निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1015, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (२४६) ९ अ० ३ पा० ५ खं० 'त्रितः' त्रिस्थानः = इन्द्रः । 'वृत्रं' विपर्वाणं मर्दयति ॥ 'नद्यः' व्याख्याताः । तासाम्- एषा भवति ॥२(२५) अर्थः- "पितुं नु०” इस ऋचा का अगस्त्य ऋषि है। (अहं) मैं (तम्) उस 'महः' (महत्) महान् 'तविषीम्' (बलस्य) बलके 'धर्त्तारम्' [ धारयितारम् ] धारण करने वाले 'पितुम्' (अन्नम्) अन्न को 'स्तोषम्' (स्तौमि) स्तुति करता हूं 'यस्य' जिसके 'ओजसा' [बलेन] बलसे 'त्रितः' (त्रिस्थानः) त्रिलोकी के स्वामी [इन्द्रः] इन्द्र ने 'वृत्रम्' वृत्रको 'विपर्वम्' (विगतसन्धिपर्वाणम् ) उसके सन्धियों के बन्धनों को तोड़ कर 'विमर्द्दयत्' खूब मारा- जिससे कि- यह फिर न आवे ॥ 'तविषी' यह बल का नाम है। अथवा वृद्धि अर्थ में 'तु' (अदा० प०) धातु से है। क्यों कि- वह सब वस्तुओं से बड़ा है । 'नद्यः' (२०) [नदियें] ये यहां अवसर में आई हैं, किन्तु इनकी व्याख्या “नदना भवन्ति शब्दवत्यः” (अ० २ पा० ७ खं० २) यहां पर होचुकी । उन नदियों की यह ऋचा है ॥ ४ (२५) ॥ ( खं० ५ ) निरु० " इमं मे गङ्गे यमुने सरस्वति शुतुद्रि