भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1076

हिन्दी निरुक्त ( ३११ ) १० अ० २ पा० २ ख० ( खं० २ ) निरु०-“क्षेत्रस्य पतिना वय हितेनेव जयामसि। गामश्वं पोषयित्न्वा त्सख्या) सनो मृलातीदृशे॥” ( ऋ०सं०३ ८, ९, १ ) क्षेत्रस्य पतिना वयं सुहितेन- इव जयामः, गाम्, अश्वं, पुष्टं पोषयितृ च आहर-इति। “सनोमृलाति ईदृशे” बलेन वा धनेन वा । ‘मृलतिः’ दानकर्मा वा पूजाकर्मा वा ॥ तस्य एषा अपरा भवति ॥२ (१५)॥ अर्थः-“क्षेत्रस्य पतिना वयम्०” इस ऋचाका वाम- देव ऋषि है। क्षेत्र पति के अर्थ चरु की पुरोनुवाक्या है। ‘क्षेत्रस्य पतिना’ क्षेत्र के पति से ‘वयम्’ हम ‘ सुहितेन इव’ किसी उत्तम आप्त = प्रामाणिक = प्रतिष्ठित मित्र से जैसे संयुक्त होकर ‘जयामसि’ (जयामः) जीतें या समर्थ हों। [कैसे ‘गाम्’ गौको ‘अश्वम्’ घोड़ेको ‘पोषयित्नु’ [पुष्टं पोषयितृ च] और जो वस्तु स्वयम् पुष्ट हो और पोषण करने वाली हो, उसे ‘आ’ (हर) ला, ऐसे । अर्थात्- क्षेत्रपति देव के प्रसाद से गौ घोड़े और अच्छे पदार्थ जो सुखदायक हों हमें मिलें,और दास दासी भी मिलें, जिनसे हम कहे ‘यह ला’ ‘वह ला’ इत्यादि । ‘सः’ वह ‘क्षेत्रपति देव ‘नः’ हमारे लिये ‘ ईदृशे’ ऐसे भोग के लिये अभीष्ट धनों को ‘मृलाति’ (ददातु) देवे या [पूजयतु] पूजे । ‘मृलति’ धातु दान अर्थ में या पूजा अर्थ में है ॥