निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३७६ ) १० अ० ४ पा० ६ ख० नाम है, और उस में रहने से अहि 'बुध्न्य' है । 'बुध्न' शब्द में 'य' तद्धित प्रत्यय होने से 'बुध्न्य' होजाता है । "तस्य०" उस 'अहिर्बुध्न्य'की यह ऋचा है ॥७(४४)॥ ( खं० ८ ) निरु०—"मानो॑ऽहि॒ र्बुध्न्यो॑ रि॒षे धान्मा॑ य॒ज्ञो अ॒स्य स्रिध॑दृता॒योः ॥” [ऋ०सं०५,३,२६,७] ॥ मा च नः अहिर्बुध्न्यो रिषणाय धात् । मा अस्य यज्ञा खा च स्रिधद् यज्ञकामस्य । 'सुपर्णो॑' व्याख्यातः । तस्य एषा भवति ॥८(४५)॥ अर्थ—"मानोऽहिर्बुध्न्यो०" इस ऋचाका ऋषि आदि पूर्व ऋचा के समान हैं ॥ 'मा' मत 'नः' (अस्मान् ) हमें 'अहिर्बुध्न्यः' अहिर्बुध्न्य देव 'रिषे' (हिंसनाय ) हिंसा के लिये 'धात्' धारण करे । और 'मा' मत 'अस्य' इस 'ऋतायोः' (यज्ञकामस्य ) यज्ञ की कामना वाले यजमान का 'यज्ञः' यज्ञ 'स्रिधत्' मत हो, किन्तु सदा ही अविनाशी बना रहे । 'सुपर्णः [३१] शब्द का निर्वचन [ ३,२,६ ] होचुका,— 'सुपतनः' सुन्दर पतन करने वालो । यहां मध्यम ज्योति अभिधेय या अर्थ तत्व है । "तस्य०" उस 'सुपर्ण' की यह ऋचा है—॥८(४५)॥ ( खं०६ ) निरु०"ए॒कः सु॑प॒र्णः स स॑मु॒द्रमावि॑वेश॒ स इ॒दं