भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1013

हिन्दी निरुक्त ( २४७ ) ६ अ० ३ पा० ३ खं० इमं तं पश्य वृषभस्य सहयुजं काष्ठाया मध्ये द्रुघणं शयानं, येन जिगाय शतवत् सहस्रं गवां मुद्गलः पृतनाज्येषु।'पृतनाज्यम्' इति संग्रामनाम पृतनानाम्- अजनाद् वा । जयनाद् वा,। 'मुद्गलः' मुद्गवान् । मुद्गिलोवा। मदनं गिलति इतिवा। मदंगिलो वा । मुदं गिलोवा । 'भार्म्यश्वः' भृम्यश्वस्य पुत्रः । 'भृम्यश्वः' भृमयोऽस्य अश्वाः। अश्वभरणाद्वा॥ 'पितुः' इति अन्ननाम । पातेर्वा । पिवतेर्वा । प्यायतेर्वा । तस्य एषा भवति ॥३ [२४] ॥ अर्थ:- "इमं तम्०" युद्ध के समाप्त होते ही, जब कि- वृषभ के साथ गाड़ी में जुता हुआ ही द्रुघण था, किसी ने मुद्गल ऋषि से पूछा कि- तुमने किस की सहायता से राजा को जीता ? मुद्गल ने द्रुघण की ओर हाथ करके कहा कि- "इमं तं पश्य०" तू देख- उस इस बैल के साथ संयुक्त 'काष्ठा' गाड़ी के मध्यमें जुतेहुये या युद्धकेमध्यमेंभिड़े हुये द्रुघण को, जिससे मैं मुद्गल ने एक लाख गौएं युद्धों में जीती हैं। 'पूतनाज्य' यह संग्राम का नाम है । क्यों ? पृतनाओं के अजन (गमन) करने से । क्यों कि- उसमें पृतनायें या सेनायें गमन करती हैं। अथवा पृतनाओं के जय करने से यह पूत-