निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपान को कोई समय नियत नहीं है, सदा ही उसके लिये यञ्ज होते रहते हैं और सदा ही सोमपान करता रहता है । इससे यह ठीक ही कहा है- कि- तू सब रूपों को धारण करता हुआ हमारे रोगों का नाशक हो । “बिभर्षि रूपाण्यवबोध आत्मा क्षेमायलोक- स्य चराचरस्य सत्वोपपन्नानि सुखावहानि सतामभद्राणि मुहुः खलानाम् ॥” (श्री० भा० स्कं० १० अ० २ श्लो० २९ ) हे भगवन्! तू ज्ञानस्वरूप अन्तर्यामी चर अचर लोक के क्षेम के लिये सात्विक रूपों को धारण करता है, जो सत् पुरुषों के लिये सुख दायक और खलों के लिये सदा ही दुःख दायक = दण्ड देने वाले हैं यह श्रीमद् भागवत वाक्य भी रूपान्तर से वही वेद वाक्य प्रतीत होता है ॥४(१७)॥ (खं० ५) निरु०-“पुनरेहि वाचस्पते देवेन मनसा सह । वसोष्पते निरामय मय्येव तन्वं१मम ॥” [ऋ०सं० १०,६,१३,७] ( अथ०सं० १,१,२)इति सा निगद- व्याख्याता । 'अपान्नपात्' तनूनप्ता व्याख्यातः । तस्य एषा भवति ॥५[१८]॥ अर्थ :-कोई पापी मनुष्य, जिसने अपने किये हुए पाप की किसी प्रायश्चित्त आदि से शुद्धि नहीं की हो, अपने