निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंके नाम मन्त्रोंमें बहुवचनान्त आते हैं, किन्तु मध्यम (विभ्वा) के नहीं। सो यह—ऋभु के बहुवचन के साथ और चमस के संस्तव (एक साथ स्तुति) के साथ दशतयी [ऋग्वेद के दश मण्डलों] में बहुत सूक्त हैं। “आदित्यरश्मयः” । आदित्य (सूर्य) की रश्मिएँ (किरणें) भी ऋभु कहलाती हैं। “अगोह्यस्य०” । 'ऋभवः' हे ऋभुओ ! 'यद्' (यावत्) जबतक 'अगोह्यस्य' (आदित्यस्य) सूर्य के 'गृहे' (मण्डले) मण्डल में 'असतनाः' (अस्वपथ) तुम सोते हो (भवथ) यो होते हो 'तद्' (तावत्) तब तक 'अद्य' (इह) यहां 'इदम्' इस जगत् को “न अनुगच्छथ” अनुसरण नहीं करते हो (न भवथ) अथवा यहां नहीं होते हो— जब तुम रात्रि के समय सूर्य मण्डल में प्रवेश कर जाते हो, तो यह जगत् तुम्हारे बिना प्रकाश हीन होजाता है, इस तुम्हारे माहा- भाग्य (महिमा) को मैं अनुकीर्त्तन करता हूं, तुम मेरे इस कार्य को करो। इस मन्त्र में इस प्रकार 'ऋभु' नाम सूर्य की रश्मि- ओं का है ॥ 'अगोह्य' क्या ? आदित्य। क्यों वह अगूहनीय होता है किसी से भी छिपाया नहीं छिपता। “अङ्गिरसो व्याख्याताः” अङ्गिरसों की व्याख्या [३. ३, ५] की जाचुकी। “तेषाम्०” उन अङ्गिरसों की यह ऋचा है ॥ ४ [१६]