निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(मेघम्) मेघको 'उद्रिणम्' (उदकवन्तम्) जल युक्त (करते हुये) 'सिसिचुः' (सिञ्चन्ति) सींचती हैं ॥ जो ब्रह्मणस्पति देव प्रति वर्ष इस प्रकार मेघ को खोलता है, वह हमारे लिये ऐसा करे, यह आशीः जोड़ लेना चाहिये ॥ इति हिन्दी निरुक्ते दशमाध्यायस्य प्रथमः पादः॥१०,१॥ द्वितीयः पादः । (खं० १) निघ०— क्षेत्रस्यपतिः ॥८॥ वास्तो- ष्पतिः॥६॥ वाचस्पतिः॥१०॥अपांनपात् ॥११॥यमः॥१२॥मित्रः॥१३॥कः॥१४॥ सरस्वान् ॥१५॥ निरु०– क्षेत्रस्य पतिः । 'क्षेत्रं' क्षियतेर्निवास- कर्मणः, तस्य पाता वा । पालयिता वा । तस्य एषा भवति ॥१(१४) ॥ अर्थः- 'क्षेत्रस्य पतिः' [ ८ ] क्या ? 'क्षेत्र' निवासार्थक 'क्षि' (तु० प०) धातु से है । क्यों कि-उसके आश्रय से कुटुम्बी घर में निवास करते हैं । उसका पति (स्वामी) 'क्षेत्रस्य पतिः है । ये दो पद अलग २ हैं, किन्तु मन्त्र में वैसे ही हैं, इस लिये समाम्नाय में भी वैसे ही पढ़ दिये हैं । “तस्य०” उस क्षेत्रस्यपतिः (क्षेत्रपति) की यह ऋचा है ॥ १, (१४) ॥