निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३७४ ) १० अ० ४ पा० ५ खं० जानने वाले आचार्य अर्थ के बाहुल्य को ही अभ्यास का प्रयोजन मानते हैं क्यों कि- अकस्मात् वही शब्द दोहराया नहीं जाता, अवश्य ही उनके पुनः कथन में कोई प्रयोजन रहता है। और लोक में भी ऐसा देखागया है- “यथा-अहो दर्शनीया अहो दर्शनीया” अर्थात्- जैसे 'अहो (आश्चर्य, यह स्त्री दर्शनीय है अहो यह स्त्री दर्शनीय है। यहां स्त्री के गुणों के अतिशय या आधिक्य के बताने के अर्थ 'दर्शनीय' पद को दोहराया गया है। इससे मन्त्रों में भी वैसा ही शब्द स्वभाव है। क्या कुछ और भी ? हाँ, - “तत् परुच्छेपस्य शीलम्” अर्थात्- वह अभ्यास मन्त्र के द्रष्टा परुच्छेप ऋषि का स्वभाव है- परुच्छेप ऋषि का ऐसा ही स्वभाव है कि- वह अपने देवता की स्तुति में एक २ शब्द को दोहरा २ कर बोलता है। इससे भाष्यकार ने यह भी दिखाया कि- मन्त्रों के अर्थ दर्शन काल में शब्दों के स्वभाव तक ही ध्यान नहीं रखना चाहिये बल्कि मन्त्र के द्रष्टा ऋषि के स्वभाव का भी अनुरोध करना चाहिये। इसी लिये लोक में भी वाच्य, लक्ष्य और व्यङ्ग्य अर्थ के अतिरिक्त एक तात्पर्यार्थ भी माना जाता है जो वक्ता की इच्छा से ज्ञान से प्रतीत होता है। 'परुच्छेप' कौन? ऋषि । सो क्यों? उसका पर्व या ग्रन्थि वाला महान् शेप (लिङ्ग) है। अथवा 'पर्व्वणि पर्व्वणि शेपः अस्य' अङ्गों की सन्धि २ में उसका शेप है- इतना लम्बा है कि- उसका स्पर्श सब अङ्गों पर होजाता है।