निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1073, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३०८ ) १० अ० १पा० १२खं० 'चमसः' कस्मात् ? चमन्ति अस्मिन्-इति । बृहस्पतिः 'विरवेण' शब्देन विकृत्य ॥ 'ब्रह्मणस्पतिः' ब्रह्मणः पाता वा । पालयिता वा । तस्यैषा भवति — ॥ १२ ॥ अर्थः- "अश्नापिनद्धम्०" इस ऋचा का अयास्य आङ्गिरस ऋषि है । 'अश्मा' (अशनवता) व्यापन वाले या व्यापने वाले (मेघेन) मेघ से 'अपिनद्धम्' अपने भीतर लेकर बांधे हुए = ढांपेहुये = औरोंके अदृश्य 'मधु' (उदकम्) जलको 'पर्यपश्यत्' (बृहस्पति ने) देखा । 'तत्' उस (जल) को 'दीने' घटते हुए 'उदनि' (उदके) जलमें क्षियन्तम्' [निवसन्तं] बसते हुए 'मत्स्यं-न [इव] मछली को जैसे 'निः-जभार' (निर्ज- हार) निकाला । 'वृक्षात्' वृक्षसे 'चमसम्' 'न' (इव) चमस पात्र के समान — जैसे कोई बढई वृक्षसे काट कर चमस (कठ- डिया) पात्रको निकाल लेवे, उसी प्रकार बृहस्पति देवने मेघसे जलको निकाला । किस प्रकार ? 'विरवेण' [शब्देन] शब्द के साथ 'विकृत्य' काटकरके । 'चमस [पात्र] क्यों ? 'चमन्ति अस्मिन्' इसमें चमन (भक्षण) करते हैं । 'ब्रह्मणस्पति' (७) क्यों ? 'ब्रह्मणः पाता वा' वह ब्रह्म का (वेदका) पालन करने वाला है । अथवा पालयिता है [वही अर्थ] । "तस्य०" उस 'ब्रह्मणस्पति' की यह ऋचा है— ॥१२॥