निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३०६ ) १० अ० १ पा० १३ खं० [ खं० १३ ] निरु०- “ अश्मास्य मवतं ब्रह्मणस्पति र्मधु- धारमभि यमोजसा तृणत् । तमेवविश्वे पपिरे स्व- र्दृशो बहु साकं सिसिचुरुत्समुद्रिणम् ॥” [ऋ०सं० २, ७, १, १] ॥ अशनवन्तम् आस्यन्दनवन्तम् । अवातितं ब्रह्मणस्पतिर्मधुधारम् अभि यम् 'ओजसा' बलेन अभ्यतृणत् तम्-एव सर्वे पिबन्ति रश्मयः सूर्य्यदृशो बहु एनं सिञ्चन्ति उत्सम् 'उद्रिणम्' उदकवन्तम् ॥१३॥ इति दशमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥१०, १॥ अर्थः- “अश्मास्यमवतम्०” इस ऋचा का गृत्समद ऋषि है। 'ब्रह्मणस्पतिः' ब्रह्मणस्पति देवने 'अश्मास्यम्' (अशन- वन्तम् आस्यन्दनवन्तम्) उदक (जल) की व्यापन क्रिया से अशन = व्यापन वाले और जलकी स्यन्दन = झरनाक्रिया से आस्यन्दन वाले 'मधुधारम्' (उदकं धारयितारम्) जलको धारण करने वाले 'यम्' जिस(मेघम्) मेघको 'ओजसा' (बलेन) बल से 'अभि—अतृणत्' सम्मुख मारा (फोड़ा) । 'तम्-एव' उसही 'अवतम्' (अवाङ्मलितम्) नीचे की ओर पृथ्वी पर गिरे हुये को 'विश्वे' (सर्वे) सब स्वर्दृशः' सूर्य की रश्मियों ने 'पपिरे' (पिबन्ति) पान किया अथवा वे इसको पानकरती हैं। फिर वर्षा काल में (रश्मयः = सूर्य्यदृशः) सूर्य की किरणें 'बहु' बहुत 'साकम्' (सह) एक साथ 'एनम्' इस 'उत्सम्'