निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २४५ ) ६ अ० ३ पा० २ खं० ‘प्रधन’ इति संग्रामनाम । प्रकीर्णानि अस्मिन् धनानि भवन्ति ॥ ‘द्रुघणः’द्रुममयोघनः। तत्र इतिहासम्-आचक्षते मुद्गलो भार्म्यश्व ऋषि वृषभं च द्रुघणं च युक्त्वा संग्रामे व्यवहृत्य आजिं जिगाय ॥ तदभिवादिनी एषा ऋग् भवति ॥२(२३) ॥ अर्थ- “न्यक्रन्दयन्नुपयन्तएनम्” इसकी पृथक् २ पदों के रूप में व्याख्या होचुकी किन्तु एक वाक्य के रूप में यह व्याख्या है— मन्त्र को देखने वाला ऋषि कहता है—मुद्गल ऋषि मे किसी ने पूछा कि— तुमने बैल से इस राजा को कैसे जीता ऋषि ने उत्तर दिया कि— सुनो । — शत्रुओं ने ‘उपयन्तः पास जा जा कर ‘आजे’ (संग्रामस्य) संग्राम के ‘मध्ये’, मध्य में वर्त्तमान ‘एनम्’ इस ‘वृषभम्’ बैल को ‘न्यक्रन्दयन्’ थका- ना चाहा = दम उखाड़ना चाहा = ऐसा यत्न किया कि यह निष्क्रन्दन करे = हार कर बा बां करे और [ अपनी थकावट मिटाने के लिये-]‘अस्नेहयन्’इसे गोबर कराने का यत्न किया बीच में युद्ध बन्ध करके उसे अवकाश दिया कि- यह गोबर करके ( क्यों कि बैलों का ऐसा स्वभाव होता है कि— वे निचले खड़े होकर गोबर करते हैं) [किन्तु उनके दोनों यत्न निष्फल हुये, और अन्त में] ( अहम् ) मैंने ‘तेन’ उन पूर्वोक्त गुणों वाले ‘मुद्गलः’ मुद्गल इस बैल से ‘सूमर्ध’ (राजानम् ) सूमर्ध राजा से ‘ गवां’ ‘शतवत्-सहस्रम्’ गायों का एक लक्ष ‘जिगाय’ जीता ॥