निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३७२ ) १० अ० ३ पा० ५ ख० तत् परुच्छेपस्य शीलम् ॥ 'परुच्छेपः' ऋषिः । पर्ववच्छेपः । परुषि परुषि शेपः अस्य — इति वा ॥ इति इमानि सप्तविंशति ( २७ ) दैवतानाम- धेयानि अनुक्रान्तानि-सूक्तभाञ्जि हविर्भाञ्जि॥ तेषाम्-एतानि अहविर्भाञ्जि-वेनः, असुनीतिः, ऋतः, इन्दुः ॥ 'प्रजापतिः' प्रजानां पाता वा पालयिता वा ॥ तस्य एषा भवति ॥५ (४२) ॥ अर्थः- "प्रतद्वोचेयम्०" यह अतिच्छन्द है । परुच्छेप ऋषि और षष्ठ अहन् (दिन) में मरुत्वतीय में शस्त्र है। (यद् यद्-इष्टं तस्य इन्दोः) जो जो उस इन्द्र देव को प्रिय है, 'तत्' (तत्) सो सो (अहम्) मैं 'भव्याय' उस भव्य या भवन-योग्य = आत्मवान् = अपने वाञ्छितों के पात्र 'इन्दवे' इन्दु देव के लिये 'प्रवोचेयम्' (प्रब्रवीमि) कहता हूं। 'यः' जो इन्दु 'हव्येान' ( हवनार्ह इव ) हवन के योग्य जैसा 'इषवान्' ( अन्नवान् ) अन्न या उदक = जल वाला है— यद्यपि उसके लिये यज्ञ में हविः नहीं दिया जाता, तो भी वह अन्न या हविः वाला है—अर्थात्-अन्न के भी कारण भूत जल को धारण करने वाला है जिससे कि—हविः उसी से उत्पन्न होते हैं, इससे हविर्भाग् देवताओं से भी अधिक महिमा वाला है । अथवा 'इषवान्' (कामवान्) कामनांवाले