निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1087, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३२२ ) १० अ० २पा० ४ खं०
अर्थः—"अमीवहा०" इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि है। यह कारिका स्थालीपाक में और यायावर्य की प्रतिपत्ति में वास्तोष्पतीय होम में विनियोग है। हे भगवन् ! 'वास्तोष्पते ! देव ! [त्वम्] तू (अस्माकम् ) हमारे 'अमीवहा' (अक्षयमनहा) रोगों का नाश करने वाला 'एधि' (भव) हो। कैसे ? 'विश्वा' (विश्वानि = सर्वाणि) सब 'रूपाणि' रूपों को 'आविशन्' आवेश करता हुआ- धारण करता हुआ हमारे दुःखों के उत्पन्न करने वाले जो सर्पादि उनका प्रतिपक्ष = विरोधी जो नकुल (न्योला) आदि उन २ के रूपों को धारण करता हुआ उस २ हमारे रोग को तू नाश कर-हमारे उपद्रवों को हटा। 'नः'(अस्माकम्) हमारा 'सखा' (मित्रम्) मित्र 'सुशेवः' (सुसुखः) सुन्दर सुखरूप हो । 'शेव' यह सुख का नाम है। 'शिष्' (दि० प०) धातु से वकार नाम करण (प्रत्यय) होता है, जोकि-अन्तस्थान्तरोप- लिङ्गी-धातुके अन्त 'ष' के अन्तर या अवकाश स्थान को उपलिङ्गन = उपगमन करने वाला होता है—'शिष्' का 'शिव' और 'इ' को 'ए' गुण होकर 'शेव' बन जाता है। [ यहां 'अन्तस्थ' शब्द से यरलव वर्णों की संज्ञा नहीं है।] इस धातु को यह गुण ('इ' का ए) विभाषित विक- ल्प से होता है। इस से गुण के न होने पर इसी धातु का 'शिव' यह शब्द भी हो जाता है। जिस २ रूप की कामना करता है, वह २ देवता हो जाता है। (क्योंकि-देवता का ऐसा ऐश्वर्य है, जो जो वह चाहता है। उस २ रूप को करलेता है।) "रूपं रूपं मघवा बोभवीति" 'मघवा इन्द्रदेव