको ही लेनी है। यह काम कोई भी दो दिन
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करेगा तो बीमार पड़ जायेगा। पर आप हैं कि फिर सत्संग भी 5-5 करने हैं दिन में। आराम कब करना है, कोई ख़बर नहीं है।
सर्दी हो या गर्मी, बारिश हो या तूफान, पर आपको कभी किसी ने रुकते नहीं देखा, कभी आपका कोई सत्संग स्थगित नहीं हुआ। यदि कोई हुआ भी तो उसका कोई अन्य ही कारण रहा। फिर इतना ही नहीं, कभी आपको बुख़ार हुआ तो भी आपने सत्संग नहीं छोड़ा। 104° बुख़ार होने पर भी आप सत्संग में हाज़िर नज़र आए और मुस्कराते हुए नज़र आए।
फिर दिन में 4-5 सत्संग करने, जिनमें से हरेक डेढ़ से दो घण्टे तक होता है। यानी दिन-भर बोलते ही रहना है। बोलने में भी आप कभी नहीं थकते हैं। कोई प्रोफेसर, कोई अध्यापक इतना नहीं बोल पायेगा। फिर यह नहीं कि हफ्ते में एक छुट्टी। कोई भी छुट्टी नहीं है। हफ्ते की बात नहीं है, पूरे साल में एक भी छुट्टी नहीं। आराम की चिंता ही नहीं है। हर दिन काम करना ही है। दिन हो रात हो, लगे ही रहना है। चाहे कड़कती धूप हो या फिर कड़ाके की ठंड पड़ रही हो, आप नहीं रुकते हैं। तूफान आए या फिर बरसात हो रही हो, आपको रुकते नहीं देखा जा सकता है। आपकी गाड़ी सड़कों पर हर हाल में दौड़ती ही नज़र आयेगी। आपको सत्संग के लिए निकलना ही है, चाहे सब लोग मौसम के कारण घरों में छिपकर क्यों न बैठे हों।
....फिर सत्संग करके कभी-कभी राँजड़ी पहुँचते-2 रात के 12 या एक भी बज जाते हैं। और वहाँ भी समय नहीं होता है। वहाँ भी आपके इंतज़ार में कई श्रद्धालु अपनी समस्याओं को लेकर पहुँचे होते हैं और सुबह तक का इंतज़ार करने वाले नहीं होते हैं। आपको उनसे भी निबटना है, सबकी बात सुनकर फिर कभी 1 तो कभी 2 बजे आप आराम करने जाते हैं। अब वो आराम भी हमारे देखने के लिए है। सच तो यह है कि तब ही तो आप अपने अध्यात्म खेल शुरू करते हैं। तब
वो समय भी था............
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आपको अलौकिक दुनिया में जाकर वहाँ के लोगों को चेतन करना होता है।
सुबह पुनः 4 बजे उठकर आप नित्य-कर्म करके कठिन परिश्रम में लग जाते हैं और कभी बोर नहीं होते।
वो समय भी था....
एक समय वो भी आया जब बढ़ते हुए विरोध के डर के कारण आपको सबने छोड़ दिया। विरोध के कारण लोग अपने घर में फोटो रखने में भी डरने लगे, साहिब बंदगी बोलना भी छोड़ दिया। पर आपने हिम्मत नहीं हारी, अपनी लय बरकरार रखी। न ही आपने अपनी वाणी में बदलाव लाया, न ही किसी से डरे। आप दुनिया को समझाते रहे। सी.बी.आई., आई. बी. की जाँच हुई। जाँच में कुछ नहीं आया, सुप्रीम कोर्ट ने भी आपको सत्संग वगैरह की छूट दे दी। सुर्पीम कोर्ट ने कहा कि आप सच्चे महात्मा है, आपको बेकार में तंग किया गया, आप अपना काम आज़ादी से कीजिए। आप लगे रहे; सत्संग करते रहे। आपने पुनः संगत को जोड़ा।
एक ही धुन में रहते हैं आप
आप जो दिन-रात इतनी मेहनत कर रहे हैं, उसमें एक ही धुन नज़र आती है। आप जो इतने आश्रम बनवा रहे हैं, उसमें भी एक ही धुन दिखाई देती है। ज़ालिम दुनिया द्वारा इतने कष्ट सहते हुए भी आप उन्हें क्षमा कर रहे हैं तो उसमें भी एक ही धुन दिखाई पड़ती है। आप इस संसार में आए हैं तो उसमें भी वही एक धुन नज़र आती है। आपमें यही धुन है कि सत्संग द्वारा जितने हो सकें, उतने लोगों को समझा सत्य-भक्ति में लगाकर अमर लोक ले जाएँ। आप इसी धुन में रहते हैं।
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पैसे से आपको कोई मतलब नहीं है। आप किसी से कुछ नहीं माँगते हैं। यह काम आप एक भिखारी का मानते हैं। आप भोजन भी अपनी ही पैंशन से खाते हैं।
भोपाल में एक डॉ० साहब ने आपको 1 करोड़ दान में दिया। आपने उसे कोई शाबाशी नहीं दी, बल्कि यह कहा कि मेरा एहसान मानना कि मैंने ये पैसे आपसे लिए; फूल जाना कि आपने दिये। जिस काम के लिए आपने दिए, मैं उसी में लगाऊँगा।
आप जो आश्रम पर आश्रम बनवाते जा रहे हैं, उन सबके पीछे एक ही धुन है। आपको किसी आश्रम से कोई मतलब नहीं है। आप जगह-जगह आश्रम बनवाकर वहाँ के लोगों को बुलाना चाहते हैं कि आओ, सुनो हमें और सत्य-भक्ति को पाकर अपने देश को चलो। हर समय आप इसी धुन में रहते हैं। पर दुनिया के लोग काल की कष्टमय दुनिया में ही खो जाने से आपको आसानी से समझ नहीं पाते हैं और काल की ही भक्ति करके उससे मिल रहे कष्टों से छूटने का प्रयास करते रहते हैं। पर दुनिया आपको धीरे-धीरे समझेगी। वो काल से मिलने वाले कष्टों को भी समझेगी और आपकी शरण में आयेगी। यह होगा। यह ज़रूर होगा। आने वाला इंसान बुद्धिमान होगा। वो आपकी बात को समझेगा। उसे साहिब की बात समझ आयेगी। उसे समझना होगा।
आ जा रे…… आ जा रे…….आ जा रे॥
छोड़ दे सब तू काम जगत के, दर्श साहिब का पा ले रे।
सत्संग में तू आकर बंदे, रस अमृत को पा ले रे॥ आ जा रे…
काल की दुनिया भटक रहा तू, पग-पग कष्ट तू सहता रे।
साहिब लेने आए तुझको, समझ तू क्यों न पाए रे॥ आ जा रे….
भवसागर की धार कठिन है, बिन गुरु क्यों तू बहता रे।
शरण में आजा तू साहिब की, काहे जन्म गँवाये रे॥ आ जा रे…
अंत में ऐसे साथ देते हैं आप
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अंत में ऐसे साथ देते हैं आप
रिहाड़ी (जम्मू) में रहने वाला विद्यासागर जब आपके पास एक दिन राँजड़ी में आया तो आपने कहा कि अब चलने की तैयारी कर लो, समय आ गया है, अब सुरति साहिब में ही रखना। बस, फिर क्या था! जैसे ही वो दिन आया, उसे अंदर से इशारा हो गया कि आज चलना है। उसने अपनी पत्नी को बता दिया कि आज साहिब मुझे लेने आ रहे हैं। जब आपने उसकी सुरति को खींचना शुरू किया तो उसने अपना सिर पत्नी की गोद में रख लिया और सब हाल बताने लगा। वो बताने लगा कि ऐसे-ऐसे साहिब मुझे ले जा रहे हैं। अब एक स्थान पर निरंजन से सामना भी हुआ। वो बताने लगा कि अब निरंजन का साहिब से युद्ध हो रहा है। साहिब के हाथ में मेरे नाम की ज्योति है जिसे निरंजन बुझाए जा रहा है जबकि साहिब उसे बार-बार जलाए जा रहे हैं। उसने बताया कि घोर तूफान चल रहा है, जहाँ यह युद्ध चल रहा है। आधा घण्टा इस युद्ध का विवरण देने के बाद उसने बताया कि अब निरंजन हार गया है और साहिब मुझे जिताकर ले चले हैं। इतने में उसका शरीर से जो तार जुड़ा हुआ था, वो टूट गया और आप उसे अमर लोक ले गये।
जब भी किसी नामी का अंतिम समय आता है तो आप उसका ऐसे ही साथ देकर निरंजन से बचाकर अमर-लोक ले जाते हैं। जब भी कोई आपको पुकार करता है, आप पहुँच जाते हैं। यह पुकार तभी हो पाती है, यदि पूरा विश्वास हो। इसलिए आप केवल विश्वास की ही माँग करते हैं। नाम तो है ही है। जिसके पास नाम है, उसका निरंजन कुछ बिगाड़ नहीं सकता है। पर सद्गुरु के बिना अमर-लोक नहीं जाया जा सकता है। इसलिए सद्गुरु का भरोसा चाहिए। नाम पाने के बाद भी यदि भरोसा नहीं किया तो अटक जाते हैं। यदि सद्गुरु का पूरा भरोसा हो तो आप ऐसे ही साथ देते हैं।
करता जो परतीत आपकी, लाता चरणों प्रीत।
काल निरंजन रोक न पाता, चलता भवजल जीत ॥
सबके दुख को समझते हैं आप
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सबके दुख को समझते हैं आप
आपके पशु बड़े चेतन हैं। आपका मानना है कि आदमी तो फ़ालतू बोलता है, बेकार काम करता रहता है, कहीं तिनके तोड़ता है, कहीं कुछ, पर पशु नहीं। आप कहते हैं कि बच्चा क्यों रोता है, क्योंकि उसके पास भाषा नहीं है। वो अपने भाव रोकर व्यक्त करता है। सभी तो रोते हैं। क्यों? क्योंकि भाषा नहीं है।
आप अरनिया में सत्संग कर रहे थे तो एक भैंस चिल्ला रही थी। किसी ने ध्यान नहीं दिया। उसे तो धूप में बाँध रखा था। वो परेशान थी। वो कह रही थी कि मैं छाया में नहीं जा पा रही हूँ, मुझे बाँध रखा है। आपने एक सत्संगी को धूप में खड़ा किया। एक मिनट बाद पूछा कि कैसा लग रहा है? उसने कहा कि बहुत कष्ट है। आपने उसी को वहाँ भेजा; कहा कि उस भैंस को खोलकर छाया में बाँधो; चाहे जिसकी भी भैंस हो। फिर आपने देखा कि उसे प्यास भी लगी थी। तो आपने एक को कहा कि बाल्टी लेकर जाओ और उसे पानी पिलाओ।
दुनिया के लोग तो तेरा-मेरा कर रहे हैं। यही बात है कि दूसरे से घृणा कर रहे हैं। अपनापन नहीं दिखा रहे हैं। आपको हर प्राणी अपना लगता है। संपूर्ण विश्व अपना लगता है। ये केवल कहने में ही नहीं; यही सत्य है। आपको सबकी पीड़ा अपनी लगती है। आपने यह फैसला भी किया है कि जो गाएँ बेघर हैं, उन्हें भी इकट्ठा करके उनकी सेवा करूँगा; किसी को लगा दूँगा उनकी सेवा में; कहूँगा कि यही मेरी सेवा मानना।
एक गाय गुरुद्वारे में थी, पर वो उनकी सेवा नहीं कर पा रहे थे। गाय गजब की थी। वो 20 किलो दूध देती थी। किसी ने कहा कि साहिब-बंदगी वालों को दे दो। 1993 में उन्होंने उसे 17 हज़ार में दिया। पैसे तो ज़्यादा थे, पर गाय अच्छी थी। उसने तीन बछड़ियाँ दीं; वो भी बड़ी ही प्यारी थीं, माँ की तरह थीं। बड़ी होकर वो भी बहुत दूध देने
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लगीं। जब वो गाय बूढ़ी हो गयी तो गर्भनी हुई। तब उसे बैठने में भी तक़लीफ़ होती थी। जब बैठती तो उठने में तक़लीफ़ होती थी। आपके कुछ लोगों ने कहा कि इसे बेच देते हैं। आपने कहा-नहीं, यह तो पाप है, धोखा है। अभी यह बूढ़ी है; हमारा धर्म तो इसकी सेवा करना है।
आप राँजड़ी में ज़्यादा पशु नहीं रखना चाहते हैं; जगह कम है, इसलिए वही रखते हैं, जो ज़्यादा दूध देते हैं। क्योंकि वहाँ रोज़ कोई 40 किलो दूध लगता है। बहुत लोग आते हैं; सबके लिए चाय बनाना; जो वहाँ रहते हैं, उनके लिए चाय। ...तो गाय ओखी हो गयी, परेशान हो गयी। एक ने कहा कि इसे रखबंधु में भेज देते हैं, दूध कम दे रही है, 3-4 किलो ही दे रही है। आपने कहा-नहीं। साल-भर आपने कहीं नहीं ले जाने दिया। एक दिन एक ने कहा कि यहाँ पक्का फर्श है, इसलिए यह दुखी है; इसे रखबंधु ले जाता हूँ; वहाँ कच्चा फर्श है, वहाँ यह आराम से रहेगी, ठीक हो जायेगी। आप उसकी बात में आ गये। वो उसे ले गया और उसे नया कर दिया। आप वहाँ गये तो वो हाँप रही थी। आप कहते हैं कि किसी भी पशु को परेशान करके दूध पिया तो यह ठीक नहीं है, किसी काम का नहीं है। आपने उसे डाँटा। उसने कहा कि गलती हो गयी। ....तो उस गाय ने बच्चा दिया और फिर 24 किलो दूध दिया।
आप कहते हैं कि जब गाय का बछड़ा मर जाए तो वो दूध नहीं देती है। फिर उसे इंजेक्शन लगाकर दूध नहीं लेना। कुछ तो भैंस के बछड़े के लिए पहले से ही खड्ढा खोदकर रखते हैं, पर आप इसे बहुत पाप मानते हैं, समझाते हैं कि ऐसा कभी न करना।
आपके पशु भी आपसे बहुत प्रेम करते हैं। आप उन्हें भी सुरति देते हैं। वे चेतन हैं सभी। जिस समय आप पहुँचते हैं तो वे जान जाते हैं कि आप आ गये। जिस दिन आप समय पर उन्हें खाना नहीं देते हैं तो वे नाराज़गी भी दिखाते हैं। वे आपको आवाज़ देकर बुलाते भी हैं कि अभी समय हो गया है, हमें खाना दो। तो आपने एक से कह रखा है कि
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जब भी आवाज़ दें तो इन्हें खिला देना। जब एक दिन वो गया तो एक गाय पंखे की तरफ देखने लगी। वो कह रही थी कि चलाओ, हमें गर्मी लग रही है।
हित अनहित पशु पक्षिन जाना। मानव तन गुण ज्ञान निदाना ॥
इसलिए आप सभी में एक आत्मा देखते हैं, उनके दुख को भी समझते हैं।
एक ने आपको कहा कि मैं आपको दो भैंसे दान में देना चाहता हूँ। आपने पूछा कि तुम्हारे पास कितनी भैंसे हैं? उसने कहा-दो। आपने कहा कि फिर एक ही दो। उसने कहा कि एक भैंस के दो ही थन हैं, पर वो अच्छी है, दूध बहुत देती है। 3-4 महीने बाद बच्चा देगी।
आपने उसे अखनूर में रखा। 15 दिन में एक बार जब जाते तो टोकरी-भर रोटी खिलाते। वो आपसे बातें करती थी, अपने विचार रखती थी। जब कट्टा हुआ तो वो 10 किलो दूध देने लगी। भैंस का 1 किलो दूध गाय के 4 किलो दूध के बराबर होता है। कुछ समय बाद वो कम दूध देने लगी। उसकी देखभाल करने वाले बाबे ने कहा कि इसे ले जाओ; यह कभी दूध देती है, कभी नहीं। आपने कहा कि इसकी देखभाल करो अच्छी तरह। उसने कहा कि इसे राँजड़ी में भेज दो। पर जब उसे भेजने लगे तो वो जा ही नहीं रही थी। बड़ी मुश्किल से आपने उसे राँजड़ी भेजा। उसे पता था कि यहाँ सबकुछ अच्छा है, बड़ी सेवा होती है। वो आपसे सवाल कर रही थी कि इतने दिन दूध दिया, भूल गये। आपने कहा कि चिंता मत करो, वहाँ भी अच्छी सेवा होगी।
आपके पास एक आदमी आया; वो रो पड़ा, कहा कि यह तन आपका है, धन भी आपका है, मैं अपना कभी नहीं माना। आप कैसे हैं, यह भी मैं जानता हूँ। वो बोला कि आपके आश्रम के साथ मेरी ज़मीन है, उसे आपके लोगों ने कवर् किया है; जब मैंने कहा तो उन्होंने कहा कि हमारी है। उन्होंने फिर आपसे शिकायत की और आप नाराज़ हुए;
मच्छर तक को नहीं मारते हैं आप
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आपने कहा कि सब कुछ गुरु जी का है, तो यह क्या किया! फिर आश्रम के लोगों ने 4-5 मरले और ले लिये। वो समर्पित था, पर वो दुखी था। उसने कहा कि गाँव के लोग और मेरा भाई कहता है कि कैसा है तेरा साहिब! तू तो कहता है कि कभी गलत नहीं करते हैं, फिर यह क्या है! मैं उनके आगे बात नहीं कर पाता हूँ। आपने कहा कि यदि तुझे भरोसा है कि तुम्हारी है तो चुपके से परिवार से नक्शा ले आओ। वहाँ की ज़मीन सस्ती थी, कोई 10-12 हज़ार की होगी। आपने कहा कि तू नक्शा ले आ, यहाँ तक तेरी ज़मीन होगी, वहाँ तक एक मिनट में छोड़ दूँगा। यदि वहाँ तक कुल्ला भी आयेगा तो उसे भी तोड़ दूँगा। आप सावधान हैं कि कहीं किसी के साथ नाइंसाफ़ी न हो। किसी की सूई भी नहीं लेना चाहते हैं आप।
आप लगातार आश्रम बनाते जाते हैं, किसी से माँगते भी नहीं। कभी पैसे नहीं होते तो उधार लेते हैं, और उसे अपनी डायरी में लिख देते हैं। कई जो अपनी इच्छा से दे देते हैं, कहते हैं कि होंगे तो वापिस दे देना। तो भी आप उन्हें वापिस कर देते हैं। चाहे कितना भी समय क्यों न हो जाए, आप किसी का कुछ नहीं रखते हैं। किसी को भी किसी तरह से आप दुख नहीं देना चाहते हैं। इसलिए यदि कोई आपकी निंदा कर रहा है, वो निहायत ही गंदा, बदतमीज और जानवर से भी नीचे होगा, जिसे कुछ भी सूझता नहीं है।
मच्छर तक को नहीं मारते हैं आप
जब मच्छर काटते हैं तो आप उन्हें मारना नहीं चाहते हैं। आप उन्हें मारना भी पाप ही मान रहे हैं। आपका मानना है कि इन्हें भी तो अपनी ख़ुराक चाहिए। पर ऐसा भी नहीं है कि आप मच्छरों के काटने के लिए अपने शरीर को रख दें। आप मच्छरदानी लगा लेते हैं या पंखा चला लेते हैं, पर कभी उन्हें मारते नहीं हैं। यदि कोई ज़्यादा तंग करे तो
आपके आगे मन का ज़ोर नहीं चलता है
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हाथ से या कपड़े से ज़मीन पर फेंक देते हैं, जिससे वो बेहोश हो जाता है और बाद में उड़कर चला जाता है। मच्छर ही नहीं, हरेक जीव के प्रति आप दया की भावना रखते हैं, उन्हें कोई भी कष्ट पहुँचाना नहीं चाहते हैं।
आपके आगे मन का ज़ोर नहीं चलता है
शरीर में रहकर आत्मिक व्यवहार करना बड़ा कठिन है। पर आप यह भी कर लेते हैं। एक समय था जब आप कभी भोजन नहीं खाते थे। मन कहता था कि खाओ, नहीं तो कमज़ोर हो जाओगे। आप कहते थे कि आत्मा कभी कमज़ोर होती है क्या! ओ मूर्ख मन! आत्मा को भोजन से क्या लेना! आप नहीं खाते थे। एक आदमी खा रहा था तो आपने सोचा कि इसे भी ज्ञान देता हूँ। आपने कहा कि यह तुम नहीं खा रहे हो, कोई और खा रहा है। तुझे इसकी कोई ज़रूरत नहीं है। वो बड़ी ज़ोर से हँसा। वो बोला कि यह पागल हो गया है। आपने सोचा, अरे! गहराई में दुनिया वालों से बात नहीं करनी है।
आप इस शरीर में रहकर भी अपने में रहते हैं। एक ने आपका पाँव उठाया, कहा कि कितने गंदे हो; देखो, कितनी मैल जमी हुई है। यानी आप अपने शरीर को देखते भी नहीं थे। आप किसी से बात भी नहीं करते थे। पर शरीर में रहकर आत्मा का धर्म पालन करना बड़ा कठिन है।
आत्मा शरीर से छूटकर अमर-लोक गयी तो ठीक है। पर आपने शरीर में रहकर शरीर का धर्म पालन नहीं किया। स्वाँस भी नहीं लेते थे आप। एक पल भी नहीं सोते थे। सोना-जागना तो मन की वृत्ति है।
आपको मन भटका ही कैसे सकता है! यह किसी को भी भ्रमित कर देता है। जो भी इस संसार में आया, उसे भ्रमित कर देता है। धर्मदास जी को परम-पुरुष ने ही संसार में भेजा था ताकि जीवों का कल्याण हो। पर धर्मदास जी को भी काल ने अपने जाल में फँसा लिया। वे
प्रोफेसर बोला-आप साधारण नहीं हैं
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काल की ही भक्ति करने लगे और परम पुरुष को भूल गये। धर्म दास जी कबीर साहिब से बाद में जुड़े, कहने का भाव है कि मन किसी को भी भुला देता है, अपने में उलझा देता है। पर यह केवल आपसे ही डरता है। आपके आगे इसका ज़ोर नहीं चल पाता है। जब तक कबीर साहिब रहते हैं, तब तक संत-मत चलता है। बाद में यह लुप्त क्यों हो जाता है? इसका यही कारण है कि काल बाद में उलझा देता है। जब तक कबीर साहिब यानी आप संसार में रहते हैं तब तक यह मुरझाया रहता है, तब कुछ नहीं कर पाता है। कोई-कोई संत ही आपकी कृपा से इससे बचकर रह पाता है। अन्य उनके बाद में आने वाले फिर भूलते जाते हैं और संत मत लुप्त हो जाता है।
प्रोफेसर बोला-आप साधारण नहीं हैं
आप ट्रेन में यात्रा के दौरान अपने साथ जो होता है, उसे कह देते हैं कि किसी को मेरा परिचय नहीं देना है। क्योंकि आप बोलते ही रहते हैं। तो ट्रेन में आपको आराम का मौका मिल जाता है। वहाँ आप बुद्धू बनकर बैठ जाते हैं। यदि कोई कहे कि भारत के प्रधानमंत्री गुलामनबी जी हैं तो भी चुप रहते हैं, यह नहीं कहते हैं कि मनमोहन जी हैं। जानते हैं कि यदि बात की तो सिलसिला शुरू हो जायेगा।
एक बार एक प्रोफेसर आपके पास की सीट में था। उसने आपसे हठपूर्वक परिचय किया। आपने पिण्डा छुड़ाने के लिए कहा कि फौजी हूँ। यह झूठ भी नहीं है। वो बोला कि फौजी होंगे, पर आप कुछ हैं। आपने कहा कि मैं साधारण हूँ। प्रोफेसर मामूली नहीं था। वो विश्वविद्यालय में पढ़ाता था। वो बोला कि आप कोई महापुरुष हैं। आपने कहा कि आप कैसे कह सकते हैं? वो बोला कि कल से बैठे हो, न कुछ खाया, न बात की। हम दो-2 मिनट बाद उतरकर कुछ खा रहे हैं। फिर आप ध्यान में भी बैठे। ट्रेन हिल रही है, पर आपको तो जैसे कुछ ख़बर ही नहीं थी।
गहरी सुरति देनी पड़ी आपको
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आप साधारण नहीं हैं। हम इधर-उधर लड़कियों की तरफ भी देख लेते हैं; ध्यान चला जाता है। पर आप हैं कि इतना कण्ट्रोल है कि इधर-उधर देखने वाली बात ही नहीं है। आपका कण्ट्रोल भी साधारण नहीं है। आप बड़े एकाग्र हैं; आप सौम्य हैं; आप बड़े गंभीर हैं। वो मनोविज्ञान का ही प्रोफेसर था। फिर उसने अपना परिचय भी दिया। आपसे कहा कि आप बोलना क्यों नहीं चाह रहे हो? मुझे अपना परिचय दो। तब आपने उसे अपना परिचय दिया और न बोलने का कारण भी बताया। फिर उसने आपका पता लिया।
मानव बस की बात नहीं है, रहते जैसे आप। या तो महापुरुष हो कोई, या फिर हो करतार। मैं देखा, तुम नहीं साधारण है तुममे कुछ खास। कहो भेद कौन हो तुम? कहाँ तुम्हारा बास? बोले साहिब मैं साधारण, मानव मेरी जाति। राँजड़ी गाँव करूँ बसेरा, जीता जीवन साध॥
गहरी सुरति देनी पड़ी आपको
लोग आपको बहुत परेशान करते हैं। एक स्त्री के पति को लकुआ मार गया था। वो कहने लगी कि पूरे रिश्तेदार तंग करते हैं, जीने
ठीक चौबीस घण्टे बाद वो हिला
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नहीं देते, कहते हैं कि साहिब बंदगी में चली गयी है इसलिए यह हुआ। वो बंदा नामी नहीं था। पर स्त्री 24 साल से किसी और पंथ की नामी थी। बाद में साहिब जी से नाम लिया। आपने समझाया कि यह तो शरीर की बीमारी है; तू उनकी बात नहीं सुन। वो बोली कि बोल नहीं रहे हैं, कॉमा में चले गये हैं। यदि मर गये तो मैं आपके पास नहीं आ पाऊँगी। आप कह सकते थे कि मत आना। पर आप ऐसा नहीं कहते; आप सबके दुख को समझते हैं। आपने कहा कि घबराना मत, धीरे-धीरे होश में आयेगा। आपको तब मजबूरी में उसे गहरी सुरति देनी पड़ी। कुछ समय बाद वो होश में आ गया।
उसे आई.सी.यू. में रखा हुआ था। वो डॉ० लोग तो बुद्धू बनाकर वहाँ आक्सीज़न पर रख देते हैं, कहते हैं कि जिंदा है। मोटी रक़म जो लेनी है।
तो आपकी कृपा से वो धीरे-धीरे बिलकुल ठीक हो गया। ऐसे ही कइयों को आपने कॉमा से वापिस लाकर जीवन प्रदान किया। आप इन चीज़ों में ज़्यादा उलझना नहीं चाहते हैं, पर आपको लोग मजबूर कर देते हैं। आप अपना ध्यान सत्संग में लगाना चाहते हैं, दुनिया को समझाने में लगाना चाहते हैं। पर आपको लोग अपने स्वार्थों में खींच लेते हैं; आपका ध्यान वहाँ पर लगा देते हैं।
ठीक चौबीस घण्टे बाद वो हिला
एक बच्चे ने नींद की गोली खा ली। लोग ज़ालिम हैं, माँ को कहने लगे कि देखते हैं कि तेरे बेटे को साहिब अब कैसे बचाता है ! यदि अपना कोई मर जाए तो यह नहीं कहते हैं कि मेरे भगवान ने नहीं बचाया। ये घटनाएँ तो सबके साथ होती रहती हैं। लोग मरते रहते हैं, बीमार होते रहते हैं, घटनाएँ होती रहती हैं। इस नश्वर संसार में कोई अमर तो हो नहीं सकता है। शरीर है तो रोग भी आयेंगे और इसने नष्ट भी होना ही है और मौत का कोई भरोसा भी नहीं है, कभी
बहुत कोमल हृदय है आपका
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भी आ सकती है। तब किसी का भगवान नहीं बचाता है। कोई नहीं कहता है कि मेरे भगवान ने रक्षा नहीं की। पर साहिब-बंदगी वाला कोई बीमार हो गया तो कहते हैं कि देखते हैं कि कैसे बचाता है साहिब!
सच तो यह है कि आप तो अपने बंदों को मौत के मुँह से निकालकर भी बचा लेते हैं, पर उनका भगवान नहीं बचा पाता है। क्योंकि सद्गुरु की महिमा तो परमात्मा से भी बड़ी है।
तो उस माई ने कहा-साहिब जी! आप कृपा करना। आपने कहा कि चिंता मत कर, 24 घण्टे बाद यह होश में आयेगा। आप किसी को आशीर्वाद भी नहीं देते हैं। ठीक 24 घण्टे बाद वो हिला।
बहुत कोमल हृदय है आपका
स्वभाव की दृष्टि से देखा जाए तो आप जैसा स्वभाव किसी का मिल नहीं पायेगा। बाहर से आप भले ही कभी कठोर दिखें, पर भीतर से आप अत्यंत ही कोमल हृदय के हैं। शिष्यों के दोषों को निकालने के लिए आप बाहर से कुम्हार की तरह शब्द की चोट-पर-चोट करते हैं, पर ऐसे समय में भीतर से उसे अपनी सुरति का सहारा दे देते हैं। जैसे माँ बच्चे को डाँट तो देती है, मार भी देती है; पर मारने के बाद जब उसे पता चलता है कि गलती से ज़्यादा मार दिया है या बच्चा दुखी हो गया है तो उसे प्यार भी करती है। ऐसे ही आप भी करते हैं। आपको प्यार निभाना अच्छा आता है। आप जैसे कोई निभा नहीं सकता है। जिसकी आपसे नहीं निभ सकती, उसकी किसी और से निभ नहीं सकती है। क्योंकि आपके जैसे कोमल हृदय कोई होगा ही नहीं, क्योंकि आपके जैसा सबमें आत्मा को देखकर व्यवहार करने वाला कोई होगा ही नहीं।
आपकी वाणी बड़ी ही प्यारी है
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आपकी वाणी ही बड़ी प्यारी है
एक बार आप मिजोरम में थे तो एक मेजर ने आपको भजन गाते सुन लिया। वो कहने लगा कि आप रोज़ गाया करें; आपकी वाणी बड़ी प्यारी है। लोग आपको फ़ोन करते हैं तो छोड़ते नहीं हैं। आपको पिण्डा छुड़ाने के लिए कहना पड़ता है कि सुरति रखना, अच्छा, साहिब-बंदगी। सत्य है कि आपकी वाणी ही ऐसी है कि कोई कितना भी आपके सत्संग सुने, बोर नहीं हो सकता है।
आपकी आँखें भी सबसे निराली हैं
यदि कोई आपके दर्शन करना चाहता है तो उसे आँखों में ही देखना है। यदि नज़र नहीं मिले तो समझो कि दर्शन नहीं हुए।
यदि कोई कहे कि वो आपकी तस्वीर बना सकता है तो यह बिलकुल झूठ होगा। क्योंकि कोई भी आपकी पूर्ण तस्वीर नहीं बना सकता है। सब कुछ बन सकता है पर आँखें कोई नहीं बना पायेगा। क्योंकि आँखों के बीच में ही आपका वास होता है।
यह शरीर तो केवल समझाने के लिए आपने लिया है। सच यह है कि आप माँ के पेट से आए ही नहीं। यह परम सत्य है। पर जो अद्भुत बुद्धिमान लोग हैं, वे ही इस सच्चाई को समझ सकते हैं। वैसे तो आपके केवल क्रिया-कलापों को देखकर ही कोई समझ सकता है कि आप मानव नहीं हो सकते हैं। फिर नाम पाकर यह शंका भी अवश्य ही मिट जाती है। यह बात दो तरह से जानी जा सकती है। या तो कोई आपके क्रिया-कलापों, आपके व्यवहार, आपके ज्ञान को देखकर समझ सकता है या फिर कोई नाम लेकर खोजी बन जाए तो वो समझ जायेगा।
परम पुरुष ने काल-पुरुष की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे बहुत लंबे समय तक तीन लोक का राज्य करने का जो शब्द दिया वो न कटे,
महात्मा लोग भी समझ रहे हैं आपको
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इस कारण सभी हंसों को एक साथ न लेकर युक्ति-युक्ति द्वारा उन्हें सतलोक ले जाने के लिए वह परम सत्ता जीवों को लेने आया करती है। इसी सत्ता को कबीर साहिब के रूप में भी आना पड़ा था। यह एक परम सत्य है। पर इस रहस्य को कोई बिरला ही समझ पाता है।
...तो आँखों में चूंकि आपका वास रहता है, इसलिए आँखें कोई नहीं बना सकता है। इसलिए बंदगी के समय भी आपसे आँखें ही मिलाई जाती हैं। इसलिए-
नज़र मिलाना आओ जब-जब, वो ही मिलन द्वारा है।
आँखों में ही बैठ यह साहिब, चुन-चुन हंसन तारा है॥
महात्मा लोग भी समझ रहे हैं आपको
आपकी वाणी की नक़ल भी हो चुकी है। बड़े-2 पंथों के महात्मा आपकी वाणी को तोड़-मरोड़कर कह रहे हैं। यदि उनके सन् 2000 से पहले वाले सत्संग सुनें जाएँ तो उनकी वाणी में, उनके विचारों में, उनकी फ़िलासफ़ी में बहुत अंतर मिल जायेगा। जबकि एक सच्चे महात्मा की वाणी कभी बदलती नहीं है। बदलेगी तो तभी जब उसमें कमी होगी, उसे अपनी वाणी पर संदेह होगा, आत्म-अनुभव नहीं होगा। जो आँखों देखी बात करता है, वो जो आज कहेगा, 50 साल बाद भी वही कहेगा। तो आपके ज्ञान, आपकी वाणी को सुनकर महात्मा लोगों को पता चलने लग गया है कि आप क्या चीज़ हैं। कुछ महात्मा आपसे नाम की दीक्षा भी चाहते हैं कुछ महात्मा आप से छुपके से दीक्षा ले चुके हैं और शिष्यों को भी दिलाना चाहते हैं ताकि वे खुद भी संसार-सागर से पार हो सकें और उनके शिष्य भी। यह बात कठिन ज़रूर लगेगी, पर परम-सत्य है। सबकी यह बात आप मंजूर नहीं करते हैं। इसका कारण आप ही जानते हैं।
निराले सद्गुरु 49
संत अभिलाष दास जी ने कई पुस्तकें लिखी हैं, भारतवर्ष में मशहूर हैं। कबीर पंथी होने के कारण उन्होंने साहिब की वाणियों की टीका भी किया है। जब एक बार उन्होंने आपके प्रवचन सुने तो बड़े प्रभावित हुए। कबीर साहिब की वाणी का बहुत ज्ञान होने के कारण शायद उन्हें महसूस हो गया कि कबीर साहिब अपना दिया हुआ शब्द पूरा करने के लिए आ गये हैं। उन्होंने आपको अपना आश्रम ही दे दिया, कहा कि आप ही इसे संभालो। फिर कुछ समय बाद आपके दर्शन करने राँजड़ी में आए और आपको दो और आश्रम दे दिये।
एक माहत्मा का दूसरे महात्मा को समर्पण करना कोई आसान काम नहीं है। उसने पहले आपको बहुत परखा, तभी धीरे-2 सर्वस्व आपको समर्पित करते जा रहे हैं।
एक बार जब वो राँजड़ी में आपके दर्शनों को आए तो कहा कि घूमने जाना है। आपने आश्रम की गाड़ी दी; एक ड्राइवर भी दिया। उनके शिष्य भी साथ थे। आपके कार्य को देखकर अपने शिष्यों से बोले कि देखो, कैसे सेनापति की तरह कार्य चल रहा है! तब उन्होंने आपके चरणों की ओर देख मन-ही-मन बंदगी की ओर चल पड़े। जब वापिस आने लगे तो शिष्यों ने कहा कि हम वापिस राँजड़ी नहीं जायेंगे.... बहुत थक गये हैं। महात्मा जी के मुख से निकला कि गुरु जी का शब्द है कि मिलते जाना, इसलिए मैं उनका शब्द नहीं काट सकता; आप जाओ। वो महात्मा अकेले आए। क्योंकि वो आपको कुछ-कुछ समझ चुके थे कि आप संत नहीं बल्कि संतों की खान बनकर धरती पर आ गये हैं।
साहिब शब्द न काटिहौं, बोले संत अभिलाष।
बोले संत अभिलाष, हे शिष्यो! तुम जाओ;
हम तो रहेंगे, कुछ दिन साहिब पास ॥
दर्शन तो हम पायेंगे, न चाहें कोई साथ।
साहिब कबीर धरती पर उतर आए है
50 साहिब बन्दगी
पहुँचे राँजड़ी, कीने दर्शन आप,
मन ही मन प्रणाम कर, दीये आश्रम वार ॥
साहिब शब्द न काटिहौं, बोले संत अभिलाष ॥
साहिब कबीर धरती पर उतर आए हैं
दुनिया के अंदर बड़े-२ विद्वान हैं, पर आपकी यह विशेषता है कि जो भी कहते हैं, उसका असर पड़ता है। क्योंकि आप जो भी कहते हैं, पहले स्वयं अनुकरण करते हैं।
एक दिन एक ने आपसे फ़ोन पर कहा कि अध्यात्म की जितनी गहराई में आप बात करते हैं, कोई नहीं करता है। जो आप बातें कहते हैं, वो आपकी अपनी अनुभूति है या फिर वंचक ज्ञान है? आपने उससे कहा कि तुम्हारी अनुभूति क्या कह रही है? आपने कहा कि मैं जो भी बोल रहा हूँ, सब अनुभूतियाँ हैं।
इस तरह बड़े -२ प्रवक्ता हैं, कहते हैं, पर खुद नहीं करते हैं। मुम्बई में जब शांति-सम्मेलन हुआ था तो बड़े-२ धर्म प्रवक्ता इकट्ठा हुए थे। वो मामूली धर्म-सम्मेलन नहीं था। दलाईलामा जी, शंकराचार्य जी, और भी धर्मों के बड़े-२ सभी आए थे। सबने बोला। आपकी भी बारी आई। सब कागज़ पर लिखकर लाए थे कि क्या बोलना है। पर आप दिमाग़ से बोलते ही नहीं हैं, पढ़ी-लिखी बातें बोलते नहीं हैं। आप तो हृदय से बोलते हैं, और जो भी हृदय से बात होती है, उसका असर पड़ता है।
तो बड़े-२ बुद्धिजीवी बात कर रहे थे विश्वशांति की। कोई कुछ कह रहा था तो कोई कुछ। आपने अपनी बात कही। बाद में वहाँ के व्यवस्थापक जी ने अपने विचार रखे। उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने कहा कि मधु परमहंस जी की बात सुनकर ऐसा लगा मानो कबीर धरती पर उतर आया है।
इसलिए शरीर धारण करना पड़ता है परम पुरुष को
निराले सद्गुरु \hfill 51
यानी उसे इतने सारे धार्मिक अगुआ लोगों में से आप ही में साहिब का नूर नज़र आया; आपमें ही उन्हें संत मत की झलक दिखाई दी; आपमें ही उन्हें साहिब की शिक्षा की सही तस्वीर दिखाई पड़ी। यदि गहराई में विचार किया जाए तो पता चलेगा कि यदि सद्गुरु उस परम-पुरुष का दर्पण हैं तो आप उस दर्पण के भी दर्पण हैं। आपमें ही एक सद्गुरु की झलक मिल सकती है; आप ही में एक सच्चे संत की झलक मिल सकती है।
देख तुम्हें लगता सबको,
है धरा पर उतर कबीर आया।
वो कबीर
जो
काया से दूर,
जिसका न कोई मात पिता,
आत्म में झलके
जिसका नूर,
अमर लोक का है जो स्वामी,
अपने हंसों की ख़ातिर
जो
ले अवतार युग-युग आया।
आज फिर,
अपने हंसों को लेने
उतर धरा पर कबीर आया॥
इसलिए शरीर धारण करना पड़ता है परम पुरुष को
सत्य पुरुष युग-युग इस संसार में जीवों के कल्याण के लिए आते हैं। एक समय आप बिना शरीर धारण किए ही गुप्त रूप से दुनिया को
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अमर लोक की बात समझाने लगे। जिसे भी समझाने की कोशिश करते, वो ही डर जाता, सोचता कि न जाने यह कौन है ! और न ही कोई आपकी बात पर विश्वास करता। इसलिए मजबूर होकर परम पुरुष को शरीर रूप में प्रगट होकर समझाना पड़ता है या किसी निर्मल शरीर को धारण करके फिर समझाना पड़ता है। पर आप माँ के पेट से शरीर लेकर नहीं आते बल्कि कोई ऐसा शरीर, जो निर्मल हो, उसे एक ठिकाने पर लगाकर उसके शरीर को दुनिया को समझाने की ख़ातिर धारण कर लेते हैं और फिर आप संतों का सृजन करते हैं ताकि जब आप उस शरीर को छोड़ दें तो उन संतों के शरीर में बैठकर फिर आप अमर लोक का संदेश संसार को देते रहें। यही कारण है कि संत और आपमें कोई भेद नहीं रह जाता है। आप उन्हीं में समाए होते हैं। आगे चलकर जब किसी के बेटे उनकी गद्दी पर आ जाते हैं भाव पिता के बाद बेटे को गद्दी मिलती है, या खून के रिशते में गद्दी दी जाती है तो संत मत लुप्त हो जाता है और निरंजन बीच में आ जाता है। बाहर से अमर लोक होता है, पर अन्दर से काल निरंजन। इसके लिए साहिब जी ने कहा-
बीज बुन्दु नहीं चले गुरवाई।
नाद बिन्द से चले गुरवाई॥
इसलिए जब-जब ये स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं तो सत्य पुरुष को पुनः स्वयं कोई शरीर ढूँढ़ना पड़ता है, जिसमें रह रही आत्मा को उसके निजधाम पहुँचा कर आप उसमें आ सकें।
जब आप संसार के जीवों को सद्गुरु की महिमा बताते हैं, उन्हें परम-पुरुष का ही रूप बताकर उनकी भक्ति करने को कहते हैं तो दुनिया कहती है कि एक इंसान की भक्ति करने को कह रहे हैं। पर इस रहस्य को कोई भी समझ नहीं पाता है। आप सद्गुरु को परम-पुरुष से यानी अपने से भी बड़ा इसलिए कहते हैं, क्योंकि आप ऐसे अपने सही