भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1014

हिन्दी निरुक्त ( २४८ ) ६ अ० ३ पा० ४ खं० नाज्य है । क्यों कि- उसमें एक पक्षी की सेनायें दूसरे पक्ष की सेनाओं को जय (परास्त) करती हैं । 'मुद्गल' क्या ? मुद्गवाला = मूंग (अन्न) वाला। या मुद्गिल = मूंगों के गिलने वाला । [खाने वाला] अथवा मदन (काम) को गिलने वाला(जितेन्द्रिय)। अथवा मदंगिल = मद को निगलने वाला । अथवा मुदंगिल = हर्ष को निग- गलने वाला (विरक्त) । 'भार्म्यश्व' क्या ? भृम्यश्व का पुत्र । 'भृम्यश्व' क्या ? भूमि [घूमने वाले] इसके अश्व [घोड़े] हैं । अथवा अश्वों के भरण [पोषण] करने से वह 'भृम्यश्व' है। 'पितुः' (१९) यह अन्न का नाम है । कैसे ? रक्षा अर्थ में 'पा' [अदा० प०] धातु से है । क्यों कि- वह प्राणियों की रक्षा करता है । अथवा पान अर्थ में 'पा' (भ्वा० प०) धातु से है । क्यों कि- उसे प्राणी क्षुधाके निवारणार्थ पान करते हैं । अथवा वृद्धि अर्थ में 'प्याय' (भ्वा० आ०) धातु से है । क्यों कि- उससे प्राणी पुष्ट होते हैं । उस 'पितु' (अन्न) की यह ऋचा है ॥३ (२४)॥ (खं० ४) निरु०- “पितुं नु स्तोषं महो धर्म्माणन्तविषीम् । यस्य त्रितो व्योजसा वृत्रं विपर्व मर्दयत् ॥” (ऋ० सं० २, ५, ६, १) ॥ तं पितुं स्तौमि, महतो धारयितारं बलस्य, 'तविषी' इति बलनाम । तवतेर्वा वृद्धिकर्मणः। यस्य त्रितः 'ओजसा' बलेन