भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1094

हिन्दी निरुक्त ( ३२६ ) १० अ० २ पा० ८ खंड कर्मों के अनुसार इस लोक से पर लोक को लेजाने वाले “यमंराजानम्” यम राजा को ‘हविषा’ पशुरूप हविसे ‘दुवस्य’ (राध्नुहि) आराधन कर । ‘दुवस्यति’ धातु ‘राध्’ (स्वा० प०) धातु के अर्थ में है आराधन वा सेवा अर्थ में है । अग्नि भी ‘यम’ कहा जाता है । (यह प्रसंग से वा शब्द की समानता से निर्वचन है। इस से भी विचार का क्रम-विशेष दिखाया गया है) । उस यम अग्नि को ये ऋचाएँ अनुप्रवचन करती हैं, उसके गुणों को बखानती हैं—॥ ७ (२०) ॥ व्याख्या । उपर्युक्त “परेयिवांसम्०” इस मन्त्र में “गरुड़ पुराण” के प्रेतकल्प का संक्षेप है । जैसी वहां जीवों की कर्म गति‍ए यमराज के अधिकार में वर्णन की हैं, वेही यहां सामान्य रूपसे कही गई हैं। शब्दों की समानता भी पूर्ण रूप से है ॥ ७ (२०) ॥ (खं० ८) निरु० “सेनेव सृष्टामं दधात्येस्तुर्न दिद्युत् त्वेष प्रतीका ॥”(ऋ० सं० १, ५, १०, ७) ॥ यमो हजातो यमो जनित्वं जारः कनीनां पतिर्ज- नीनाम् । तं वश्चराथाँ वयं वसत्या स्तन्म गावो नक्षन्त इद्धम् ॥” [ऋ० सं० १, ५, १०, ८] इति द्विपदाः ॥