निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३७५ ) १० अ० ४ पा० ६खं० "इति इमानि०" इस प्रकार ये सताईस (२७) 'वायु' से आरम्भ कर 'इन्दु' पर्य्यन्त देवताओं के नाम गिनाए गए। किस प्रयोजन से ? विशेष अर्थ के कहने के लिये । वह क्या विशेष है ? "सूक्तभाजि हविर्भाञ्जि" अर्थात्-ये सब देवता सूक्त के भजन करने वाले और हविः के भजन करने वाले हैं- इनकी सूक्तों में प्राधान्य से स्तुति भी है और यज्ञ में इनकी हविः भी है। "तेषाम्-एतानि अहविर्भाञ्जि-वेनः, असुनीतिः, ऋतः इन्दुः ।" किन्तु उनमें ये चार देवता हविर्भाक् नहीं हैं,-वेन, असुनीति, ऋत और इन्दु-इनकी सूक्तोंमें स्तुतिमात्र है और यज्ञमें इन्हें हविः नहीं दीजाती । शेष सब तेईस ( २३ ) देवता वायु आदि हविः और सूक्त दोनों के भागी हैं । यह देवताओं के स्वभाव के दिखाने के अर्थ कहा है । जिस प्रकार मन्त्रार्थ के ज्ञान में शब्द स्वभाव और ऋषि- स्वभाव का ज्ञान आवश्यक है, उसी प्रकार देवता का भी स्वभाव ज्ञातव्य है। जैसे कि- यहां जो वेन आदि देवता हविः के भजने वाले नहीं हैं, उनके मन्त्रों में जो "घृत" 'अन्न' आदि शब्द आते हैं, उनका अर्थ मध्यम देवता के स्वभावा- नुसार जल आदि ही लिया जावेगा । जो ऐसा अनुसन्धान न रख कर प्रसिद्ध अर्थ के अनुसार घृत आदि ही अर्थ लेगा वह देवता के प्रतिकूल ही अर्थ करेगा, जो यज्ञ में विगुणता को उत्पन्न करने वाला है ॥