निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३२७ ) १० अ० २ पा० ७ खं० पात् मधुमतीः अपो देहि अभिषवाय,याभिः इन्द्रो वर्द्धते 'वीर्याय' वीरकर्मणे ॥ 'यमः' यच्छति- इति सतः । तस्य एषा भवति ॥६(१९)॥ अर्थ:- “यो अनिध्मो०” इस ऋचा का कवष ऋषि है । यह सारा ही मन्त्र प्रत्यक्ष है । हे अपान्नपात्! 'यः'(त्वम्)जोतू 'अनिध्मः'इन्धन के विना 'अप्सु'— 'अन्तः' जलों के मध्यमें 'दीदयत्' (दीप्यसे)'जलता है, 'यम्' जिसे (जिस तुझको) 'अध्वरेषु' ( यज्ञेषु) यज्ञों में 'विप्रासः' (मेधाविनः) मेधावी ब्राह्मण 'ईळते' ( स्तुवन्ति ) स्तुति करते हैं (सः) सो तू 'मधुमतीः' मीठे (अपः) जलों को 'अभिषवाय'सोम के निचोड़ने के अर्थ 'दाः'(देहि) दे 'याभिः' जिनसे 'इन्द्रः' तू इन्द्र देव 'वीर्याय' (वीरकर्मणे) वीर कर्म के लिये 'वावृधे' (वर्द्धेयाः) बढता है । अथवा (वर्द्धते) इन्द्र देव जिससे बढता है । [इस व्याख्या में इतना अंश प्रथम पुरुष के योग से परोक्ष हो जाता है] । 'यम'(१२) क्यों? 'यच्छति' वह सब प्राणियों को जीवन से निवृत्त करता है । इसी बल कर्म से वह मध्यम है । “तस्य०” उस (यम) की यह ऋचा है ॥६(१६)॥ ( खं० ७ ) निरु०-“परेयिवांसं प्रवतो महीरनु बहुभ्यःपन्था- मनुपस्पशानम् । वैवस्वतं सङ्गमनं जनानां यमं राजानं हविषा दुवस्य ॥”[ऋ०सं०८,६,३४,१]॥