भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1162

हिन्दी निरुक्त ( ३६६ ) ११ अ० १ पा० ८ ख० सकते। हां यह ऋचा ऋक्संहिता में है और सायणाचार्य का इस पर व्याख्यान है। इस लिये इसकी व्याख्या हम भी कर देते हैं। "त्वेषं मिथ्या०" यह ऋचा सोमातिरेक में तृतीय सवन में वैकल्पिक याज्या है , जैसा कि-सूत्र में कहा है-- "त्वेषं मिथ्या समरणं शिमीवतोरिति वा याज्येति" । "त्वेषमिथ्या०" हे इन्द्राविष्णू ! इन्द्र विष्णु देवताओ ! 'शिमीवतोः' वाञ्छित फल के देने वालो' 'वाम्' (युवयोः) तुम दोनोंके 'इत्था' (इत्थम्) इस प्रकारके 'त्वेषम्' (प्रदीप्तम्) प्रज्व- लित जगमगाते हुये 'समरणम्' यज्ञ देशमें शुभागमनको 'सुमपाः' होम से बचे हुये सोम को पीये हुये यजमान 'उरुष्यति' (रक्षति) रक्षा करता है- याग से पूजता है = संस्था करता है। तुम में बड़ाई या गुण क्या है ? 'या' (यौ ) जो [इन्द्राविष्णू ! तुम दोनों इन्द्र और विष्णु 'सत्याय' हविः के देने वाले यज- मान मनुष्य के लिये 'प्रतिधीयमानम्-इत्' (प्रतिघातव्यम्) देने योग्य 'असनाम्' अन्न आदिको 'अस्तुः' शत्रुओं के हटाने वाले 'कृशानेः, [अग्नेः] अग्नि से 'उरुष्यथः' प्रवृत्ति कराते हो। अर्थात्- अग्नि मे होम किये हुये हविः को स्वीकार करके उसी के द्वारा अभिमत फलको देते हो ।(सा०भा०). यह यहां पर बड़े आश्चर्य की बात है कि- एक ही स्थान में मूल में तीन विलक्षण २ विभ्रम होगये हैं ॥ 'विश्वानर' (५) शब्द की व्याख्या (अ०७ पा०६, खं० १.) की जाचुकी है ॥