भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1088

रूप रूप [ हर प्रकार का रूप ] 'बोभवीति' बार २ या अतिशय से होता है। यह भी निगम है। 'वाचस्पति' ( १० ) क्या ? वाच् ( वाणी ) का पाता या पालयिता ( रक्षा करने वाला होता है। “तस्य०” उस वाचस्पति देव की यह ऋचा है- ॥४॥ व्याख्या। “अमीवहा०” निगम में “विश्वा रूपाण्या- विशन्” 'सब रूपों को धारण करने वाला वास्तोष्पति मध्यम देव है,-यह कहा गया है। इसी की विशेष व्याख्या करने की इच्छासे क्यों सब रूपों को धारण करता है? कैसे २ रूपों को धारण करता है? इन प्रश्नों के उत्तर देते हुए भाष्यकार यास्कमुनि कहते हैं- “यद्यद् रूपं कामयते तत्तद् देवता भवति” अर्थात्-भक्त जिस २ रूप की कामना करता है उस २ रूप से देवता होता है। प्रयोजन यह कि-भक्त की कामना को पूर्ण करना ही देवता को नाना रूप धारण करने का कारण है, और जैसे २ रूप को भक्त चाहता है, वैसे ही वैसे रूप को वह धारण करता है। स्वयम् भगवान् की प्रतिज्ञा भी ऐसी ही है “यो यो यांयां तनुं भक्तः श्रद्धयाऽर्चितु- मिच्छति । तस्यतस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधा- म्यहम्” (भ० गी० ७, २१) भाष्यकार कहते हैं कि-यही निगम इस प्रयोजन का नहीं है, किन्तु और भी निगम है, जो इसी को स्पष्ट अक्षरों में ही कह रहा है।