निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३२६ ) १० अ० २पा० ६ खं० प्राणों को अपने से अलग हुये समझ कर उनसे सम्बोधन कर के कहता है— हे 'वाचस्पते '! वाणीके स्वामी ! तू 'देवेन' सब इन्द्रियों की वृत्तियों को प्रकाशित करने वाले 'मनसा-सह' मनके साथ 'पुनः-एहि' फिर आ । हे 'वसोष्पते !' धन अथवा अन्न के स्वामी ! 'मम' मेरी 'तन्वम्' तनू को = देह को 'मयि-एव' मुझ में ही 'निरामय' निरन्तर रमा—ऐसा कर जिससे कि मेरी तनू मुझ में ही रमण करे । यह ऋचा अपने उच्चारण से ही व्याख्यात है ॥ 'अपांनपात्' ( १० ) 'तनूनपात्' शब्द ( ८, २, २ ) से व्याख्यान किया जाचुका । यह शब्द निर्वचन है— एक शब्द का दूसरे शब्द के द्वारा निर्वचन किया जाता है, अर्थात्-यह भी प्रकृत शब्द के निर्वचन के बताने की आचार्य की शैली है । अप् या जलों से आदित्य होता है। और उससे मध्यम देव, इससे वह 'अपांनपात्' जलका पोता है। यह शब्द की व्याख्या है । अर्थ से यह मध्यम देव है । “तस्य०” उस ‘अपांनपात्’ की यह ऋचा है ॥५(१८॥ ( खं०६ ) निरु०-“यो अनिध्मो दीदयदप्स्व१न्तर्यं विप्रास ईलते अध्वरेषु । अपान्नपान्मधुमतीरपो दाया- भिरिन्द्रो वावृधे वीर्याय ॥” (ऋ०सं०७,७,२४,२,॥ यः अनिध्मः ‘दीदयद्’ दीप्यसे अभ्यन्तरम्- अप्सु, यं मेधाविनः स्तुवन्ति यज्ञेषु, सः अपान्न-