भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1089

हिन्दी निरुक्त ( ३२४ ) १० अ० २ पा० ४ ख० “रूपं रूपं मघवा बोभवीति मायाः कृण्वा नस्तन्वं १ परिस्वाम् । त्रिर्यद्द्दिवःपरि मुहूर्त्तमागात् स्वैर्मन्त्रैरनृतुपा ऋता वा ॥” [ऋ०सं०३,३,२०,३]॥ इस ऋचा का विश्वामित्र ऋषि है। जिन-जिन रूपोंसे इन्द्र देव होना चाहता है, उन सबसे वह बिना किसी रुकावटके होजाता है-वार२ होता है। कैसे? 'ऐसा होऊं', 'ऐसा होऊं' इत्यादि इच्छाओं के अनुसार अपने तनु (शरीर) को करता हुआ = बदलता हुआ। क्या वह मनुष्य आदि के समान उस २ शरीर को धारण करके मोह को प्राप्त होता है- उस २शरीर में होने वाले सुख दुःखों को भोगता है? नहीं “मायाः” वे सब उसकी माया हैं-ऐच्छि- क शरीर हैं, उसके मोहक नहीं हैं। जैसे बाजीगर या बहु- रूपिया अपनी इच्छा से नाना रूपों को धारण करता है और उनसे मोहित होकर उन्हें अपने सच्चे रूप नहीं मानता, किन्तु अपनी इच्छा के अधीन ही मानता हुआ उनका कार्य करता है, उसी प्रकार इन्द्र देवके नाना रूपहैं। जो इन्द्र देव अपने स्तुति के मन्त्रों से- मनन वाक्यों या भावना वाक्यों से यजमानोंके यज्ञमें बुलाया हुआ एक मुहूर्त्त में द्युलोकसेतीनवार आता है-भिन्न २स्थानोंमें भिन्न २ रूपोंसे एक हीवार आजाता है। प्रयोजन यहकि—देवताका ऐश्वर्य अमित होता है, उसको नाना रूप धारण करने में कोई कष्ट नहीं होता, वह सब कामों को अनायास करलेता है, उसके कामों में अशक्ति से होने वाले प्रश्नों को नहीं उठाना चाहिये। वह “अनृतुपा” और “ऋता वा” है, उसके सोम