निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
(मेघम्) मेघको 'उद्रिणम्' (उदकवन्तम्) जल युक्त (करते हुये) 'सिसिचुः' (सिञ्चन्ति) सींचती हैं ॥ जो ब्रह्मणस्पति देव प्रति वर्ष इस प्रकार मेघ को खोलता है, वह हमारे लिये ऐसा करे, यह आशीः जोड़ लेना चाहिये ॥ इति हिन्दी निरुक्ते दशमाध्यायस्य प्रथमः पादः॥१०,१॥ द्वितीयः पादः । (खं० १) निघ०— क्षेत्रस्यपतिः ॥८॥ वास्तो- ष्पतिः॥६॥ वाचस्पतिः॥१०॥अपांनपात् ॥११॥यमः॥१२॥मित्रः॥१३॥कः॥१४॥ सरस्वान् ॥१५॥ निरु०– क्षेत्रस्य पतिः । 'क्षेत्रं' क्षियतेर्निवास- कर्मणः, तस्य पाता वा । पालयिता वा । तस्य एषा भवति ॥१(१४) ॥ अर्थः- 'क्षेत्रस्य पतिः' [ ८ ] क्या ? 'क्षेत्र' निवासार्थक 'क्षि' (तु० प०) धातु से है । क्यों कि-उसके आश्रय से कुटुम्बी घर में निवास करते हैं । उसका पति (स्वामी) 'क्षेत्रस्य पतिः है । ये दो पद अलग २ हैं, किन्तु मन्त्र में वैसे ही हैं, इस लिये समाम्नाय में भी वैसे ही पढ़ दिये हैं । “तस्य०” उस क्षेत्रस्यपतिः (क्षेत्रपति) की यह ऋचा है ॥ १, (१४) ॥
हिन्दी निरुक्त ( ३११ ) १० अ० २ पा० २ ख० ( खं० २ ) निरु०-“क्षेत्रस्य पतिना वय हितेनेव जयामसि। गामश्वं पोषयित्न्वा त्सख्या) सनो मृलातीदृशे॥” ( ऋ०सं०३ ८, ९, १ ) क्षेत्रस्य पतिना वयं सुहितेन- इव जयामः, गाम्, अश्वं, पुष्टं पोषयितृ च आहर-इति। “सनोमृलाति ईदृशे” बलेन वा धनेन वा । ‘मृलतिः’ दानकर्मा वा पूजाकर्मा वा ॥ तस्य एषा अपरा भवति ॥२ (१५)॥ अर्थः-“क्षेत्रस्य पतिना वयम्०” इस ऋचाका वाम- देव ऋषि है। क्षेत्र पति के अर्थ चरु की पुरोनुवाक्या है। ‘क्षेत्रस्य पतिना’ क्षेत्र के पति से ‘वयम्’ हम ‘ सुहितेन इव’ किसी उत्तम आप्त = प्रामाणिक = प्रतिष्ठित मित्र से जैसे संयुक्त होकर ‘जयामसि’ (जयामः) जीतें या समर्थ हों। [कैसे ‘गाम्’ गौको ‘अश्वम्’ घोड़ेको ‘पोषयित्नु’ [पुष्टं पोषयितृ च] और जो वस्तु स्वयम् पुष्ट हो और पोषण करने वाली हो, उसे ‘आ’ (हर) ला, ऐसे । अर्थात्- क्षेत्रपति देव के प्रसाद से गौ घोड़े और अच्छे पदार्थ जो सुखदायक हों हमें मिलें,और दास दासी भी मिलें, जिनसे हम कहे ‘यह ला’ ‘वह ला’ इत्यादि । ‘सः’ वह ‘क्षेत्रपति देव ‘नः’ हमारे लिये ‘ ईदृशे’ ऐसे भोग के लिये अभीष्ट धनों को ‘मृलाति’ (ददातु) देवे या [पूजयतु] पूजे । ‘मृलति’ धातु दान अर्थ में या पूजा अर्थ में है ॥
हिन्दी निरुक्त (३१२) १० अ० २धा० ३ खं०
“तस्य०” इस क्षेत्रपति की यह और दूसरी ऋचा है-[१५ • (खं० ३) निरु०- “क्षेत्रस्य पते मधुमन्तमूर्मिं धेनुरिव पयो अस्मासु धुक्ष्व । मधुश्चुतं घृत मिव सुपूत- मूतस्य नः पतयो मृळयन्तु ॥” (ऋ०सं०३,८,९,२) । क्षेत्रस्य पते मधुमन्तम् ऊर्मिं धेनुः- इव पयः अस्मासु धुक्ष्व- इति मधुश्चुतं घृतम्- इव उदकं सुपूतम् ऋतस्य नः पातारो वा पालयितारो वा मृळयन्तु । ‘मृळयतिः’ उपदयाकर्मा पूजाकर्मा वा ॥ तद् यत्समान्याम्- ऋचि समानाभिव्याहारं भवति, तद् ‘जामि’ भवति,-इति-एकम् । “मधु- मन्तं” “मधुश्चुतम्”- इति यथा ॥ यदेव समाने पादे समानाभिव्याहारं भवति तद् ‘जामि’ भवति- इति- अपरम् । “हिरण्यरूपः स हिरण्यसंदृक्” इति यथा ॥ यथा कथा च विशेषः ‘अजामि’ भवति- इति अपरम् । “मण्डूका इवोदकान्मण्डूका उदका- दिव” इति यथा । ‘वास्तोष्पतिः’ ‘वास्तुः’ वसतेर्निवासकर्मणः । तस्य पाता वा पालयिता वा ।
हिन्दी निरुक्त ( ३१३ ) १० अ० १ पा० ३ खं० तस्य एषा भवति ॥३ (१६)॥ अर्थ:-"क्षेत्रस्यपते०" इस ऋचा का भी वामदेव ऋषि है। विनियोग महाव्रत में है। अदिति के लियेचरुरूप चारवार स्तनग्रह होता है, उसका तृतीय स्तनग्रह इस ऋचा से ग्रहण किया जाता है । 'क्षेत्रस्य पते !' हे क्षेत्रपति देव ! 'धेनुः' गौ 'पयः'- इव दूध को जैसे [ त्वम् ] तू ' अस्मासु' हमारे लिये 'मधुमन्तम्' मिठास वाले 'मधुश्चुतम्' मिठास के झरने वाले , घृतम्-इव सुपूतम्' घृतके समान सुन्दर निर्मल = निर्दोष 'ऊर्मिम्' जल समूहको 'धुक्ष्व' दुह या दे = बरस । 'ऋतस्य' जलके 'पतयः' (पातारो वा पालयितारो वा ) स्वामी या अधिष्ठाता क्षेत्र पति आदि देवता 'नः' हमें 'मृळयन्तु ' ( रक्षन्तु ) रक्षाकरें ( पूजयन्तुवा ) अथवा सत्कार करें ॥ ' मृळयति ' ( मृल-खिच् ) धातु अथवा उपद्या अर्थ में अथवा पूजा अर्थ में है ॥ “तद्यत्समान्यामृचि०” सो-जो पद समानी = समान या एक ऋचा में समान अर्थ को कहता है-दूसरे पद से ऋचो के पूर्वार्द्ध में जो कुछ अर्थ कहा गया है,उसी अर्थ को ऋचा उत्तरार्द्ध में जो पद कहता है, वह पदजामि होता है । यहएक मत है । जैसे उक्त मन्त्र में “मधुमन्तम्” “मधुश्चुतम्” [ये दो पद हैं ।] [क्यों कि— जो 'मधुश्चुत्' मधु का चुवाने [मधुको बरस ने वाला] होता है, वह अवश्य ही 'मधुमान्' मधुवाला होता है । इससे यहां “ मधुश्चुतम् ” यह पद 'जामि' होता है ।
हिन्दी निरुक्त ( ३१४ ) १० अ० २पा० ३ खं० “यदेव समाने पादे०” जो ही पद एक पाद में दूसरे पदसे व्यवहित = अन्तरित होकर समान या वैसे ही अर्थ में फिर कहा जाता है, वही पद 'जामि' होता है । यह दूसरा मत है । जैसे- “ हिरण्यरूपः सहिरण्यसंदृक् ” । क्योंकि-जो हिरण्य रूप होता है, वह अवश्य ही हिरण्य जैसा होता है । अतः 'हिरण्यसंदृक्' यह पद जामि (पुनरुक्त) होता है ॥ “ यथा कथा च विशेषः,अजामि भवति-इति अपरम् ” । जिस किसी प्रकारसे भी जो कुछ भी = थोड़ा भी विशेष = भिन्न अर्थ होने से अजामि होता है । (क्योंकि वेदमें जैसा देखा जाता है, उसी का अनुविधान = अनुसरण या निर्वाह किया जाता है । वह अपौरुषेय या ईश्वरीय वाक्य है, उसमें भ्रान्ति आदि दोषों की आशङ्का का भी संभव नहीं है, अतः ऐसा यत्न करना चाहिये, जिस प्रकार जामि पद का फल निकल आवे । यत्किंचित् विशेष से भी वह अजामि हो जाता है ।) यह अन्य मत-तीसरा मत है । जैसे- “ मण्डूका इवोदकान्मण्डूका उदकादिव ”इति । अर्थात्- मेंढक जैसे जलसे, मेंढक जलसे जैसे ॥ 'वास्तोष्पति' (१) क्या ? 'वास्तु' (घर) निवास अर्थ में 'वस' ( भ्वा० प० ) धातु से है । क्योंकि-उसमें मनुष्य निवास करते हैं । उसके पति ( पाता या पालयिता ) को 'वास्तो- ष्पति' कहते हैं । ( सो यह ' वास्तोष्पति ' रुद्ररूप मध्यम लोक का देवता है । क्योंकि-“अमीवहा०” इस मन्त्र में बलकृति ( बलकर्म ) लिङ्ग पाया जाता है ।
हिन्दी निरुक्त ( ३१५ ) १० अ० २ पा० ३ खं० “तस्य०” उस वास्तोष्पति की यह ऋचा है-॥३(१६)॥ व्याख्या । ‘जामि’ पदका मतभेद से लक्षण । ‘जामि’ यह एक वैदिक संज्ञा है । अतएव यह अन्य श्रौत तथा मान्त्रिक आवश्यक शब्दों के समान निर्वचनीय है यद्यपि दैवत काण्ड में आनुपूर्वी से निघण्टुस्थ देवतानामों का ही यहां निर्वचन होना उचित है, तथापि निरुक्त शास्त्र के सकल शब्दों के अर्थ परिज्ञान में समुद्यम होने के कारण मुख्य शब्दों में वे शब्द, जिनका निर्वचन या विचार किसी विशेष व्युत्पत्ति को उत्पन्न करने वाला हो तथा जिसके विचार का प्रभाव शास्त्र में व्यापक रूप से पड़ता हो । प्रसंग- वश प्रकरण में आये हुये छोड़े नहीं जाते, यह आचार्य की इस ग्रन्थनिर्माण में सार्वत्रिक ही विशेष शैली है। इसी से यहां “क्षेत्रस्यपते” इस निगम में जामि पद भी आचार्य का उपेक्षणीय नहीं है । क्योंकि-मन्त्रों में जामि अजामि का प्रसंग प्रायः आता रहता है । 'जामि' यह वैदिक संज्ञा है यह पहिले कहा गया है, तदनुसार भगवद्दुर्गाचार्य ने एक श्रुति भी उद्धृत की है, जिसमें 'जामि' पद व्यवहृत हुआ है- “जामि वा एतत्क्रियते यन्मरुत्वतीयो ग्रहो गृह्यते मरुत्वतीयं शस्यते” अर्थात् - जामि ही वह (यज्ञ) में किया जाता है, जो मरुत्वतीय ( मरुतों का ) ग्रह ग्रहण किया जाता है, और मरुत्वतीय [ मरुतों का ] शस्त्र किया जाता है ।
हिन्दी निरुक्त ( ३१६ ) १० अ० २ पा० ३ खं० 'जामि' नाम पुनरुक्त का है। इसको लोक में दोष कहा जाता है। यह नहीं माना जा सकता कि जो एक स्थान में दोष रूप हो वह दूसरे स्थान में भी दोष ही होवे । अतः वेदके लिये यह कोई आक्षेप नहीं, कि उसमें जामि या पुनरुक्त शब्द आते हैं ? सुतराम् मन्त्रों में ऐसे शब्दों को जामि कहने में कोई हानि नहीं । यह जामि या पुनरुक्त दो प्रकारका होता है एक समानशब्दार्थ और दूसरा असमान शब्दार्थ । जो एक ही पद एकही वाक्य में फिर कहा जावे, वह समान शब्दार्थ है । जैसे- "मन्मरे जति रक्षो हा मन्मरेजति" [ ऋ० स०२, १, १७, १) (निरु० १० अ० ४ पा० ५ खं०)। ऐसे ही जो पद पूर्व पद से भिन्न आकार का-भिन्न अक्षरों वाला और उसी के समान अर्थ वाला हो, वह दूसरा असमान शब्दार्थ जामिपद है। जैसे पूर्वोक्त मन्त्र में "मधुमन्तम्" "मधुश्चुतम्" । इस उभयविध या दोनों ही प्रकार के जामि के मत भेद से दो लक्षण हैं। उनमें प्रथम लक्षण "तद्यत्समान्याम्" इस पङ्क्ति से बताया गया है। और दूसरा लक्षण "यदेवं समाने पादे" इस पङ्क्ति से। इन दोनों लक्षणों के साथ जो उदाहरण मूलमें दिये हैं, वे दोनों ही-(१)"मधुमन्तम्" "मधुश्चुततम्" (२) "हिरण्यरूपः स हिरण्यसंदृक्" असमान शब्दार्थहैं यद्यपि यहां असमानशब्दार्थ जामिके समान समानशब्दार्थ जामिका भी दोनों मन्त्रोंमें उदाहरण संभव था । तथापि उसके लिये इसी अध्यायके चतुर्थ पादके ५ वें खंडमें
जामि पदके अर्थान्तरकी कल्पनाके असंभव स्थलमें समाधाना- न्तर भी वक्तव्य है, अतः यहां वह नहीं दिया । वह समाधान उक्त स्थलमें “अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते” इस पङ्क्ति पर देखना चाहिये । इन दोनों मतों के अनुसार इन का भेद यही है कि-पहिले उदाहरण का पहिला पद ऋचाके पूर्वार्द्धमें है, और दूसरा उसका पद ऋचा के उत्तरार्द्ध में है। एवम् दूसरे उदाहरण के दोनों पदएक ऋचाके एकही पादमें हैं। पहिले मतमें एक ऋचामें एक पर्याय के पीछे दूसरा पर्याय समान पादमें वा भिन्न पादमें, तथा अन्य पद के व्यवधान से या अव्यवधान से आवे वह जामि है। इसी प्रकार दूसरे मतमें-‘एक ऋचाके एकही पादमें जोसमानार्थक पद आता है वह जामि है। जामिता दोषका परिहार । हमारे आचार्यका अभिमान है कि- मन्त्रोंमें जामितादोष आही नहीं सकता, तथापि जिन पूर्वाचार्यों ने अपने २ मतों के अनुसार जामिता दोष मन्त्रों में स्वीकार किया है, उनके मतों का खण्डन भी छात्रों की व्युत्पत्ति के लिये अपेक्षित है इसी से आचार्य उन मतों का उपन्यास करके उनका खण्डन करना चाहते हैं। इससे आपने उन मतों की स्थापना अप- ने ग्रन्थ में जिस प्रकार से की है, उससे भी पूर्व मत का उत्तर मत से खण्डन होजाता है, यह सूचित करते हैं । तथा इससे यह भी सौलभ्य होता है कि— हमारा एक विपक्षी दूसरे विपक्षी से ही परास्त होजाता है, इससे हमको दोनों पक्षों के निवारण का उपाय न करके एक ही का निवारण करना अवशिष्ट रह जाता है। प्रथम मत के ऊपर दूसरे मत की प्रवृत्ति इस अभिप्राय से हुई कि—
हिन्दी निरुक्त ( ३१८) १० अ० २ पा० ३ खं० 'भिन्न २ ऋचा के अर्द्धों में समान अर्थ में विलक्षण २ पदों के व्यवधान से जो पद दुवारा आते हैं, उनका प्रकृत अर्थ के अनुस्मरण के लिये कीर्त्तन आवश्यक होता है, इससे वे जामि नहीं, किन्तु अजामि हैं। जैसा कि पूर्व मन्त्र में “मधुम॑न्त॒म्” “मधुश्चुतम्” उदाहरण दिया है। इस लिये एक ही पाद में किसी दूसरे पद के व्यवधान से समान अर्थ में आया हुआ पद ही 'जामि' या पुनरुक्त होता है। क्यों कि- तब तक पूर्व पद के अर्थ की स्मृति नष्ट नहीं होती है, और इसी से उस के उस समय तक दोहराने की आव- श्यकता नहीं है, जैसा कि— “हिरण्यरूपः स हिरण्य संदृक्” । क्यों कि- जो हिरण्यरूप होता है, वह अवश्य ही हिरण्य जैसा होता है, अतः हिरण्यसंदृक् यह जामि (पुनरुक्त) होता है। इस दूसरे मत से पूर्व मत का खण्डन होगया और उसी का परिष्कार रूप दूसरा मत खड़ा होगया अवश्य ही पूर्व मत के रहने पर मन्त्रों में बहुत अधिक जामि दोष आता था, किन्तु अब इस सरे मत के उदय होते ही वह दोष ऋचा के एकही पादमें दो पर्यायों के आने से होगा, किन्तु विलम्ब से जो पर्याय एक मन्त्र में दुवारा आते हैं, वे जामि नहीं होंगे। अथापि भाष्यकार के विचार में मन्त्रों में अल्प दोष भी सहनीय नहीं है, इस लिये आपने— “यथा कथा च विशेषः अजामि भवति –इति अपरम्” यह तीसरा मत भी रख दिया है। इसी मत पर आचार्य के मत का भी पर्यवसान है।
हिन्दी निरुक्त ( ३१६ ) १० अ० २ पा० ३ खं० भगवद् दुर्गाचार्य ने एक चौथे नवीन पण्डितों के मत का भी उपप्रदर्शन कराया है। वे कहते हैं कि—अभीष्ट वाक्यार्थ की पूर्त्ति होने के पश्चात् जो अधिक पद (जामि) मन्त्र में आता है, वह निपात के समान पाद् पूरण है—छन्द की पूर्त्ति के लिये है, यही उसका प्रयोजन है, इससे वह सर्वथा अनर्थक नहीं, और न वह वाक्य को ही दुष्ट करता है। किन्तु हमारी समझमें पदको निस्सार समझने की अपेक्षा उससे किसी रसका दोहन करना ही उत्तम है। अतः आचार्य पक्ष (तीसरा मत) ही माननीय है । तीसरे मत का उपदर्शित उदाहरण और उसकी व्याख्या— “मण्डूका इवो०”इत्यादि। “योगक्षेमं व आदायाहं भूयासमुत्तम आवो मूर्द्धानमक्रमीम् । अधस्पदन्म उद्गदत मण्डूका इवोदकान्मण्डूका उदकादिव॥”[ऋ०सं०८,८,२४,५] इस ऋचा का ऋषभ ऋषि है। देवता इच्छा से कल्पित किया जासकता है। शत्रुओं से कहा जाता है— (हे विद्विषः !) हे शत्रुओं ! ‘अहम्’ मैं ‘वः’तुम्हारे ‘यो- गक्षेमम्’ होने वाले लाभों को और प्राप्त किये हुये अर्थों को ‘आदाय’ लेकर या अपने अधीन करके ‘ उत्तमः ’ तुम्हारा मुख्य ‘भूयासम्’ हो जाऊं । “आवोमूर्द्धानम् अक्रमीम्” तुम्हारे मस्तक को आक्रमण करके- दबा करके मैं स्थित हो जाऊं । तुम सब मुझ से सदा ही दबे हुये मस्तक रहो । 'मे’ (मम) मेरे ‘अधस्पदात्’पैरों के नीचे रहते हुये तुम सब ‘उद्गदत्’ बोलते रहो- मेरे मुख की ओर ताकते हुये अपने सब स्वार्थों
हिन्दी निरुक्त (३२०) ९० अ० २५१० ३ खं०
को पराधीन कियेहुये नित्यही बोलते रहो। कैसे—"मण्डूका इवोदकात्” जैसे जल के विना मेंढुक नित्य अस्त्राधीन वृत्ति होते हुये निर्वचन (मूक) होजाते हैं, ऐसे ही मेरे विना तुम्हारी स्थिति न हो। इस प्रकार यहां पहिले स्थान में 'मण्डूकाः' यह शत्रुओ' के वाक् हीन होने में उपमान है। “मण्डूका उदकात्- इव” और इस दूसरे स्थान में जिस प्रकार जल के विना मण्डूक (मेंढक) सर्वथा ही नहीं होते इसी प्रकार तुम मेरे विना मत हो, इस प्रकार यहां अपना (वक्ता का) उदक उपमान है। इसी प्रकार पूर्व मन्त्रों में भी विशेष का अनुसन्धान करना जैसे- कोई मधुमान (मधुवाला) होता है, किन्तु वह निरन्तर पुनः पुनः मधु (शहद) को चुवाता नहीं, इससे वह 'मधुश्चुत्' (मधुका चुवाने वाला) नहीं कहा जाता। सुतराम् 'मधुमान्' और 'मधुश्चुत' शब्द दोनों भिन्न २ अर्थ वाले ही हैं। यहां जामिता दोष नहीं आता। और ऐसे ही "हिरण्यरूपः स हिरण्य संदृक्” यहां कोई हिरण्य (सुवर्ण) रूप होता है, किन्तु वह हिरण्य जैसा दिखाई नहीं देता और न प्रिय होता है। इससे 'हिरण्यरूप' वह है, जो हिरण्य (सुवर्ण) ही हो, और 'हिरण्य संदृक्' वह है, जो हिरण्य जैसा दिखाई देवे और हिरण्य न हो। ऐसे ही अन्यत्र भी मन्त्रों में शब्दों के भिन्न २ अर्थ अनुसन्धान करके जामिता दोष के अभाव को देखना। जहां मन्त्रों में ऐसा स्थल आता है, वह पुरुष की बुद्धि के दोष से ही दोष युक्त प्रतीत होता है; मन्त्र में सर्वथा ही दोष नहीं होता। यह भाष्यकार का अभिप्राय है॥
हिन्दी निरुक्त ( ३२१ ) १० अ० २ पा० ३ ख०
'वास्तोष्पति' (१) क्या ? 'वास्तुः' (घर) निवास अर्थ में 'वस्' (भ्वा० प०) धातु का है । क्यों कि—उसमें मनुष्य निवास करते हैं उसके पति (पाता या पालयिता) को 'वास्तोष्पति' कहते हैं । सो यह 'वास्तोष्पति' रुद्ररूप मध्यम देवता है । क्यों कि- ‘अमीवहा०’ इस मन्त्र में बलकृति ( बलकर्म ) लिङ्ग पाया जाता है । “तस्य०” उस (वास्तोष्पति) की यह ऋचा है ॥३(१६)॥ ( खं० ४ ) निरु०-“अमीवहा वास्तोष्पते विश्वारूपाण्या- विशन् । सखा सुशेव एधि नः ॥” ( ऋ०सं० ५, ४, २२, १ ) ॥ अभ्यमनहा वास्तोष्पते ! सर्वाणि रूपाणि आ- विशन् सखा नः सुसुखो भव ॥ 'शेव' इति सुखनाम । शिष्यतेर्वकारो नामकरणः अन्तस्थान्तरोपलिङ्गी ॥ विभाषितगुणः, 'शिवम्' इत्यपि अस्य भवति । यद्-यद्-रूपं कामयते तत् तद् देवता भवति । “रूपं रूपं मघवा बोभवीति” इत्यपि निगमो भवति । 'वाचस्पतिः' वाचः पाता वा, पालयिता वा । तस्य एषा भवति ॥४(१७)॥
हिन्दी निरुक्त ( ३२२ ) १० अ० २पा० ४ खं०
अर्थः—"अमीवहा०" इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि है। यह कारिका स्थालीपाक में और यायावर्य की प्रतिपत्ति में वास्तोष्पतीय होम में विनियोग है। हे भगवन् ! 'वास्तोष्पते ! देव ! [त्वम्] तू (अस्माकम् ) हमारे 'अमीवहा' (अक्षयमनहा) रोगों का नाश करने वाला 'एधि' (भव) हो। कैसे ? 'विश्वा' (विश्वानि = सर्वाणि) सब 'रूपाणि' रूपों को 'आविशन्' आवेश करता हुआ- धारण करता हुआ हमारे दुःखों के उत्पन्न करने वाले जो सर्पादि उनका प्रतिपक्ष = विरोधी जो नकुल (न्योला) आदि उन २ के रूपों को धारण करता हुआ उस २ हमारे रोग को तू नाश कर-हमारे उपद्रवों को हटा। 'नः'(अस्माकम्) हमारा 'सखा' (मित्रम्) मित्र 'सुशेवः' (सुसुखः) सुन्दर सुखरूप हो । 'शेव' यह सुख का नाम है। 'शिष्' (दि० प०) धातु से वकार नाम करण (प्रत्यय) होता है, जोकि-अन्तस्थान्तरोप- लिङ्गी-धातुके अन्त 'ष' के अन्तर या अवकाश स्थान को उपलिङ्गन = उपगमन करने वाला होता है—'शिष्' का 'शिव' और 'इ' को 'ए' गुण होकर 'शेव' बन जाता है। [ यहां 'अन्तस्थ' शब्द से यरलव वर्णों की संज्ञा नहीं है।] इस धातु को यह गुण ('इ' का ए) विभाषित विक- ल्प से होता है। इस से गुण के न होने पर इसी धातु का 'शिव' यह शब्द भी हो जाता है। जिस २ रूप की कामना करता है, वह २ देवता हो जाता है। (क्योंकि-देवता का ऐसा ऐश्वर्य है, जो जो वह चाहता है। उस २ रूप को करलेता है।) "रूपं रूपं मघवा बोभवीति" 'मघवा इन्द्रदेव
रूप रूप [ हर प्रकार का रूप ] 'बोभवीति' बार २ या अतिशय से होता है। यह भी निगम है। 'वाचस्पति' ( १० ) क्या ? वाच् ( वाणी ) का पाता या पालयिता ( रक्षा करने वाला होता है। “तस्य०” उस वाचस्पति देव की यह ऋचा है- ॥४॥ व्याख्या। “अमीवहा०” निगम में “विश्वा रूपाण्या- विशन्” 'सब रूपों को धारण करने वाला वास्तोष्पति मध्यम देव है,-यह कहा गया है। इसी की विशेष व्याख्या करने की इच्छासे क्यों सब रूपों को धारण करता है? कैसे २ रूपों को धारण करता है? इन प्रश्नों के उत्तर देते हुए भाष्यकार यास्कमुनि कहते हैं- “यद्यद् रूपं कामयते तत्तद् देवता भवति” अर्थात्-भक्त जिस २ रूप की कामना करता है उस २ रूप से देवता होता है। प्रयोजन यह कि-भक्त की कामना को पूर्ण करना ही देवता को नाना रूप धारण करने का कारण है, और जैसे २ रूप को भक्त चाहता है, वैसे ही वैसे रूप को वह धारण करता है। स्वयम् भगवान् की प्रतिज्ञा भी ऐसी ही है “यो यो यांयां तनुं भक्तः श्रद्धयाऽर्चितु- मिच्छति । तस्यतस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधा- म्यहम्” (भ० गी० ७, २१) भाष्यकार कहते हैं कि-यही निगम इस प्रयोजन का नहीं है, किन्तु और भी निगम है, जो इसी को स्पष्ट अक्षरों में ही कह रहा है।
हिन्दी निरुक्त ( ३२४ ) १० अ० २ पा० ४ ख० “रूपं रूपं मघवा बोभवीति मायाः कृण्वा नस्तन्वं १ परिस्वाम् । त्रिर्यद्द्दिवःपरि मुहूर्त्तमागात् स्वैर्मन्त्रैरनृतुपा ऋता वा ॥” [ऋ०सं०३,३,२०,३]॥ इस ऋचा का विश्वामित्र ऋषि है। जिन-जिन रूपोंसे इन्द्र देव होना चाहता है, उन सबसे वह बिना किसी रुकावटके होजाता है-वार२ होता है। कैसे? 'ऐसा होऊं', 'ऐसा होऊं' इत्यादि इच्छाओं के अनुसार अपने तनु (शरीर) को करता हुआ = बदलता हुआ। क्या वह मनुष्य आदि के समान उस २ शरीर को धारण करके मोह को प्राप्त होता है- उस २शरीर में होने वाले सुख दुःखों को भोगता है? नहीं “मायाः” वे सब उसकी माया हैं-ऐच्छि- क शरीर हैं, उसके मोहक नहीं हैं। जैसे बाजीगर या बहु- रूपिया अपनी इच्छा से नाना रूपों को धारण करता है और उनसे मोहित होकर उन्हें अपने सच्चे रूप नहीं मानता, किन्तु अपनी इच्छा के अधीन ही मानता हुआ उनका कार्य करता है, उसी प्रकार इन्द्र देवके नाना रूपहैं। जो इन्द्र देव अपने स्तुति के मन्त्रों से- मनन वाक्यों या भावना वाक्यों से यजमानोंके यज्ञमें बुलाया हुआ एक मुहूर्त्त में द्युलोकसेतीनवार आता है-भिन्न २स्थानोंमें भिन्न २ रूपोंसे एक हीवार आजाता है। प्रयोजन यहकि—देवताका ऐश्वर्य अमित होता है, उसको नाना रूप धारण करने में कोई कष्ट नहीं होता, वह सब कामों को अनायास करलेता है, उसके कामों में अशक्ति से होने वाले प्रश्नों को नहीं उठाना चाहिये। वह “अनृतुपा” और “ऋता वा” है, उसके सोम
पान को कोई समय नियत नहीं है, सदा ही उसके लिये यञ्ज होते रहते हैं और सदा ही सोमपान करता रहता है । इससे यह ठीक ही कहा है- कि- तू सब रूपों को धारण करता हुआ हमारे रोगों का नाशक हो । “बिभर्षि रूपाण्यवबोध आत्मा क्षेमायलोक- स्य चराचरस्य सत्वोपपन्नानि सुखावहानि सतामभद्राणि मुहुः खलानाम् ॥” (श्री० भा० स्कं० १० अ० २ श्लो० २९ ) हे भगवन्! तू ज्ञानस्वरूप अन्तर्यामी चर अचर लोक के क्षेम के लिये सात्विक रूपों को धारण करता है, जो सत् पुरुषों के लिये सुख दायक और खलों के लिये सदा ही दुःख दायक = दण्ड देने वाले हैं यह श्रीमद् भागवत वाक्य भी रूपान्तर से वही वेद वाक्य प्रतीत होता है ॥४(१७)॥ (खं० ५) निरु०-“पुनरेहि वाचस्पते देवेन मनसा सह । वसोष्पते निरामय मय्येव तन्वं१मम ॥” [ऋ०सं० १०,६,१३,७] ( अथ०सं० १,१,२)इति सा निगद- व्याख्याता । 'अपान्नपात्' तनूनप्ता व्याख्यातः । तस्य एषा भवति ॥५[१८]॥ अर्थ :-कोई पापी मनुष्य, जिसने अपने किये हुए पाप की किसी प्रायश्चित्त आदि से शुद्धि नहीं की हो, अपने
हिन्दी निरुक्त ( ३२६ ) १० अ० २पा० ६ खं० प्राणों को अपने से अलग हुये समझ कर उनसे सम्बोधन कर के कहता है— हे 'वाचस्पते '! वाणीके स्वामी ! तू 'देवेन' सब इन्द्रियों की वृत्तियों को प्रकाशित करने वाले 'मनसा-सह' मनके साथ 'पुनः-एहि' फिर आ । हे 'वसोष्पते !' धन अथवा अन्न के स्वामी ! 'मम' मेरी 'तन्वम्' तनू को = देह को 'मयि-एव' मुझ में ही 'निरामय' निरन्तर रमा—ऐसा कर जिससे कि मेरी तनू मुझ में ही रमण करे । यह ऋचा अपने उच्चारण से ही व्याख्यात है ॥ 'अपांनपात्' ( १० ) 'तनूनपात्' शब्द ( ८, २, २ ) से व्याख्यान किया जाचुका । यह शब्द निर्वचन है— एक शब्द का दूसरे शब्द के द्वारा निर्वचन किया जाता है, अर्थात्-यह भी प्रकृत शब्द के निर्वचन के बताने की आचार्य की शैली है । अप् या जलों से आदित्य होता है। और उससे मध्यम देव, इससे वह 'अपांनपात्' जलका पोता है। यह शब्द की व्याख्या है । अर्थ से यह मध्यम देव है । “तस्य०” उस ‘अपांनपात्’ की यह ऋचा है ॥५(१८॥ ( खं०६ ) निरु०-“यो अनिध्मो दीदयदप्स्व१न्तर्यं विप्रास ईलते अध्वरेषु । अपान्नपान्मधुमतीरपो दाया- भिरिन्द्रो वावृधे वीर्याय ॥” (ऋ०सं०७,७,२४,२,॥ यः अनिध्मः ‘दीदयद्’ दीप्यसे अभ्यन्तरम्- अप्सु, यं मेधाविनः स्तुवन्ति यज्ञेषु, सः अपान्न-
हिन्दी निरुक्त ( ३२७ ) १० अ० २ पा० ७ खं० पात् मधुमतीः अपो देहि अभिषवाय,याभिः इन्द्रो वर्द्धते 'वीर्याय' वीरकर्मणे ॥ 'यमः' यच्छति- इति सतः । तस्य एषा भवति ॥६(१९)॥ अर्थ:- “यो अनिध्मो०” इस ऋचा का कवष ऋषि है । यह सारा ही मन्त्र प्रत्यक्ष है । हे अपान्नपात्! 'यः'(त्वम्)जोतू 'अनिध्मः'इन्धन के विना 'अप्सु'— 'अन्तः' जलों के मध्यमें 'दीदयत्' (दीप्यसे)'जलता है, 'यम्' जिसे (जिस तुझको) 'अध्वरेषु' ( यज्ञेषु) यज्ञों में 'विप्रासः' (मेधाविनः) मेधावी ब्राह्मण 'ईळते' ( स्तुवन्ति ) स्तुति करते हैं (सः) सो तू 'मधुमतीः' मीठे (अपः) जलों को 'अभिषवाय'सोम के निचोड़ने के अर्थ 'दाः'(देहि) दे 'याभिः' जिनसे 'इन्द्रः' तू इन्द्र देव 'वीर्याय' (वीरकर्मणे) वीर कर्म के लिये 'वावृधे' (वर्द्धेयाः) बढता है । अथवा (वर्द्धते) इन्द्र देव जिससे बढता है । [इस व्याख्या में इतना अंश प्रथम पुरुष के योग से परोक्ष हो जाता है] । 'यम'(१२) क्यों? 'यच्छति' वह सब प्राणियों को जीवन से निवृत्त करता है । इसी बल कर्म से वह मध्यम है । “तस्य०” उस (यम) की यह ऋचा है ॥६(१६)॥ ( खं० ७ ) निरु०-“परेयिवांसं प्रवतो महीरनु बहुभ्यःपन्था- मनुपस्पशानम् । वैवस्वतं सङ्गमनं जनानां यमं राजानं हविषा दुवस्य ॥”[ऋ०सं०८,६,३४,१]॥
हिन्दी निरुक्त ( ३२८ ) १० अ० २ पा० ७ खं० परेयिवांसं पर्यागतवन्तं प्रवतः उद्वतो निवतः- इति । अवतिर्गतिकर्मा । बहुभ्यः पन्थानमनु पस्पशयानं “वैवस्वतं सङ्गमनं जनानां यमं राजानं ॰हविषा दुवस्य”- इति । ‘दुवस्यतिः’ राध्नोतिकर्मा ॥ अग्निरपि ‘यमः’ उच्यते । तम् एता ऋचः अनुप्रवदन्ति ॥७(२०)॥ अर्थ:-“परेयिवांसम्०” इस ऋचा का हविर्धान ऋषि है । यम के पशुमें वपा में विनियोग है । हे यजमान ! ‘प्रवतः’ (मनुष्यान्,उद्वतः = देवान्,निवतः = तिरश्चः) मनुष्यों को, देवताओं को, और पशु पक्षी आदि तिर्यक् योतिके प्राणियों को ‘परेयिवांसम् (पर्यागतवन्तम् = सर्वतः प्राप्तवन्तम् ) सब ओर से व्यापन करने वाले ‘महीः’ ( महती भूतजातीः ) इन बड़ी २ प्राणियों की जातियों को व्योपन करने वाले “बहुभ्यः (पुण्यकृद्भ्यः पापकृद्- भ्यश्च ) पन्थाम् [ पन्थानम् ] अनुपस्पशानम् ( अनुपस्पशायमानम्) बहुत पुण्यात्माओं और पापि- ओं के लिये कर्मों के अनुसार मार्ग देने वाले-इस मार्ग से यह प्राणी जीवनसे छुड़ाना है, यह जानकर उसको चोर के समान बांधकर सर्प ज्वर आदि का रूप धारण करके जीवित से छुड़ाने वाले ‘वैवस्वतम्’ (विवस्वतः पुत्रम् ) सूर्यके पुत्र ‘जनानां संगमनम्’ अपनी सम दृष्टि करके सब प्राणियों को
हिन्दी निरुक्त ( ३२६ ) १० अ० २ पा० ८ खंड कर्मों के अनुसार इस लोक से पर लोक को लेजाने वाले “यमंराजानम्” यम राजा को ‘हविषा’ पशुरूप हविसे ‘दुवस्य’ (राध्नुहि) आराधन कर । ‘दुवस्यति’ धातु ‘राध्’ (स्वा० प०) धातु के अर्थ में है आराधन वा सेवा अर्थ में है । अग्नि भी ‘यम’ कहा जाता है । (यह प्रसंग से वा शब्द की समानता से निर्वचन है। इस से भी विचार का क्रम-विशेष दिखाया गया है) । उस यम अग्नि को ये ऋचाएँ अनुप्रवचन करती हैं, उसके गुणों को बखानती हैं—॥ ७ (२०) ॥ व्याख्या । उपर्युक्त “परेयिवांसम्०” इस मन्त्र में “गरुड़ पुराण” के प्रेतकल्प का संक्षेप है । जैसी वहां जीवों की कर्म गतिए यमराज के अधिकार में वर्णन की हैं, वेही यहां सामान्य रूपसे कही गई हैं। शब्दों की समानता भी पूर्ण रूप से है ॥ ७ (२०) ॥ (खं० ८) निरु० “सेनेव सृष्टामं दधात्येस्तुर्न दिद्युत् त्वेष प्रतीका ॥”(ऋ० सं० १, ५, १०, ७) ॥ यमो हजातो यमो जनित्वं जारः कनीनां पतिर्ज- नीनाम् । तं वश्चराथाँ वयं वसत्या स्तन्म गावो नक्षन्त इद्धम् ॥” [ऋ० सं० १, ५, १०, ८] इति द्विपदाः ॥