भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1133

हिन्दी निरुक्त ( ३६६ ) १० अ० ४ पा० ४ खं० बहुत कालतक जीने के अर्थ (मनः धारय) मनको धारणकर । 'नः' ( अस्माकम् ) हमारी 'आयुः' आयुको 'सुप्रतिर' (प्रकर्षेण वर्द्धय) भले प्रकार बढ़ा । 'नः' ( अस्मान् ) और हमें 'रारन्धि' ( रन्धय— (च) ) साधन कर या साधले । और ऐसा अनुग्रह कर जिस प्रकार हम 'सूर्यस्य' सूर्य के 'सन्दृशि' (सन्दशर्नाय ) भले प्रकार दर्शन के लिये समर्थ होवें हमें दिव्य दृष्टि दे, जिससे सूर्य के संदर्शन में समर्थ हों । और 'घृतेन' ( उदकेन ) जलसे 'त्वम्' तू 'तन्वम्' अपने शरीर को 'वर्द्धयस्व' बढ़ा— अर्थात्-यथा समय वृष्टि करने से यह सब होगा, इसी से तू बरस । 'रध' ( दि०प०) धातु वशगमन ( अधीन चलने ) अर्थ में भी देखा जाता है । जैसे- " मा रधाम द्विषते सोम राजन् " अर्थात्- हे भगवन् ! सोम ! राजन् ! तुझसे विशेष रूप से कहा जाता है कि—'द्विषते' शत्रुके 'मा' न 'रधाम' वश हों इन उक्त प्रार्थनाओं के लिये हम शत्रुओं के अधीन नहीं, किन्तु वे ही सब प्रकार हमारे अधीन हों । क्योंकि-शत्रुके अधीन होना बहुत अनिष्ट है । यहां मन्त्रार्थ के सामर्थ्य से 'रध' धातु वश गमन अर्थ में स्थिर होता है । 'ऋत' शब्द की व्याख्या ( २, ७, ३ ] की जाचुकी है । “तस्य०” उसकी यह ऋचा है—॥ ३ (४०) ॥ ( खं० ४ ) निरु० " ऋतस्य हि शुरुधः सन्ति पूर्वी ऋत- स्य॒धीति॒ र्वृ॑जि॒नानि॑ ह॒न्ति॒ । ऋतस्य श्लोको