भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1134

हिन्दी निरुक्त ( ३७० ) १० अ० ४ पा० ४ खं० बधिरा ततर्द कर्णा बुधानः शुचमान आयोः ॥ ” ऋ० सं० ३, ६, १०, ३ ) ॥ ऋतस्य हि शुरुधः सन्ति, पूर्वीःऋतस्य प्रज्ञा वर्जनीयानि हन्ति ऋतस्य श्लोको बधिरस्यापि कर्णौ आतृणक्षि । ‘बधिरः’ बद्धश्रोत्रः । कर्णौ बोधयन् दीप्यमानश्च आयोः = अय- नस्य = मनुष्यस्य । ज्योतिषो वा । उदकस्य वा । ‘इन्दुः’ इन्धेः । उनत्तेर्वा । तस्य एषा भवति ॥ ४ ( ४१ ) ॥ अर्थः- “ऋतस्य हि शुरुधः०” इस ऋचा का वाम- देव ऋषि है । ‘हि’ क्योंकि—‘ऋतस्य’ ऋत मध्यम देव के ‘पूर्वीः’ पहिली या पूर्व अनेक काल की संचित की हुई ‘शुरुधः’ ( आपः ) अप् [ जल ] हैं, [ अतः ] इससे ‘ऋतस्य’ ऋत देव की ‘धीतिः’ [प्रज्ञा] बुद्धि ‘वृजिनानि’ सब लोकों के कष्टों को ‘हन्ति’ नाश करती है, या ‘वृजिनानि [ वर्जनीयानि = अयशांसि ] लोकों के अपयशों को ‘हन्ति’ नाश करती है । क्योंकि-अकाल में ही भूख प्यास के मारे हुये लोकों की अप- यश के करने वाले चोरी आदि कामों में प्रवृत्ति होती है, किन्तु ऋतदेव के यथा समय वृष्टि करने पर नहीं होती । इसी से ‘ऋतस्य’ [ ज्योतिषो वा ] ऋतकी ज्योति [ बिजली ] का [ उदकस्य वा ] अथवा जलका ‘श्लोकः’ श्लोक या शब्द