भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1012

हिन्दी निरुक्त ( २५६ ) ६ अ० ३पा० ३ खं० 'आजि' क्या ? संग्राम । क्यों ? वह आजयन होता है- उसमें दुर्बल को सबल जीत लेता है । अथवा आजवन है- एक पर एक वेग से जाता है । 'सुभर्व' क्या ? राजा । अथवा 'भक्ष' ( भ्वा० प० ) धातु भक्षण अर्थ में है, उसी से यह 'सुभर्व' है । क्या 'सुन्दर भक्ष्य = भाग्य वाला देश इसका है, इससे यह 'सुभर्व' है । 'प्रधन' यह संग्राम का नाम है, क्यों कि- इसमें प्रकीर्ण (बिखरे हुये) धन होते हैं । 'द्रुघण' (१०) क्या ? द्रुममय घन- काठ का बना हुआ यन्त्र 'द्रु' शब्द से पूर्व भाग और 'घन' शब्द से दूसरा भाग है उस 'द्रुघण' के सम्बन्ध में इतिहास कहते हैं- मुद्गल भृम्यश्व के पुत्र ऋषि ने वृषभ = बैलको और द्रुघण को जोड़ कर संग्राम में युद्ध करके आजि (संग्राम की बाजी को जीता। उसी इतिहास को कहने वाली यह ऋचा है ॥२(२३)॥ व्याख्या “न्यक्रन्दयन्०” मन्त्र में जो मुद्गल ऋषिका सुभर्व राजा के ऊपर बैल के द्वारा विजय कहा गया है, उसी के सदृश बाल्मीकीय रामायण में वसिष्ठ की कामधेनु का विश्वामित्र के साथ युद्ध का वर्णन भी मिलता है। ऐसे अर्थोंमें पुराणोंऔर वेदोंका कैसा अच्छा संवाद है, यह ध्यानमें देनेयोग्य है॥२(२३)॥ ( खं ३ ) निरु०- “इमं तं पश्य वृषभस्य युञ्जङ्काष्ठाया मध्ये द्रुघणं शयानम् । येन जिगाय शतवत्सहस्रं गवां मुद्गलः पृतनाज्येषु ॥” [ऋ०सं०८,५,२१,४]॥