निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३६७ ) १० अ० ४ पा० ३खं०
जलके संग्रह स्थान अन्तरिक्ष में बैठा हुआ 'पृश्निगर्भाः' सूर्य की रश्मियों में गर्भ रूप से स्थित जलों को अथवा पृश्नि (पाष्टवर्ण) प्रकृष्ट = बहुत तेज वर्ण वाले सूर्य के गर्भ भाव को प्राप्त हुए जलों को 'चोदयत्' ( चोदयति ) प्रेरणा करता है । 'इमम्' इस वेन को 'अपाम्' जलों के 'सूर्यस्य' (च) और सूर्य के 'संगमे' संगमन या मिलाप के स्थान (अन्तरिक्ष) पे स्थित को 'विप्राः'मेधावी ब्राह्मण "शिशु-न" बालक को जैसे 'मतिभिः ज्ञान पूर्वक स्तुतियों से 'रिहन्ति' (लिहन्ति) चाटते हैं ( स्तुवन्ति ) अथवा स्तुति करते हैं ( वर्द्धयन्ति ) अथवा बढ़ावा देते हैं ( पूजयन्ति ) अथवा सराहते हैं । 'शिशु' क्यों ? 'शंसनीयो भवति' वह शंसनीय या प्रशंसनीय होता है । क्योंकि प्रयोजन से या बिना प्रयोजन के उसके प्रलापों में उसी प्रशंसा की जाती है । अथवा दान अर्थ में 'शी' (अदा० आ०) धातु से है । क्यों कि वह पुरुषसे स्त्री के लिये धारणार्थ दिया जाता है । जैसे कि- नया गर्भ ग्रहण करने वाली स्त्रियों में कहा जाता है- "चिरलब्धो गर्भः"इसने देरमें गर्भ पाया है ('अचिरलब्धो गर्भः) या शीघ्र ही गर्भ पाया है । 'असुनीति' (२५) शब्द देवता पद है । और वह मध्यम इन्द्र = प्राण देवता है । 'असुनीति' क्यों? वह असुओं(प्राणों) को नयन करता है लेजाता है-अर्थात्- जब वह इस शरीर से उत्क्रमण करता है या निकलता है, तो अपनेसाथ दूसरे प्राणों को भी लेजाता है । जैसा कि- कहा है- "प्राणमनूत्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति"