निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४१२ ) ११ अ० २पा० ४खंड 'अङ्गिरसः' व्याख्याताः । तेषाम्—एषा भवति ॥४[१६]॥ अर्थ :-“विष्टी शमी०” इस ऋचा का कुत्स ऋषि हैं आर्भवे विनियोग है । 'सौधन्वनाः' ( सुधन्वनः पुत्राः ) सुधन्वा के पुत्र 'सूर- चक्षसः' [ सूरख्याना वा ] सूर्य के समान प्रकाश वाले ( सूर- प्रज्ञा वा ) सूर्य के समान ज्ञान वाले 'वाघतः' ( वोढारः ) यज्ञ के चलाने वाले ( मेधाविनो वा ) मेधा ( धारणा वाली बुद्धि ) वाले 'ऋभवः' ऋभुओं ने “विष्टी शमी” ( कृत्वा कर्माणि ) कर्मों को करके 'तरणित्वेन' [क्षिप्रत्वेन] जलदी से “मर्त्तासः सन्तः” [ मनुष्याः सन्तः ] मनुष्य होते हुए 'अमृतत्वम्' अमर भाव ( देव भाव ) को 'आनशुः' प्राप्त कर लिया था-सुधन्वा के पुत्र ऋभु कर्म की महिमा से शीघ्र ही देवता होगए थे । 'संवत्सरे' एक वर्ष में 'धीतिभिः' (कर्मभिः) कर्मों से 'समपृच्यन्त' संयुक्त हो गए थे - यज्ञ कर्म के अनु- ष्ठान में अपने अपूर्व कौशल से उन्हों ने एक ही वर्ष में या संवत्सर के विहित वसन्त आदि काल में कर्मों को समाप्त किया और उसी कर्मकी यथार्थता के फलसे वे शीघ्र ही देवता होगए-उनको कर्मके विपाक की बहुत काल तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी । “ऋभुः०” । ऋभु, विभ्वा और वाज ये आङ्गिरस (अङ्गि- रस के पुत्र) सुधन्वा के तीन पुत्र हुये थे, उनमें पहिले (ऋभु) और तीसरे (वाज) के बहुतों के समान निगम हैं - इन दोनों