निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३७८ ) १० अ० ४पा० ७ खं०
अस्मिन् धृताः आपः इति वा । इदमपि इतरद् 'बुध्नम्' एतस्मादेव । बद्धा अस्मिन् धृताः प्राणा इति । योऽहिः स बुध्न्यः । 'बुध्नम्' अन्तरिक्षं तन्नि- वासात् । तस्य एषा भवति-॥७(४४)॥ अर्थः- "अब्जामुक्थैः०" इस ऋचा का वाशिष्ठ पाराशर ऋषि है। दशरात्र के चतुर्थ अहन् में वैश्वदेव में विनियोग है। ( हे स्तोतः ! ) हे स्तुति करने वाले ! ऋत्विक् ! (त्वम्) तू 'रजःसु' (उदकेषु) जलों के निमित्त 'सीदन्' स्थित होता हुआ 'नदीनाम्' (नदमानाम्) नाद (शब्द) स्वभाव जलों के 'बुध्ने' (बन्धने) बन्धनरूप अन्तरिक्ष में (वर्त्तमानम्) विद्य- मान 'अब्जाम्' (अप्सुजम्) जल में जन्मने वाले 'अहिम्' अहि (मेघ) देव को 'उक्थैः' स्तोत्रों से 'गृणीषे' स्तुति करता है। 'बुध्न' क्या ? अन्तरिक्ष । क्यों ? 'बद्धा अस्मिन् धृताः आपः इति वा' इसमें जल बंधे हुए हैं, या धरे हुए हैं। यह भी दूसरा 'बुध्न' (शरीर का वाचक) इसी व्याख्यान से है। कैसे ? इसमे प्राण बंधे हुए हैं या धारण किये हुए हैं। 'अहिर्बुध्न्यः' (३०) शब्द । क्या अर्थ ? जो अहि सो बुध्न्य । 'अहिः' 'बुध्न्यः' ये दो प्रथमान्त समानाधिकरण (विशेषण विशेष्य) पद हैं । यथास्थित मिल कर ही एक नाम का कार्य करते हैं। 'बुध्न्य' क्या ? 'बुध्न' अन्तरिक्ष का