निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३७७ ) १० अ० ४ पा० ७ खं० (हम) 'ते' तेरे लिये 'जुहुमः' होम करते हैं, 'तत्' सो २ 'नः' (अस्माकम्) हमारा 'अस्तु' होवे और (हम) 'रयीणां (धना- नाम्) पतयः' स्वामी 'स्याम' होवें। यह आशीः या प्रार्थना है। 'अहि' (२९) शब्द व्याख्यान [२.५.३] किया जाचुका । “तस्य०” उस (अहि) की यह ऋचा है ॥६(४२)॥ व्याख्या । आशीः। “प्रजापते” इस मन्त्र में दो आशिषाएं हैं पहिली- “यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु” जिस २ कामना से हम तेरे लिये होम करते हैं वो र हमें हो, और दूसरी “वयं स्याम पतयो रयीणाम्” हम धनों के स्वामी होवें। अथवा “आशीः” इस निर्देश से भाष्यकार यह दिखाते है कि- यह आशिषा मन्त्र ही में है, किन्तु जहां मन्त्र में आशिषा न भी हो, तो भी वहाँ अध्याहार कर लेना चा- हिए । क्यों कि- स्तुति और आशिषा का नित्य सम्बन्ध है- किसी प्रार्थना के बिना कभी कोई स्तुति प्रवृत्त नही होती ॥ अहि । पहिले इस शब्द का निर्वचन मात्र किया गया है-'अहि' क्यों ? 'अयनात्' गमन करने से, किन्तु यहाँ उसका अभिधेय (अर्थ) बताया गया है कि-वह मध्यमदेव है॥६(४३)॥ (खं० ७) निरु०-“अब्जा मुक्थैरहिं गृणीषे बुध्ने नदीनां रजः सु सीदन् ॥” [ऋ० सं० ५, ३, २६, ६] ॥ अब्जम् उक्थैः अहिं गृणीषे बुध्ने नदीनां बद्ध्वा