भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1137

हिन्दी निरुक्त ( ३७३ ) १० अ० ४ पा० ५ खं०

होताओं को नित्य ही उनके वाञ्छित फलों के देने में प्रस्तुत (तैयार) रहता है । इसीसे 'मन्म' (नः मननानि) हमारे मनों को या प्रजाओं को 'रेजति' (रेजयति) (आकम्पयति) कम्पित करता है- कैसे हम इसकी नित्य ही स्तुति करें ?- अपने अनुग्रहों से हमारे मनों को नई नई स्तुतियों के लिये चञ्चल करता रहता है । "रक्षोहा मन्म रेजति" (रक्षोहा च बलेन रेजयति) और बल से राक्षसों को मारता हुआ हमारे मनों को फुलाता है। और 'स्वयम्' अपने आप आदर युक्त होकर 'सः' वह इन्दु 'अस्मदानिंदः' (अस्मदभिनिन्दिताम्) हमारी निन्दा करने वाले 'दुर्मतिम्' दुष्टमति या पापमति पुरुष को 'वधैः वज्र के प्रहारों से 'अजेत' प्राप्त होता है या जीत लेता है या दूर फेंक देता है । 'अघशंसः' हमारे पापों को कहने वाला-थोड़े पापों को भी देश में बढ़ाकर फैलानेवाला 'अवस्रवेत्' उस अतिबलवान् इन्दु से हन्यमान होता हुआ अधोगति को प्राप्त हो । "अवतरम्" - नीचे से भी नीचे 'क्षुद्रम्-इव' अति तुच्छ वस्तु के समान 'अवस्रवेत्' नीचे चला जावे- जैसे कोई क्षुद्र वस्तु जड़ से नष्ट होजाता है, उसी प्रकार वह हमारा शत्रु नष्ट होजावे (यह हम चाहते हैं)। इस मन्त्र में 'रेजति' 'रेजति' 'स्रवेत्' 'स्रवेत्' इस प्रकार एक २ पद फिर २ पढ़ा गया है, उसका क्या प्रयोजन है ? ऐसा प्रश्न उठाकर भाष्यकार स्वयम् समाधान करते हैं- "अभ्यासे भूयांसमर्थ मन्यन्ते" अर्थात् - जहां शब्द के अभ्यास या आवृत्ति में दूसरा कोई विशेष प्रयोजन नहीं है, वहां मन्त्रोंके अर्थ तत्व के