निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३७६ ) १० अ० ४ पा० ६ खं० 'प्रजापति' (२८) क्या ? प्रजाओं का पाता या पालयिता ( पालन करने वाला ) । "तस्य०" उसे प्रजापति देवकी यह ऋचा है ॥५(४२)॥ ( खंड ६ ) निरु०- "प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वाजाता- नि परिताँ बभूव । यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥" (ऋ०सं०८,७,४,५ य०वा०सं० १०,२, २३,६५) ॥ प्रजापते ! नहि त्वद्-एतानि अन्यः सर्वाणि जातानि तानि परि बभूव । यत्कामाः ते जुहुमः, तद् नः अस्तु, वयं स्याम पतयो रयीणाम्, इत्याशीः। 'अहिः' व्याख्यातः । तस्य एषा भवति-॥६(४३)॥ अर्थः- "प्रजापते०" इस ऋचाका प्राजापत्य हिरण्य- गर्भ ऋषि है। पितृयज्ञ में उपस्थान में विनियोग है और राजसूय में होम में विनियोग है । 'प्रजापते!' हे प्रजापति देव ! 'त्वत्' तेरे से 'अन्यः' अन्य कोई भी एतानि इन 'ता' (तानि) उन 'विश्वा' (विश्वानि = सर्वाणि) सब 'जातानि' (देवतारूपाणि) देवता रूपों को 'न' 'परिबभूव' (परिगृह्य भवति) सब ओर से ग्रहण करके नहीं रहता है, किन्तु तू ही इन सब रूपोंको सब ओर से लिये हुये है। 'यत्कामाः' जिस २ कामना को करते हुये